शनिवार, 31 अगस्त 2024

धारा [ कुंडलिया ]

 374/2024

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

धारा  नव निर्माण   कर, रहते  धीर सुजान।

मुर्दावत    बहते   नहीं,  सरिता  में प्रज्ञान।।

सरिता  में   प्रज्ञान, सोच  में  मौलिक  होते।

करते  पथ-प्रस्थान, लगाते  मन  से गोते।।

'शुभम्' धार  विपरीत,चलाते बन ध्रुव तारा।

शुभता  जिनकी  नीति,बनाते वे नव धारा।।


                         -2-

धारा  गंगा   की  बहे, कलकल छलछल  नित्य।

मुदित  तृप्त  होती  धरा, चमके  नभ आदित्य।।

चमके  नभ  आदित्य, विटप जलजीव  सिहाएँ।

अमराई   वन    बाग,    खेत    ऊसर  उमगाएँ।।

'शुभम्'  मनुज  थल जीव,गगनचर उमड़े   प्यारा।

सुरसरिता   की   धार,  पावनी अविरल   धारा।।


                        -3-

धारा    पावस  मेघ  की,यदि  बरसे अविराम।    

बूँद - बूँद  गिरतीं   नहीं, करती   छोटे  काम।।

करती   छोटे   काम, सहन  कब  होता  पानी।

चले    सुनामी   तीव्र,  मरे   सबकी ही  नानी।।

'शुभम्'  प्रकृति  का  खेल,नहीं है कोई  कारा।

झीनी    जलकल   रेल,  बने वर्षा की   धारा।।


                         -4-

धारा  वचन  प्रवाह   की,माँ की कृपा   अपार।

कविता की  रसधार  है,भावों का मधु   प्यार।।

भावों   का मधु  प्यार,बने कवि की सुरसरिता।

देती   है    सुखसार,  दुःख  ओघों की   हरिता।।

'शुभम्' सृजन  साहित्य,चमकता बन उजियारा।

गद्य - पद्य    आदित्य,  जगत     में बहती धारा।।


                        -5-

धारानगरी  भोज  की, जन-जन  कवि    विद्वान।

आनन  से कविता  बहे, ऋषि मजदूर  किसान।।

ऋषि  मजदूर    किसान,छंदमय  बोलें   वाणी।

भारत   नगर  महान,   बनी  कविता कल्याणी।।

'शुभम्'  यथा   हो  राज,तथा हो जन उजियारा।

शोषक  का हो  नाश,  नहीं   अब नगरी   धारा।।


शुभमस्तु !

31.08.2024●4.45प०मा०

                   ●●●

चारा [कुंडलिया ]

 373/2024

                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                      -1-

चारा    चाभें      देश   के,  गोरे  काले    ढोर।

चोर  उन्हें  कहना  नहीं, करते नित्य  किलोर।

करते    नित्य    किलोर,  खेत  में  छुट्टा   घूमें।

स्त्रीलिंगी     थाम,अधर   कसकर   जा    चूमें।।

'शुभम्'  नीति  के  नाथ,  नहीं  कहना  हत्यारा।

खूँटा    पावन   धाम,  चैन   से   चाभें    चारा।।


                         -2-

चारा - पाचन  के  लिए,नहीं  सभी का  काम।

सुदृढ़  तन  का  तंत्र    हो, अंतर  कब्र  सुधाम।।

अंतर   कब्र    सुधाम,   सड़क  सीमेंट   पचाएँ।

डंडे   से   भयभीत,   नहीं   पल   को  घबराएँ।।

'शुभम्'     बढ़ें   संतान,  रास  आती है   कारा।

रहे    ढोर   के     ढोर,  मिले   बे   पैसे   चारा।।


                         -3-

पढ़ना  अब    साहित्य   में,  मित्रो  चारावाद।

कार्यालय   में  भी  बजा,  चारे  का घननाद।।

चारे   का   घननाद,  अछूते  कब अधिकारी।

धुला   दूध    से   कौन,   छूत  की  है  बीमारी।।

'शुभम्' नीति को  छोड़,नया भारत अब गढ़ना।

चारा   है    बेजोड़,   पुस्तकों    में   ये  पढ़ना।।


                         -4-

चारा   खातीं    नाद  पर, भेड़ बकरियाँ   भैंस।

खड़े - खड़े   सब कर्म  हों,कहाँ मानुसी  सेंस।।

कहाँ  मानुसी   सेंस, नित्य  कर्मों  की    चर्चा।

करना  है      बेकार,   वृथा   उपदेशी  पर्चा।।

'शुभम्'  मनुज के हेतु,यथा   घर वैसी   कारा।

विश्व -भ्रमण  का   सेतु,खुला फैला है  चारा।।


                         -5-

चारा    चटनी   चूरमा, चमके  चिकना      चाम।

चार धाम   निज पाँव में, जन-जन जाने    राम।।

जन -जन  जाने राम,  झलक  को जनता तरसे।

समझे    कूड़ा - घास,  सात  पीढ़ी तक   हरसे।।

'शुभम्'  प्रकटते कृष्ण,पूज्य वह उनको   कारा।

रुचे  न   रोटी - दाल,  शुष्क  मेवों का    चारा।।


31.08.2024●2.15प०मा०

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चरित्रार्थी [ अतुकांतिका]

 372/2024

                 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चरित्रार्थी  कहाँ ?

जब निकल ही गई है

अर्थी चरित्र की!

अवसर नहीं जिसे मिला

चरित्रवान बस वही।


किसी की मूँछ के नीचे

किसी की पूँछ के तले

आवृत है चरित्र!

