गुरुवार, 26 मार्च 2020

ग़ज़ल


◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●
 💐 शब्दकार©
🌐 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●
इंसां   को   सिखाने   आई।
कुदरत कुछ  दिखाने आई।।

तू   पानी   का   बुलबुला है,
ये   सबको    बताने   आई।

तोड़ा    है  दम्भ   बल   का ,
गुमाँ   तेरा     मिटाने  आई।

मज़हब    की  दीवार  हैं जो,
पल      में     हटाने    आई।

मुँह    बंद   कर  ले   अपना,
यह   भी     जताने     आई।

कोरोना   तो     है     बहाना,
स्वच्छता      सुझाने    आई।

गलबाँहीँ  'शुभम'   है  झूठी ,
दो  कर       जुड़ाने     आई।

💐 शुभमस्तु !

24.03.2020 ◆5.30 अपराह्न।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...