रविवार, 11 जून 2023

समयापतन और अप्रत्याशित का साधारणीकरण ● [आलेख ]

 251/2023

   

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●© लेखक 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्

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सूरज समय का द्योतक है।वह अनवरत गतिमान है।उसका उदय,गगन पथ में आरोहण, अवरोहण औऱ अस्त उसके अनेक रूप हैं। किसी वस्तु ,व्यक्ति  के आरोहण में जो दुरूहता और काठिन्य है ,वह दुरूहता अवरोहण में नहीं है।कोई भी वस्तु या व्यक्ति जितनी देर से ऊपर चढ़ पाती है,उसके गिरने में उतना समय नहीं लगता। यही तथ्य सूरज या समय पर भी प्रभावी होता है।

हम औऱ आप सभी जन समाचार पत्रों, टी वी, सोशल मीडिया आदि पर नित्य प्रति जिन घटनाओं को नित्य प्रति देखते,पढ़ते और सुनते आ रहे हैं; उन्हें  देख ,पढ़ और सुनकर हमें कोई आश्चर्य नहीं होता।सब कुछ सामान्य -सा लगने लगा है। यह सब देखनेपढ़ने और सुनने के हम आदी हो चुके हैं। 

बड़ी -बड़ी  रेल दुर्घटनाएँ होती हैं।आकाश पथ में हवाई जहाजों में भीषण एयर क्रेश होते हैं।सड़कों पर नित्य बड़े छोटे वाहन भिड़ंतों में धन  -जन की हानि होती है।अग्निकांड होते हैं। भूकम्प आते हैं। सुनामियां कहर बरपाती हैं। लोग कीड़े मकोड़ों की तरह एक दूसरे का नर संहार कर रहे हैं। स्त्रियों को घरों में मारा और खण्ड- खण्ड कर काटा जा रहा है। मजहब औऱ धर्म के नाम पर मानव ही मानव का शत्रु बन गया है।धर्म,शिक्षा, धर्म, व्यापार,राजनीति के नाम पर आदमी आदमी का रक्त पिपासु बन गया है। बलात धर्मांतरण कर मानव के मानवीय अधिकारों का हनन किया जा रहा है।मानव मानव क्या, पड़ौसी पड़ौसी को, देश समीपस्थ देश को,

एक महाशक्ति दूसरी महाशक्ति को नष्ट करने पर तुली हुई है। बारूद के ढेर पर बैठी हुई इस दुनिया का क्या हश्र होने वाला है!कोई नहीं जानता। मानव अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारते हुए आत्म हंता बना बैठा है। मानवीय अहं की पराकाष्ठा ने उसे अंधा बना दिया है।

मात्र चार पाँच दशक पहले इस प्रकार की घटनाओं को देख सुनकर आदमी थर्रा जाता था। दाँतों तले अँगुली दबा लेता था।उसका दिल दहलाने लगता था। किंतु आज सब कुछ सामान्य हो चला है।यहाँ तक कि अब इस प्रकार की घटनाओं से न हम विचलित होते हैं,न आश्चर्य प्रकट करते हैं और न ही भविष्य के प्रति आशंकित ही होते हैं।अखबार की केवल सुर्खियां पढ़ कर ही पूरा अखबार बाँचा हुआ मान लिया जाता है। रोज - रोज वही। सब एक जैसी ही खबरें, नया क्या है;जिसे पढ़ा जाए! 

वर्तमान में समय का पतन (अवरोहण)जिस गति से हो रहा है, वह अप्रत्याशित औऱ अकल्पनीय है।पिछले पचास वर्षों में समय और मनुष्य के जितने रंग देखे गए हैं, संभवतः उससे पहले कभी नहीं देखे गए  होंगे। अंततः इस आदमी को हो क्या गया है।रामायण औऱ महाभारत के जीवन मूल्य झूठे पड़ गए हैं। संतान अपने माँ बाप का सम्मान नहीं करती।बल्कि उसके धन पर ऐश और 

विलासिता पूर्ण जीवन जीना चाहती है। गुरु शिष्य के सम्बंध तार  - तार हो रहे हैं। भाई - भाई का  शत्रु औऱ मात्र हिस्सेदार बनकर रह गया है।मित्र मित्र की, पत्नी पति की ,पति पत्नी की, प्रेमी प्रेयसी की हत्या कर सुर्खियों में छा रहे हैं। लगता है कि इस आदमी की जिंस से तो ढोर, कीट - पतंगे, पखेरू औऱ जलचर जीव ही बेहतर हैं।

मूलतः मनुष्य भी तो शेर, चीता, गधा ,घोड़ा, गिद्ध ,चील , मच्छर, खटमल की तरह एक जंतु ही है न ! उसकी प्रवृत्तियों से बाहर जा ही कैसे सकता है? मानवीय पतन का दौर उसके विनाश का दौर है। कुछ नहीं पता कि क्या होगा? मानवीय सोच का दूषण उसे कहाँ ले जाकर पटके ,कोई नहीं जानता।

●शुभमस्तु !

11.06.2023◆10.30आ०मा०

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