रविवार, 1 जून 2025

न हो परस्पर कटे कटे [गीतिका ]

 234/2025

        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


न   हो   परस्पर    कटे -  कटे।

बिना    संगठन     रहो    घटे।।


मेल   एकता     प्रिय    संवाद,

सिखलाते  सत  से    न   हटे।


विमुख  सनातन   से   मत  हो,

उचित  नहीं  है    मनुज    बटे।


करनी  पर     ही    देना  ध्यान,

रहो    सभी     नर   साथ  सटे।


दृढ़      संकल्प    रहे    मन   में,

चमको   जग  में     छटे -  छटे।


कथनी     करनी    एक      रहें,

पल को भी    मन   क्यों  उचटे ।


'शुभम्'   अहं   का    त्याग करें,

रहो    सत्य      पर   सदा   डटे।


शुभमस्तु !


19.05.2025● 5.15आ०मा०

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