358/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सावन आया सघन घटा है।
सजल मेघ की रम्य छटा है।।
इतना जल बरसा झर- झर- झर,
जल- थल का संबंध कटा है।
इंद्रधनुष ने रंग बिखेरे,
किंचित घन का गात फटा है।
पर्वत पर शिव शंभु खड़े हैं,
बिखरी भू तक श्याम जटा है।
खेत बाग वन हरे -भरे सब,
परिश्रम को जा कृषक खटा है।
सरिताओं ने कल- कल - कल का,
निशा- दिवस निज पाठ रटा है।
वन में गए भ्रमण करने हम,
खोद - खोद कर प्राप्त गटा है।
'शुभम् ' देख लो अस्ताचल में,
अंबर से कुछ मेघ हटा है।
शुभमस्तु !
20.07.2025●10.45 प०मा० (रात्रि)
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