234/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
न हो परस्पर कटे - कटे।
बिना संगठन रहो घटे।।
मेल एकता प्रिय संवाद,
सिखलाते सत से न हटे।
विमुख सनातन से मत हो,
उचित नहीं है मनुज बटे।
करनी पर ही देना ध्यान,
रहो सभी नर साथ सटे।
दृढ़ संकल्प रहे मन में,
चमको जग में छटे - छटे।
कथनी करनी एक रहें,
पल को भी मन क्यों उचटे ।
'शुभम्' अहं का त्याग करें,
रहो सत्य पर सदा डटे।
शुभमस्तु !
19.05.2025● 5.15आ०मा०
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