रविवार, 8 मार्च 2020

ग़ज़ल


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✍ शब्दकार©
🔰 डॉ. भगवत स्वरूप' शुभम'
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सजन   मेरे  आए  फागुन में।
दरस  दिखलाए   फागुन में।।

लेटी   थी   मैं   ले  खटपाटी,
ढूंढत  मोहि  आए फागुन में।

कोरी  -  कोरी    मेरी   चुनरी,
पिया  रँग   लाए    फागुन में।

अँखियाँ    तरस  रही  थीं मेरी,
पलँग    ढिंग   आए फागुन में।

बड़े    - बड़े    पकवान  बनाए,
सैंया    आ   खाए   फागुन  में।

गा  गाकर    के  गीत लिखे थे,
प्रीतम  को   सुनाए  फागुन में।

सास    न बात  करन दे उनसों,
बलम   जब   आए फागुन में।

संग -    सहेली    होली    खेलें,
हम     ही  पछताए   फागुन में।

देवर    से   मैं  बात  न  करती,
'शुभम'    बहकाए  फागुन   में।

💐 शुभमस्तु !

06.03.202011.00अप.

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