बुधवार, 14 जून 2023

अमृत - कलश ● [ चौपाई ]

 255/2023

        

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● ©शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अमृत - कलश   चाहते  सारे।

देव,  दनुज,  मानव    बेचारे।।

नहीं  चाह   से अमृत मिलता।

सुमन स्वेदश्रम से ही खिलता।।


अमृत-कलश देह-श्रम लाता।

शुचि विवेक से मानव पाता।।

जो आया   उसको   है जाना।

छद्म अमरता से क्या पाना??


कर्म  भाग्य   का  है निर्माता।

यों ही  भाग्य न   देता दाता।।

स्वेद -बिंदु से    सींचें  जीवन।

मिले अमरता का सुंदर धन।।


छप्पर फाड़ नहीं धन मिलता।

दिखा न मन की तू चंचलता।।

अमृत - कलश वही नर पाए।

श्रमज वारि जो धरणि बहाए।।


मन-मोदक   सपने में खाए।

बार -बार   वह नर पछताए।।

परजीवी   परधन की चाहत।

करती है तन मन को आहत।।


अमृत-कलश सहज क्यों पाए!

छाले पड़ें    बुद्धि तप जाए।।

मानव-जीवन कठिन कहानी।

नित्य   नई   है   नहीं पुरानी।।


'शुभम्' कलश  अमृत का पाया।

माँ वाणी पद शीश झुकाया।।

परमानंद   मातु   की    सेवा।

देती है   अमृत   भर    मेवा।।



● शुभमस्तु !


12.06.2023◆8.45आ.मा.

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