शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

मुखिया मुख सौ चाहिए [व्यंग्य]

महाकवि बाबा तुलसीदास बहुत पहले ही कह गए हैं :
'मुखिया मुख सौ चाहिए,
खान - पान को एक।
पाले- पोसे सकल अंग,
तुलसी सहित विवेक।।'
   इस विशाल देश में मुखियाओं की कोई कमी नहीं है। हर आदमी मुखिया बनने की कतार में खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। देश का मुखिया, प्रदेश का मुखिया, जिले का मुखिया, तहसील का मुखिया, ब्लॉक का मुखिया, नगर निगम का मुखिया, महापालिका का मुखिया, कॉलेज का मुखिया, स्कूल का मुखिया, गाँव का मुखिया, अपने -अपने विभागों के मंत्रीगण मुखिया, विभागीय सचिव मुखिया, परिवार का मुखिया आदि आदि। इस प्रकार सारा देश मुखियाओं से भरा पड़ा है। अब बात वही बाबा तुलसीदास वाली आती है कि मुखिया मुख के समान होना चाहिए। जिस प्रकार देह के अंदर मुख एक ऐसी जगह है, या कहें ऐसा दरवाजा है , जहाँ से कोई भी खाद्य (अखाद्य भी) देह के अन्दर डाला जाता है , डाला जा सकता है। यही एकमात्र ऐसा द्वार है , जहाँ से भीतर जाने में ही देह के हर अंग का उद्धार है। यही पोषण सारे शरीर के अंग - प्रत्यंग को पालित और पोषित करता है। और सबसे अधिक मज़े की बात ये है कि अंगों को ये कुछ भी नहीं पता कि ये सब आ कहाँ से रहा है ? मुख निस्वार्थ भाव से लेता रहता है औऱ भीतर देता रहता है। यह मानव - देह की कुशल व्यवस्था प्रकृति ने कितने विवेकपूर्वक तैयार की है? यह हमारे लिए बहुत ही अधिक विचारणीय तथ्य है।
   अब आइए उस ओर, जिस ओर हमारे उपरिवर्णीत समस्त मुखिया क्या और कैसे -कैसे खा पचा रहे हैं! इन सबके देह में एक नहीं नौ -नौ दरवाजे हैं। एक दसवाँ औऱ भी है , पर उस बेचारे की तो खुलने की बारी कभी आती ही नहीं । इसलिए उसका ज़िक्र तो करना ही व्यर्थ है और अनावश्यक भी। मुझे यह बताने की भी कोई विशेष आवश्यकता प्रतीत नहीं होती कि ये कौन-कौन से अंग हैं। यद्यपि प्रकृति ने इन्हें कुछ अंदर खाने के लिए तो नहीं ही बनाया, किन्तु आदमी जैसा 'बुद्धिमान' प्राणी निरन्तर नए-नए प्रयोग करता रहता है। अब वह इनसे भी वही अप्राकृतिक काम लेने लग गया है , जो नहीं लेने चाहिए। उसे आँख से भी टॉनिक चाहिए, कान से ऐसा शब्द -श्रवण चाहिए , जिसे सामान्यतः सुनने की अनुमति नहीं है। साहित्य में भी ऐसा रस अभी तक किसी आचार्य ने नहीं खोज पाया , जिसे निंदारस कहते हैं। इस असाहित्यिक, किन्तु सामाजिक औऱ राजनीतिक रस को लेने में उसे विशेष आनन्द आता है। वरन यों कहिए कि आज की सारी राजनीति की धुरी यही निंदा रस है। जिसका एक पंचवर्षीय वासंती मौसम हर पांच वर्ष के बाद अनिवार्य रूप से आता है। जिसमें सबको खुलकर फ़ाग खेलने कीचड़ उछालने औऱ अपने ऊपर फिंकवाने का शौक पूरा करना होता है। वैसे अब तो बारहों मास वसंत की स्थिति हो गई है। सास -बहुओं के लिए यह रस नया नहीं है, क्योंकि इसकी परम्परा सास भी कभी बहू थी , तब से बिना भेदभाव बिना आंशिक अभाव पूर्ण सद्भावपूर्वक चली ही आ रही है। यह समाज - संचारित एक महत्वपूर्ण रस है। कुछ लोगों की तो इस रस पान के बिना रोटी ही नहीं हज़म होती।
   जिन द्वारों को प्रकृति ने विविध प्रकार के विसर्जन हेतु बनाया है, उनसे अपद्रव्य- ग्रहण की नव सभ्यता अप्राकृतिक है । पर क्या कीजिए आदमी का स्वाद -परिवर्तन उत्साह ही अति विचित्र है ! उसके सभी नौ दरवाजे कुछ ऐसे अपदार्थ संयोगों से बलात पोषण देने का कार्य कर रहे हैं।
   ये मुखिया इस प्रकार कार्य नही कर रहे कि आदमी को पता भी न चले कि उसे पोषण दिया गया। बल्कि घण्टे बजा बजाकर , टीवी पर दिखा दिखाकर, अखबारों में छाप - छाप कर ये प्रदर्शन अवश्य कर रहे हैं कि तुम्हारा पोषण हो ,चाहे न हो , पर शोषण तो हम करेंगे ही।कर भरो, जी एस टी भरो, टॉल दो, अपनी सारी पोल दो, पर हमारे जिस्म में रस घोल दो।चवन्नी देकर रुपया वसूलना ही इनका उसूल है। इनके एक नहीं नौ -नौ मुँह हैं। ये मुख मुखिया के नहीं , दुखिया के भी नहीं। ये मुख दुखदाता के हैं।सूरज के कर की तरह इनके कर नहीं।'यदि कर नहीं , तो मर कहीं।' इसी सिद्धान्त पर ये मुखिये बखिये उधेड़ने में संलग्न हैं। चोर बजाते चैन की वंशी। गरीब की जान गले में फंसी। चित भी मेरी पट भी मेरी अंटा मेरे बाप का।
   अब आज के मुखियाओं को नौ नहीं सौ मुख चाहिए । उनके अनुसार तुलसी बाबा के दोहे का अर्थ कुछ इस प्रकार होगा : मुखिया मुख सौ चाहिए अर्थात अब मुखिया को मुख सौ चाहिए ,जिनसे वह अपने अधीनस्थ को उन सौ मुखों में अदृश्य दाँतों के द्वारा खा , चबा सके। वही उसके द्वारा किया भी जा रहा है।एक करोड़ के ठेके में साठ लाख तो सौ मुखों में ही समा जाएगा। शेष 40 लाख जो हो जाय सो करा लो, इस वित्तीय वर्ष में काम हो नहीं पाएगा , अगले में कुछ औऱ बजट बढ़ा लो। सौ मुखों के बन्दर-बाँट से बची हुई पंजीरी जनता को तक़सीम कर दो। इसलिए बाबा शुभमदास कह रहे : मुखिया (को) ,
मुख सौ चाहिए। 
खान-पान को अनेक। 
पाले-पोसे अपन अंग, 
पूरा शून्य विवेक।।

💐शुभमस्तु!
✍लेखक ©
🙉 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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