395/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
शुचि सावन की सद शुभताई।
ऋतु-रानी वर्षा ऋतु आई।।
झर-झर झर-झर झड़ी झरी है,
बदली बादल के सँग धाई।
कहाँ गईं वे मृदुल मल्हारें,
गूँजा करती थी अमराई।
वीरबहूटी विदा हो गई,
दिखती एक न कहीं गिजाई।
करते टर्र-टर्र नर मेढक,
प्रिया मेढकी पास बुलाई।
जुगनू लालटेन ले धाए,
कहें चाँद की कमी मिटाई।
'शुभम्' रात में चमके बिजली,
सही न जाए विरह जुदाई।
शुभमस्तु !
04.08.2025● 12.45आ०मा०
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