सोमवार, 4 अगस्त 2025

सावन की शुभताई [ गीतिका ]

 395/2025

    

       



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

  

शुचि सावन की सद  शुभताई।

ऋतु-रानी    वर्षा    ऋतु आई।।


झर-झर झर-झर झड़ी झरी है,

बदली बादल   के  सँग   धाई।


कहाँ गईं   वे   मृदुल   मल्हारें,

गूँजा   करती   थी    अमराई।


वीरबहूटी    विदा    हो    गई,

दिखती एक न कहीं  गिजाई।


करते    टर्र-टर्र     नर   मेढक,

प्रिया  मेढकी   पास    बुलाई।


जुगनू  लालटेन     ले    धाए,

कहें चाँद  की   कमी  मिटाई।


'शुभम्' रात में चमके बिजली,

सही न   जाए   विरह  जुदाई।


शुभमस्तु !


04.08.2025● 12.45आ०मा०

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