हटी जब मूँछ

या उठी जब पूँछ

यथार्थ कुछ और ही था।


नेता या अधिकारी

नर हो या नारी

चरित्र की लाचारी,

दूध का धुला

 कोई तो नहीं!


रेशम या खद्दर

आवरण बने सुंदर,

सम्मान बस कपड़े का

छिपा हुआ नीचे 

कोई हवस का हैवान !

आज का इंसान।


खुली नहीं पोल

दुनिया है गोल

हीनता अनतोल,

अर्थी उठाए फिरते हैं

अपनी ही 

अपने कंधों पर।


पर छिद्रों को चौड़ाना

आदमी का काम है,

अपनी मूँछ उठाना

इसी में नाम है!

जहाँ भी जाए 'शुभम्'

अँधेरा ही अँधेरा है,

निकट नहीं सवेरा है।


29.08.2024●8.30प०मा०

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बुधवार, 28 अगस्त 2024

हिंदी हिय का हार [ गीत ]

 371/2024

     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हिंदी हिय का हार

शाटिका देवनागरी

सुता संस्कृत की प्यारी।


जन-जन जिह्वा वास

मधुरिमा मधु की मानो

'अ' से 'ज्ञ' मधु सिंधु समाई।

रंग - रंग के छंद

दसों रस छंद विविधता

धरा हिंद   की  गंगा  धाई।।


शब्द शक्तियाँ अभिधा

ललित लक्षणा तीनों

श्रेष्ठ व्यंजना सबसे न्यारी।


हिंदी से है हिंद 

शीश का बिंदु दमकता

सनातनी संस्कृति शोभी।

विदा हुए तज देश

लुटेरे अत्याचारी 

शोषक आतंकी  लोभी।।


हिंदी भाषा  शुभता 

साहित्यिक सरिता शोभित

हिंदभूमि ममता - क्यारी।


जन्मे सूर कबीर

दोहाकार बिहारी

दास तुलसी  पंत निराला।

घन आनंद प्रसाद

खिली कवियों की क्यारी

हिंदी का साम्राज्य विशाला।।


'शुभम्' - धर्म हिंदी ही

सहज समर्पित निशि -दिन

नहीं सुत को हिंदी भारी।


शुभमस्तु !


28.08.2024● 11.00आ०मा०

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भादों कृष्ण निशीथ में [ दोहा ]

 370/2024

     

[पीहर,भादों,कजरी,बदरी,पपीहा]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


               सब में एक

पीहर से  आई     यहाँ,  भूली बाबुल  - धाम।

रम कर जग-ससुराल में,भाया मन को काम।।

पीहर  की   स्वाधीनता, मिले  नहीं  ससुराल।

गए  खेल - क्रीड़ा सभी,बदल गया सब हाल।।


भादों कृष्ण निशीथ में, प्रकट  हुए  घनश्याम।

द्वापर युग कृतकृत्य कर,धन्य किया ब्रजधाम।।

सावन भादों में   धरा, करे  नीर की   तृप्ति।

पावस नित मनभावनी, परिणामी प्रिय भक्ति।।


कजरी  मेघ  मल्हार के, सावन भादों   मास।

अमराई    सूनी  पड़ी,   झूले   रही  न   घास।।

कजरी  गाती  मालिनी, झूम-झूम कर  नृत्य।

मनमोहक  मादक लगें,मलय पवन- से  कृत्य।।


प्रकट   हुए  ब्रजधाम  में, वासुदेव घनश्याम।

बदरी  झर-झर कर झरे,गोकुल गाँव ललाम।।

बदरी   बादल   से  कहे, मत बरसाना  और।

बैठ  सूप   में  जा  रहे, ब्रजवल्लभ सिरमौर।।


पीउ-पीउ पपीहा  करे, स्वाति बूँद  की  चाह।

विरहिन  की उर - पीर में, बढ़ने लगा उछाह।।

पपीहा- सी  निष्ठा  मिले,  लक्ष्य साधना - हेतु।

तृषा  मिटे निज  साध  की,फहराए यश- केतु।।


               एक में सब

सखियाँ कजरी गा रहीं,पीहर भादों मास।

बदरी उमड़ी  बाग में, पपीहा बोले   पास।।


शुभमस्तु !


27.08.2024●10.45 प०मा०

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क्रीड़ा करते युवा किशोर [ गीत ]

 369/2024

        

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कूद - कूद कर

यमुना जल में

क्रीड़ा करते युवा किशोर।


तट पर सघन

झाड़ियाँ  छाईं

जल में लहरें लहर अनेक।

हरी- हरी है

घास झुरमुटी

टर्र -टर्र करते  बहु भेक।।


सुमन घास में 

खिलते नन्हे

जल में उठता कलरव घोर।


मेरे जैसी

कौन लगाए

जल में लंबी बड़ी छलाँग।

होड़ लगाते

बाल परस्पर

करें सखा से ऊंची  माँग।।


चले जा रहे

बढ़ते आगे

दूर बोलते वन में मोर।


अधनंगा है

कोई बालक

कोई  वस्त्र पहन रंगीन।

भीगे सजल

देह पर लिपटे

कोई  मोटे और  महीन।।


'शुभम्' लग रहा

बरसेंगे अब

श्याम मेघ नभ से घनघोर।


शुभमस्तु !

