सोमवार, 29 जून 2026

सबको खुले राम के द्वार [ सजल ]


217/2026

         

समांत          : आर

पदांत           : अपदान्त

मात्राभार       :15.

मात्रा पतन     :शून्य

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संत-असंत       डकैत        लबार।

सबको   खुले    राम    के    द्वार।।


राम-नाम    की    हुई     न    लूट।

राम-दाम        लुटते       उपहार।।


जीजाजी-साले      का        जोड़।

सबकी   मिली- जुली     सरकार।।


चाचा    संग         भतीजा     एक।

लूट     रहा    मंदिर    में     प्यार।।


धाम अयोध्या     धन   का   स्रोत।

नहीं      पता     था    होगी   रार।।


बाँध       पोटली     गहना     नोट।

महल  बनाए       औध     उजार।।


अलग - अलग    हो     पानी- दूध।

कानूनी      पंजा          अनिवार।।


देख  पराए     धन      की     भेंट।

टपक     उठी     रसना   से  लार।।


'शुभम्'   कहानी     बनी   अनेक।

धर्म    किया    अघियों   ने   छार।।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆11.00प०मा०

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