शुक्रवार, 30 जून 2023

पावस● [ सोरठा ]

 278/2023

           

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●©शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कजरी नहीं मल्हार, पावस की ऋतु आ गई।

लिखा न शुभद लिलार,  अमराई  सूनी पड़ी।।

सुने  न   दादुर - गीत, वीर बहूटी    केंचुए।

बतलाओ  हे  मीत, पावस क्यों  बेरंग   है।।


बरसे जलद फुहार,सावन- भादों  माह में।

ऋतु- रानी का प्यार,  पावस है मनभावनी।।

पावस का उपहार,बिजली कड़की  मेघ में।

दंपति सह परिवार,कृषक सभी हर्षित बड़े।।


हरी - हरी  है  घास, खेत, बाग, वन  झूमते।

मिटी धरा की प्यास, पावस में    पशु   कूदते।।

भरे  नदी  तालाब ,  पावस के घन झूमते।

गदला बहता आब,कल-कल नद-नाले करें।।


भीगा -भीगा भोर,पावस की ऋतु आ गई।

लेता हिया  हिलोर,नर-नारी चहके   सभी।।

बरसी पावस मीत,गड़ -गड़ गरजे मेघ दल।

सुरसरि  सम  संगीत,मन मेरा गाने   लगा।।


तरु   से लिपटी बेल,देख -देख  मन झूमता।

पावस का है खेल,विरहिन के उर  आग  है।।

जुगनू   चमके   रात, लालटेन अपनी  लिए।

दिखा न एक प्रभात,पावस की अपनी छटा।


हरे -  हरे    शैवाल,   पावस में उगने   लगे।

धूसर   कोई   लाल,   घूर कुकुरमुत्ते   सजे।।


●शुभमस्तु !


29.06.2023◆11.30आ०मा०

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