27.08.2024● 1.00आरोहणम मार्तण्डस्य।

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सोमवार, 26 अगस्त 2024

पर्व सुपावन रक्षाबंधन [ गीतिका]

 368/2024

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हरा  भरा   आया    शुभ   सावन।

पर्व        सुपावन       रक्षाबंधन।।


प्रमुदित  भगिनि  बाँधती    राखी,

भ्राता का  हर्षित  है   तन -  मन।


थाल   सजा   मिष्ठान्न    खिलाती,

पायल बजती  पद में  छन - छन।


लगा   भाल  पर    रोली  - टीका,

मुक्तावत    चमकें    अक्षत   कन।


पाँव  छुएँ     भगिनी    के   भैया,

भैया   देता   अमर   वचन   धन।


सनातनी    हिन्दू    के घर -   घर ,

आता  पर्व   मनोहर    प्रति  सन्।


'शुभम्'   भगिनि  नारी   को मानें,

हो न   देश में    कहीं    दनुजपन।


शुभमस्तु !


26.08.2024●8.30आ०मा०

                   ●●●

पर्व रक्षाबंधन [ सजल ]

 367/2024  A

            


समांत       :अन

पदांत        :  अपदांत

मात्राभार   :16

मात्रा पतन : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हरा  भरा   आया    शुभ   सावन।

पर्व        सुपावन       रक्षाबंधन।।


प्रमुदित  भगिनि   बाँधती   राखी।

भ्राता का  हर्षित  है   तन -  मन।।


थाल   सजा   मिष्ठान्न    खिलाती।

पायल बजती  पद में  छन - छन।।


लगा   भाल  पर    रोली  -  टीका।

मुक्तावत    चमकें     अक्षत   बन।।


पाँव  छुएँ      भगिनी    के    भैया।

 रक्षा    के   दे    भैया     सुवचन ।।


सनातनी    हिन्दू     के घर -   घर ।

आता  पर्व    मनोहर    प्रति  जन।।


'शुभम्'   भगिनि  नारी   को मानें।

हो न   देश में    कहीं    दनुजपन।।


शुभमस्तु !


26.08.2024●8.30आ०मा०

                   ●●●

पर्व रक्षाबंधन [ सजल ]

 367/2024

              

समांत       :अन

पदांत        :  अपदांत

मात्राभार   :16

मात्रा पतन : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हरा  भरा   आया    शुभ   सावन।

पर्व        सुपावन       रक्षाबंधन।।


प्रमुदित  भगिनि   बाँधती   राखी।

भ्राता का  हर्षित  है   तन -  मन।।


थाल   सजा   मिष्ठान्न    खिलाती।

पायल बजती  पद में  छन - छन।।


लगा   भाल  पर    रोली  - टीका।

मुक्तावत    चमकें    अक्षत   कन।।


पाँव  छुएँ     भगिनी    के   भैया।

भैया   देता   अमर   वचन   धन।।


सनातनी    हिन्दू    के घर -   घर ।

आता  पर्व   मनोहर    प्रति  सन्।।


'शुभम्'   भगिनि  नारी   को मानें।

हो न   देश में    कहीं    दनुजपन।।


शुभमस्तु !


26.08.2024●8.30आ०मा०

                   ●●●

यौवन काम-दाम में बीते [गीतिका]

 366/2024

       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समझ  न   पाया   मानव   जीवन।

जीर्ण  जरा  है  रहा  न    बचपन।।


यौवन   काम  -  दाम    में    बीते,

दिखा  रहा  कितने  ही   ठनगन।


शैशव     में    अबोधता      छाई,

हुआ  कुमार     गूँजती   छनछन।


गए     अठारह     खेलकूद     में,

आँखें  बंद   छा    गया    छादन।


साथ  मिला  नारी   का   नर  को,

कभी  हर्ष  कब   होती  अनबन।


संतति  - मोह न  गया एक   पल,

सूख हुआ   है  दुर्बल   ये     तन।


'शुभम्'  आजकल   करते   बीता,

गया  साथ  में एक न   लघु  कन।


शुभमस्तु !

26.08.2024●5.00आ०मा०

                  ●●●

समझ न पाया [सजल]

 365/2024

           

समांत      : अन

पदांत       : अपदांत

मात्राभार   :16

मात्रा पतन : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समझ  न   पाया   मानव   जीवन।

जीर्ण  जरा  है  रहा  न    बचपन।।


यौवन   काम  -  दाम    में    बीते।

दिखा  रहा  कितने  ही   ठनगन।।


शैशव     में    अबोधता      छाई।

हुआ  कुमार     गूँजती   छनछन।।


गए     अठारह     खेलकूद     में।

आँखें  बंद   छा    गया    छादन।।


साथ  मिला  नारी   का   नर  को।

कभी  हर्ष  कब   होती  अनबन।।


संतति  - मोह न  गया एक   पल।

सूख हुआ   है  दुर्बल   ये     तन।।


'शुभम्'  आजकल   करते   बीता।

गया  साथ  में एक न   लघु  कन।।


शुभमस्तु !

26.08.2024●5.00आ०मा०

                  ●●●

दनुज दरिंदे [अतुकांतिका]

 364/2024

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राखी भैया दूज

नहीं पर्याय,

मात्र प्रतिलोम

दरिंदों के,

नोंच रहे जो पंख

उड़ रही

नारी - परिंदों के।


किसी मुखौटे के

नीचे छिप बैठा

दनुज दरिंदा,

कोई नहीं जानता

माँस खींचता जिंदा।


जिसकी माता

भारत माता!

जन गण मन 

अधिनायक गाता,

उसका नारी से

ये कैसा नाता?


कहना

 सभी दरिंदों को

मानव

है यह झूठ,

ओढ़े खाल

 मनुज की

वे हिंस्र सुबूत।


कहना पशु 

या ढोर,

 इन्हें अपमानित करना,

'शुभम्' भगिनि माताओ!

