367/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कर्म से ही
देवता नर
भद्र नारी देवियाँ।
भाल पर
किसके लिखी है
देवत्व-लिपि उभरी हुई
कोकिलों के
बोल ने
माधुर्य की महिमा छुई
क्या पता
कब रंग बदलें
शीश की ये वेणियाँ।
देवता-दानव
इसी में
बस रहे जाना नहीं
आदमी
जो कर रहा है
बद उसे माना नहीं
दूसरों पर
दोष की
थोपा करें निज गलतियाँ।
देवता में भी
असुर है
किंतु किंचित अंश ही
आदमी में
उभय का
अंश भी बहुलांश ही
आज मीठे
बेर देतीं
चुभती कभी वे बेरियाँ।
शुभमस्तु'
25.10.2026◆2.30 प०मा०
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