217/2026
समांत : आर
पदांत : अपदान्त
मात्राभार :15.
मात्रा पतन :शून्य
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
संत-असंत डकैत लबार।
सबको खुले राम के द्वार।।
राम-नाम की हुई न लूट।
राम-दाम लुटते उपहार।।
जीजाजी-साले का जोड़।
सबकी मिली- जुली सरकार।।
चाचा संग भतीजा एक।
लूट रहा मंदिर में प्यार।।
धाम अयोध्या धन का स्रोत।
नहीं पता था होगी रार।।
बाँध पोटली गहना नोट।
महल बनाए औध उजार।।
अलग - अलग हो पानी- दूध।
कानूनी पंजा अनिवार।।
देख पराए धन की भेंट।
टपक उठी रसना से लार।।
'शुभम्' कहानी बनी अनेक।
धर्म किया अघियों ने छार।।
शुभमस्तु,
28.06.2026◆11.00प०मा०
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