उनसे बचकर रहना!


शुभमस्तु !


22.08.2024●9.45आ०मा०

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द्वापर युग के श्याम [ दोहा ]

 363/2024

          

[अच्युत,अलंकृत,गोरक्षक,सूर्यसुता,जन्माष्टमी]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक

भादों  कृष्ण  निशीथ में,अच्युत का  अवतार।

धन्य   हुईं   माँ  देवकी,  पितु  वसुदेव उदार।।

त्रेतायुग   के  राम  हैं, द्वापर   युग  के   श्याम।

अच्युत प्रभु  आनंदघन,अवध मधुपुरी   धाम।।


किया अलंकृत मातृ को,साथ जनक भी धन्य।

भाग्यवती  माँ  देवकी,  पितु   वसुदेव  अनन्य।।

ब्रज  में  मथुरा  धन्य  है,करें अलंकृत   श्याम।

सँग में  राधा   शक्ति  भी,  शुभ वृंदावन   धाम।।


गोरक्षक   गोपाल  की , ब्रज पर कृपा  अपार।

गोवर्धन   धारण   किया, रुकी   इंद्र जलधार।।

वास    करें  गो   मात  में,  देव  कोटि  तैंतीस।

गोरक्षक  बन  पूजिए, साहस कर   इक्कीस।।


सूर्यसुता   यमुना     नदी,  महिमा   अपरंपार।

नाग  कालिया  नाथ  कर,किया कृष्ण  उद्धार।।

सुरसरिता    गंगा   नदी, सूर्यसुता का    संग।

संगम   तीर्थ    प्रयाग  का,  नित्य नए   नवरंग।।


श्रीकृष्ण  जन्माष्टमी ,   का आया शुभ  पर्व।

सनातनी   पूजें   सभी,  धरे  हृदय  में   गर्व।।

संस्कृति पर है  गर्व अति,ब्रज में आए  श्याम।

कहलाती जन्माष्टमी,  हर्षित नर हर    वाम।।


                एक में सब

गोरक्षक   अच्युत हुए,  सूर्यसुता  के    तीर।

हुई   अलंकृत  मधुपुरी, जन्माष्टमी   प्रवीर।।


शुभमस्तु !


20.08.2024●11.00प०मा०

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मंगलवार, 20 अगस्त 2024

र' से राजनीति [ व्यंग्य ]

 362/2024


 

 ©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 संसार की किसी भी वस्तु,व्यक्ति, जीव,भाव आदि के नाम का प्रभाव उस पर अवश्य पड़ता है।अब मुझे ही ले लीजिए।मेरे नाम का पहला अक्षर है 'र' ; जो अपने आकार और रूप ढंग से पहले से ही टेढ़ा है।इसी 'र' से शब्द बना 'राज',जो श्लेषात्मक और अत्यंत रहस्यपूर्ण है। जिस शब्द का पहला अक्षर और शब्द ही वक्र हों,उससे ऋजुता की आशा कैसे की जा सकती है ? जब 'राज' और 'राजनीति' की अतल गहराई में उतरते हैं,तो जो प्राप्त होता है ;वह आश्चर्यान्वित करने वाला है।

  जहाँ ऋजुता न हो, राजनीति वहीं पाई जा सकती है।राजनीति में योग्यता की न तो आवश्यकता है और न ही उपादेयता।दुनिया के समस्त क्षेत्रों में असफलता की उपाधि ही इसका सर्वोत्तम मानक है।राजनीति सीखने का न कोई स्कूल कालेज है और न ही विश्वविद्यालय। यह तो खुद -ब-खुद उगने वाला वह खजूर है,जो रेगिस्तान में अपने सदाबहारी रूप में फलता-फूलता है। जिस घर में राजनेता का एक भी रूख उग आए, उसकी तो बारह मास पौ बारह ही समझिए।वह घर झोंपड़ी से महलों में तब्दील हो जाता है।मानो सुदामा के घर में रुक्मिणी पति श्रीकृष्ण के कदम पड़ गए हों। वहाँ की मिट्टी भी सोना बन जाती है।

  'राज' के साथ किसी प्रकार की 'नीति' का दूर -दूर तक कोई निकट सम्बंध नहीं है।'राज' तो भारतीय मर्दानी धोती के ऊपर वह 'टाई' है, जिसका अर्थ और काम ;सब कुछ बाँधना ही है।वह व्यक्ति,समाज, देश,धन,दौलत,धर्म,शिक्षा,वाणिज्य, व्यवसाय,धरती,समुद्र,पर्वत, आकाश आदि सबको बाँध कर चलती है।सबको परतंत्र बनाकर अपनी टाँगों तले दबाकर रहना जानती है। मुझ राजीनीति की यह मान्यता उसकी रग - रग में समाई है कि वह सर्वोपरि है। वह सर्वश्रेष्ठ है। वह सबकी इष्ट है। इसीलिए तो एक अँगूठाटेक राजनेता आई, ए. एस. और आई.पी.एस.पर राज करता है। 

  राजनीति का तंत्र ही ऐसा निराला है, जहाँ केवल वही गोरी है शेष सब काला है।ज्यों-ज्यों यह उग्र होती जाती है,उसकी उग्रता की पराकाष्ठा बढ़ती जाती है।अहंकार और तानाशाही मेरे विशिष्ट गुण हैं।इसका अदना - सा राजनेता फुंकारता हुआ फण है। चमचों और गुर्गों की तो राजनीति में बारहों मास बहार है।राजनेता की आँखों में अहर्निश जहर को जुहार है।संभव है कि मंदिर में देवता के दर्शन हो जाएँ , पर राजनेता के दर्शन चुनाव के बाद वोटों के बुनाव पर ही हो पाएं।यदि उसके दरबार कोई कभी जाए,तो बिना दर्शन किए लौट के घर आए।

