बुधवार, 28 जून 2023

योग:कर्मसु कौशलम ● [ दोहा ]

 269/2023

 

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●©शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मिले  एक   से एक जो, कहलाता  है   योग।

शक्ति  एकता  की  बढ़े,कहते हैं    सब  लोग।।

अंग - अंग  गतिशीलता, करती  देह  निरोग।

जड़ता को तज कीजिए,मित्रो नित्य सु-योग।।


एक दिवस  के योग से,मिले न इतना  लाभ।

नित्य नियम से जो करे,बढ़ती उसकी आभ।।

पशु - पक्षी करते सभी,नित्य नियम से योग।

वे   औषधि   लेते   नहीं,रहते सदा   निरोग।।


योग: कर्मसु  कौशलम, यही मर्म  है  मीत।

तन-मन  में  दें  संतुलन,चलें नहीं  विपरीत।।

शब्द - भाव के योग से,रचता है कवि  छंद।

कविता में रस-स्रवण कर,बाँट रहा मकरंद।।


योग  नहीं  बस देह  का,प्राणों का   आयाम।

कुंभक  रेचक  कीजिए, वेला ब्रह्म   प्रणाम।।

स्वस्थ देह में स्वस्थ धी,करती सदा  निवास।

योग-साधना जो करे,करके सफल   प्रयास।।


योग     नहीं  है  आज  से,भूलें नहीं  अतीत।

योगेश्वर   श्रीकृष्ण  से,चलें नहीं    विपरीत।।

पातंजलि ऋषि ने किया,जन-जन योग प्रसार।

देह  योग  से  ढालिए, कभी  न   होगी   हार।।


सत्कर्मों   के योग का,सदा सुफल है   मीत।

संतति चले सुमार्ग में,गाती यश  के  गीत।।


●शुभमस्तु !


21.06.2023◆11.45आ०मा०


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