024/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
ज्ञानी जन यदि ज्ञान का, करते हैं अभिमान।
ज्ञान नष्ट होता सभी, रहे न शेष निशान।।
रहे न शेष निशान, किसी के काम न आता।
अलिखित यही विधान,पतित जीवन हो जाता।।
'शुभम्' करें उपयोग, समझकर उसका मानी।
रहें अहं से दूर, बने रहना यदि ज्ञानी।।
-2-
ज्ञानी नर गंभीर हो, जैसे सिंधु अथाह।
छल-छल कल-कल कर रही,सरिता बड़े उछाह।।
सरिता बड़े उछाह, तोड़कर सभी किनारे।
बहती धार सवेग, किसी के खेत उजारे।।
'शुभम्' ज्ञान गंभीर, पुरुष होते सम्मानी।
रखना ज्ञान सँभाल,बने रहना यदि ज्ञानी।।
-3-
अधजल गगरी देख लो, छलक रही मुँहजोर।
छलके भरी न बूँद भी,करे न किंचित शोर।।
करे न किंचित शोर, वही है मानो ज्ञानी।
रखती नीर सँभाल, उलीचे लेश न पानी।।
'शुभम्' ज्ञान का कोष,नहीं जाया कर धल-धल।
खाली करता घोष ,करे ज्यों गगरी अधजल।।
-4-
ज्ञानी जन पाते सभी, मान सदा सर्वत्र।
बढ़े प्रतिष्ठा विश्व में,यदि हो सुघर चरित्र।।
यदि हो सुघर चरित्र, महकता फूलों जैसा।
प्रसरित होता इत्र, वायु में सुमधुर वैसा।।
'शुभम्' ज्ञान का पात्र, अगर हो सच्चा दानी।
करता जगत प्रणाम, जदपि नर सच्चा ज्ञानी।।
-5-
ज्ञानी जन कागा नहीं, करें काँव ही काँव।
अगर नहीं विश्वास हो, देखो जाकर गाँव।।
देखो जाकर गाँव, कोकिला मीठा बोले।
जब आता मधुमास, समय पर वाणी खोले।।
'शुभम्' ज्ञान की बात, ज्ञान का अर्थ न पानी।
बहा रहा क्यों मूढ़, नहीं तू सच्चा ज्ञानी।।
शुभमस्तु !
08.01.2026◆ 8.45प०मा०
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