 राजनीति और राजनेता के केवल जुबान ही होती है।वह बस बोलना जानती है। जब उसके कान ही नहीं ,तो भला सुने कैसे ?इसलिए वह बहरी है। उसकी कोई तली ही नहीं कि कोई जान सके वह कितनी गहरी है !वह भले ही गाँव की झोपड़ी में या झुग्गी में पैदा होती हो,पर सदा शहरी है।दिखावे के लिए वह खाती चावल दाल की तहरी है,पर कञ्चन कार और कामिनी में आस्था गहरी है।रथ,रबड़ी,रमणी,रस,राजा,रानी, आदि सभी उसके परिवार के सदस्य हैं। 

राजनीति की एक खास बात यह भी है कि वह निर्मोही है। अनासक्त है। आम जन से विरक्त है। उसके लिए जन - जनता त्यक्त है।फिर भी आम जन उसका भक्त है।भले ही हर व्यक्ति इससे घृणा करता हो,पर मन में यही भाव होता है कि राजनीति ही सर्वश्रेष्ठ है।वही तो सबकी ज्येष्ठ है।सबसे वरिष्ठ है।पर सब कुछ सबके लिए नहीं होता। सृजनकर्ता सबको अलग-अलग गुण देता।उसी के अनुरूप वह देह के अंडे सेता।अब चाहे वह आम आदमी हो,अधिकारी ,व्यवसायी अथवा नेता।जिसकी जितनी लंबी सौर हो, पैर वह फैलाए तेता।जनता डाल -डाल है तो नेता पात - पात है।यहाँ न कुछ पाप है और न पुण्य है। राजनीति के शहद में जो लिपट गया, वह धन्य है। हर खास-ओ- आम के लिए अनुमन्य है।नज़र - नज़र में वही अग्रगण्य है।

 शुभमस्तु ! 

 20.08.2024●4.15प०मा०


 ●●●

क्षितिज-छोर छाई हरियाली [ गीत

 361/2024

    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जहाँ - जहाँ

दृग - दृष्टि दौड़ती 

क्षितिज - छोर छाई हरियाली।


सघन सजे तरु

पल्लव दल से

फसलें खड़ीं खेत में  झूमें।

ऊँचे विटप 

खड़े मेड़ों पर 

अंबर की चोटी को चूमें।।


बहती हवा

विरल शीतल - सी

नाच रही हर डाली -डाली।


विटप -छाँव में

पड़ी खाट पर

लेट - बैठ   निगरानी करते।

आवारा पशु

फसल न खाएँ

कृषक थकान देह की हरते।।


वहीं पास में

बरहा बहता

चौड़ी भरी सलिल से नाली।


अहा प्रकृत

जीवन भी क्या है

क्यों न सभी जन इनको चाहें!

शुद्ध हवा पानी

असीम हैं 

खोल खड़ी है  प्रकृति  बाँहें।।


'शुभम्' एक झपकी

आ ले ले

पड़ी खाट पर दुपहर वाली।


शुभमस्तु !


20.08.2024● 5.00आ०म०

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श्रावणी पर्व [ गीतिका ]

 360/2024

                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मास      पाँचवाँ      सावन    आया।

पर्व    श्रावणी    आज       मनाया।।


भगिनी      राखी      लिए    पधारी,

भ्राता   ने   कर      में      बँधवाया।


करती  भ्रातृ  -   भाल   पर   टीका,

घर  में    उत्सव  -  हर्ष     सवाया।


कजरी  गीत    मल्हार    न    झूले,

फिर  भी  गीत  नेह    का   गाया।


महक  रहा   घेवर     घर -  घर में,

मिल्क   केक  कोई   घर   लाया।


बूरा    मधुर      सिवइयाँ     खाते,

अमराई    की    शीतल     छाया।


पाँव   छुए   भगिनी     के    भैया,

बड़ी बहिन  का   आशिष   पाया।


वचन   दिया   भगिनी  -  रक्षा का,

सदा   रहे    भ्राता     का    साया।


'शुभम्'      मनाएँ        रक्षाबंधन,

तन   -  मन   में   आनंद  समाया।


शुभमस्तु !


18.08.2024●10.30प०मा०

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पर्व श्रावणी [ सजल ]

 359/2024

           

समांत     : आया

पदांत      : अपदांत

मात्राभार  :16.

मात्रा पतन : शून्य

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मास      पाँचवाँ      सावन    आया।

पर्व    श्रावणी    आज       मनाया।।


भगिनी      राखी      लिए    पधारी।

भ्राता   ने   कर      में      बँधवाया।।


करती  भ्रातृ  -   भाल   पर   टीका।

घर  में    उत्सव  -  हर्ष     सवाया।।


कजरी  गीत    मल्हार    न    झूले।

फिर  भी  गीत  नेह    का   गाया।।


महक  रहा   घेवर     घर -  घर में।

मिल्क   केक  कोई   घर   लाया।।


बूरा    मधुर      सिवइयाँ     खाते।

अमराई    की    शीतल     छाया।।


पाँव   छुए   भगिनी     के    भैया।

बड़ी बहिन  का   आशिष   पाया।।


वचन   दिया   भगिनी  -  रक्षा का ।

सदा   रहे    भ्राता     का    साया।।


'शुभम्'      मनाएँ        रक्षाबंधन।

तन   -  मन   में   आनंद  समाया।।


शुभमस्तु !


18.08.2024●10.30प०मा०

               ●●●

पर्व श्रावणी आज [ दोहा ]

 358/2024

        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पर्व  श्रावणी  आज  है,  घर -घर में आनन्द।

रक्षा का  बंधन  करे,  जन -जन को स्वच्छंद।।

भगिनी  बाँधे  हाथ  पर,  राखी-सूत्र अमोल।

अपने भ्राता को करे,प्रमुदित हृदय- हिलोल।।


घेवर   के    मिष्ठान्न    का,  रक्षाबंधन  पर्व।

अपने भ्राता    पर  करे,नारी सुहृद सु  गर्व।।

कजरी   भूलीं   नारियाँ,  भूलीं  गीत मल्हार।

अमराई    सूनी   पड़ी,   दुर्लभ    पूर्व बहार।।


सावन में  झर- झर  झरें , बरसें श्यामल  मेह।

चिकुर   भीगते   रीझते,स्नात कंचुकी   देह।।

रक्षक     सारे    देश   के ,  सीमा  पर तैनात।

नहीं   आ    सके   देहरी,  बाट देखती  मात।।


विदा    हुए    झूले  कहाँ, कजरी मेघ  मल्हार।

खोले  खड़ी   कपाट  दो, भगिनी अपना  द्वार।।

मधुर   सिवइयाँ    दूध  की, दधि बूरे के  साथ।

परस खिलाती बंधु को,लगा तिलक शुभ माथ।।


सजे  हुए  बाजार  हैं,  सज्जित  सभी  दुकान।

राखी  मधुर   मिठाइयाँ, सबकी  अपनी शान।।

मन  में  मोदक  फूटते, भगिनि  भ्रात का नेह।

पावनता  में   एक   ही,  तनिक  नहीं  संदेह।।


दिवस आठवें आ  रहा,कृष्ण जन्म का  पर्व।

सनातनी   प्रमुदित  सभी, पूजें कान्ह  सगर्व।।


शुभमस्तु !


18.08.2024●3.45प०मा०

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शनिवार, 17 अगस्त 2024

आचारों का अचार [ आलेख ]

 357/2023

            

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

सत्य बात तो यह है कि आदर्श आचार संहिता जैसी कोई बात नहीं होती।यदि यह जीवन आदर्शों की पटरी पर ही चलने लगे,तो दौड़ना तो क्या रेंगना भी असम्भव हो जाए।'आदर्श' जैसा शब्द किताबों में बहुतसुशोभित होता है।सदैव से होता भी रहा है।किंतु वास्तविकता यही है कि वह किताबों में लिखा ही रह गया है। और आदर्शों की उस किताब को आज तक  किसी ने खोलकर भी नहीं देखा। उसके पन्नों की धूल तक कभी नहीं झाड़ी गई।यह ठीक वैसे ही है ,जैसे चुनावों में आचार संहिताकी किताब सबको पढ़ने समझने और करने के लिए दी जाती है,किंतु कोई भी पीठासीन अधिकारी उसे खोलकर भी नहीं देखता।यदि वह उसे पढ़ने की कोशिश भी करे तोएक वोट भी नहीं डलवा सकता।उसके प्रशिक्षण कार्यक्रम में उसे यही सिखाया जाता है,कि 'जैसी बहे बयार तबहिं रुख तैसौ कीजै।' अर्थात स्वमति से काम लेते हुए ही कार्य का संपादन करें न कि किताब के पन्ने पलटते रहें।

         इससे यही स्पष्ट होता है कि व्यवहारिक ज्ञान ही काम आता है।किताब तो इसलिए लिखी जाती है कि 'रसीद लिख दी ताकि वक्त पर काम आए।' इस प्रकार 'आदर्श' और 'व्यवहार' :दो अलग-अलग बातें हैं। व्यवहार आदर्शों से कभी मेल नहीं खाते। हर समय ,स्थान (भूगोल) और परिस्थिति की व्यवहारिकता अलग -अलग होती है।लकीर के फ़क़ीर बनकर चलना न तो उचित है और न सम्भव ही।घासपात भी जलवायु के अनुकूल उगती है।गर्म देशों और प्रदेशों के पेड़ पौधे ठंडे स्थानों से भिन्न ही हुआ करते हैं।

हमारे 'आदर्श' हमें दर्श अर्थात देखने और दिखाने के हाथी दाँत हैं।जबकि 'व्यवहार' से करणीय का समाहार होता है।जरूरत पड़ने पर अपने और दूसरे के बचाव के लिए अपनी गाड़ी सड़क से फुटपाथ  पर भी उतारनी पड़ जाती है।जबकि सड़क पर चलने का आदर्श यह नहीं कहता कि सड़क छोड़ पगडंडी चलें।व्यवहार ही हमें गाड़ी को आत्म रक्षार्थ और परात्म रक्षार्थ लीक छोड़ अलीक चलने के लिए तत्काल ज्ञान देता है। हमारा समग्र मानव जीवन ही ऐसा है कि वहाँ व्यवहार ही सर्वोपरि हो जाता है।

          प्रकृति के समस्त जीवधारी पशु,पक्षी,पेड़,पौधे,लताएँ,जलचर,थलचर किसी आदर्श की किताब से जीवन नहीं जीते।उन्हें भी अपने व्यवहार ज्ञान से यथा परिस्थिति चलना पड़ता है।प्रकृति ने सबको अलग प्रकार की कार्य शैली की क्षमता प्रदान की है। बुनकर पक्षी   बया कितना सुंदर और कारीगरी से स्व नीड़ का निर्माण करता है तो कोयल को घोंसला बनाना ही नहीं पड़ता और उसके अंडे बच्चे कौवे के  घोंसले में  पलते  - बढ़ते हैं। शेर , चीता, खरगोश, हिरन, सियार,चूहा, बिल्ली,  कुत्ता, गाय,बैल,मुर्गा,गौरैया,कबूतर, मोर आदि सबकी जीवनचर्या  पृथक -पृथक है।वे न स्कूल कालेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ते या प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं और न मनु स्मृति,गीता, वेद,पुराण, कुरान,बाइबिल ही उनके आदर्श हैं।वहाँ मात्र व्यवहार ही व्यवहार है। वही जीवन का सदाचार है।वही जीवनाधार है।पढ़े -लिखे और बिना पढ़े -लिखे जन किताबी जीवन नहीं जीते।आदर्शों की किताबें तो अलमारियों की शोभा मात्र हैं।

यहाँ प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है कि जब आदर्शों की मोटी-मोटी पोथियों की जरूरत ही नहीं तो ये लिखी ही क्यों गईं।अचार को दाल सब्जी की तरह नहीं खाया जाता। इसी प्रकार  हमारे 'आचारों का अचार' तभी काम आता है ,जब या तो घर में दाल-सब्जी समाप्त हो गई हो  अथवा हमें 'आचारों के अचार' का  स्वाद भर लेना हो। यदि रामायण पढ़कर राम बन जाते ,तो  त्रेता से कलयुग तक करोड़ों रामों का निर्माण हो जाता। यदि सीता के चरित्र से कोई नारी सीता बनती तो घर -घर की कहानी कुछ और ही होती।रावण,सूपनखा,धृतराष्ट्र, दुर्योधन,कंस आदि चरित्रों के लिए कोई रामायण महाभारत नहीं लिखे पढ़े जाते। ये चरित्र तो कुकुरमुत्ते की तरह खुद- ब -खुद  माताओं की कोख फाड़कर निकल ही आते हैं।परंतु राम,भरत,लक्ष्मण,शत्रुघ्न, सीता ,उर्मिला,कृष्ण जैसे आदर्श प्रत्यावर्तन नहीं करते।यही आदर्श और व्यवहार का अंतर है। आदर्श एक मंत्र है तो व्यवहार एक आम तंत्र है।जिसके लिए जीव मात्र क्या  मानव मात्र स्वतंत्र है।

शुभमस्तु !

17.08.2024● 1.15प०मा०

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शुक्रवार, 16 अगस्त 2024

जवासा [अतुकांतिका]

 356/2024

                      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


है नया 

कुछ भी नहीं,

सब कुछ वही,

बस शोध 

करना शेष

बने  शोधार्थी कवि

और लेखक।


शैलियाँ, भाषा, विधाएँ

पृथक सबकी

छंद, लय, तुक,

रस,उक्ति की 

कहन के हैं

 रूप अद्भुत।


चल रहा है कारवाँ

साहित्य का यों,

तान ले तू मूँछ,

बढ़ने भी लगे

तव पूँछ लंबी

लोटती भू पर

उतरती शून्य में।


गर्व है किस बात का

खोजी नहीं तू,

ऐंठ रस्सी में

 तभी तक

जल न जाए!

व्यर्थ ही तू

बिखर जाए।


दम्भ क्या पाले,

सभी कुछ है

यहाँ ब्रह्मांड में ,

सोचो विचारो

हे 'शुभम्'

यह गहनता से,

दीर्घ पर्वत पर

उगे ज्यों तृण जवासे।



शुभमस्तु!


16.08.2024● 3.45आ०मा० 

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ह्वाट्सएप का कुनबा [ चौपाई]

 355/2024

        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


व्हाट्सएप    का   कुनबा   भारी।

काम न   आए    भीड़   हमारी।। 

भरी   भीड़  में      सभी  अकेले।

लदे  ठेल    पर    मानो     केले।।


हों   बीमार    न    कोई   आता।

सह अनुभूति  न   रोगी   पाता।।

शब्दों    का    संदेश   खोखला।

कैसा   ये      इंसान     दोगला।।


बातों   के     मीठे   न    बतासे।

जुगनू  से  होते     न    उजासे।।

है   अभाव   में      कोई  जीता।

भेजे    कोई     नहीं    पपीता।।


मुखपोथी  पर  कुछ    मरते   हैं।

मिट्ठू   मियां  बने     फिरते    हैं।।

इंस्टाग्रामी       कॉलोनी     का।

हाल वही है    मुखपोथी - सा।।


आभासी   दुनिया      में    जीते।

निरे   खोखले     मानुस    रीते।।

समझाने  से समझ   न    आए।

सच्ची  राह  कौन     दिखलाए।।


जैसे      गए      सावनी    झूले।

व्हाट्सएप  में  त्यों  नर    भूले।।

ज्यों  निदाघ   के  धुंध    बगूले।

आसमान  को  जाकर    छूले।।


'शुभम् ' लौट   धरती  पर आओ।

व्हाट्सएप  से  मोह     हटाओ।।

है   कठोर   यथार्थ   की   धरती।

नाव  न पार  मनुज   की करती।।


शुभमस्तु !


15.08.2024●4.00प०मा०

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बुधवार, 14 अगस्त 2024

दुश्मनों का संसार [व्यंग्य ]

 354/2024 

 

©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 हम हैं, तो हमारे दुश्मन हैं।आप हैं,तो आपके भी दुश्मन हैं।इस संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं,बल्कि यों कहिए कि ऐसा कोई प्राणी नहीं ;जिसका शत्रु इस भूमंडल पर पैदा न हुआ हो। यह अलग बात है कि दुश्मन आपसे पहले पैदा हो गया हो ,आपका वरिष्ठ हो।और यह भी हो सकता है कि वह आपके बाद में पैदा हुआ हो,आपका कनिष्ठ हो। हो तो यह भी सकता है कि अभी उसका जन्म ही न हुआ हो। भविष्य में होने वाला हो।बस इतनी सी बात गाँठ में बाँध लीजिए कि इस भूतल पर कोई भी व्यक्ति क्या कोई भी प्राणी शत्रु विहीन नहीं है।

 यह कहा नहीं जा सकता कि यहाँ कौन कब किसका दुश्मन बन जायेगा।बस समय की प्रतीक्षा कीजिए कि आपके दुर्भाग्य अथवा सौभाग्य से आपका दुश्मन कब प्रकट होता है।दुश्मन का होना हम सबका एक ओर दुर्भाग्य है तो दूसरी ओर वह हमारा सौभाग्य भी हो सकता है।इसलिए एक सूत्र यह मान लीजिए कि दुश्मन और दुश्मनी जीवन के अनिवार्य अंग हैं।कभी किसी को अपना स्थाई मित्र मान लेने की भयंकर भूल मत कर दीजिए। साझे का घड़ा हमेशा चौराहे पर फूटता हुआ देखा जाता है।न मानो तो साझा करके देख लीजिए। यहाँ कोई भी अपना नहीं है। आज अपना है ,तो कल नहीं भी हो सकता है।

  दुश्मन और दुश्मनी को मैंने अपने ऊपर के वक्तव्य में अपना सौभाग्य माना है। आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों ?कि दुश्मन होना हमारा सौभाग्य बन जाए। हमारा दुश्मन हमें जीना सिखाता है,सदैव जागरूक रहकर जीना सिखाता है।अन्यथा ग़फ़लत में पड़े हुए हम धोखे खा जाते हैं।इस बात को महात्मा कबीर सैकड़ों वर्ष पहले कुछ इस प्रकार कह चुके हैं:-

 'निंदक नियरे राखिए,आँगन कुटी छवाय।

 बिन पानी साबुन बिना,निर्मल करे सुभाय।।' 


 कुछ लोगों का यह बहुत बड़ा सौभाग्य ही होता है कि उनके एक नहीं अनेक दुश्मन होते हैं।वे आगे पीछे ऊपर नीचे दुश्मनों से ही घिरे रहते हैं।यह तो सोचने वाले की सोच की बात है कि वह अपने दुश्मन को सकारात्मक रूप से ग्रहण करता है अथवा नकारात्मक रूप से।जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते हैं,वैसे ही दुश्मन को ग्रहण करने के भी दोनों ही पहलू होते हैं। हमारी सकारात्मक सोच से दुश्मन भी मोम हो जाता है और नकारात्मक सोच तो ज्वलनशील होती ही है।भगवान राम के जीवन में एक समय ऐसा आया कि दशों दिशाएँ शत्रुओं से भरी हुई थीं।उनके भी शत्रु पैदा हो ही गए।किन्तु उनके जीवन संघर्ष ने मानव मात्र के लिए जो सकारा त्मक संदेश दिया ,वह हम सबके लिए प्रेरक बन गया।यही हाल भगवान कृष्ण के साथ हुआ।उनके शत्रु तो उनके अवतार से पहले ही उनका संहार करने के लिए तैनात हो गए और उन्हें अपने शत्रुओं से आजीवन संघर्ष करना पड़ा।

 शत्रु सजातीय भी हो सकता है।विजातीय भी हो सकता है।विधर्मी भी हो सकता है।आदमी एक ऐसा जीव है कि उसे शत्रु बनाने में आनंद आता है।कुछ ऐसे भी हैं कि अनायास ही आपको शत्रु मानने लगते हैं।कारण के बिना कार्य भले न होता हो,किंतु अकारण शत्रोद्भव अवश्य हो सकता है।पड़ौसी पड़ौसी का शत्रु बन जाता है।यह जानते और मानते हुए कि कोई किसी का नहीं खा रहा है ,फिर भी आदमी अनायास ही शत्रु -सृजन कर ही लेता है।इस असार संसार में शत्रु, मित्र और तटस्थ तीनों ही कोटियाँ सुलभ हैं।कभी कोई मित्र ही नहीं ,निकट सम्बन्धी भी आपका शत्रु बनकर उभरता है। कहीं स्वार्थ शत्रुता का कारण बनता है तो कहीं ईर्ष्या शत्रुओं को पैदा कर देती है।शत्रु तो बस ऐसे पैदा होता है ,जैसे बरसात में गिजाई,केंचुए और अन्य कीड़े मकोड़े पैदा हो जाते हैं।आदमी के अच्छे काम,उसकी प्रगति और सम्पन्नता भी शत्रु जन्म के लिए उर्वर भूमि का काम करते हैं। 

  सूक्ष्म सुझाव यही है कि शत्रु पैदा होते हैं तो होने दीजिए।बस अपने मार्ग पर यों चलते और आगे बढ़ते रहिए कि हाथी चलते रहें और कुत्ते भौंकते रहें।यदि हाथी के सामने ही कुत्ता आ जाए तो दो लात मारिए और शत्रु को ललकारिये और अपना पथ प्रशस्त कीजिए।यह संसार ही शत्रु सम्पन्न है तो आप और हम कर ही क्या सकते हैं।बस संघर्ष करना है और चलते चले जाना है।शत्रु को निश्चित ही मुँह की खानी पड़ेगी।कहीं जुबान तो कहीं तलवार भी चलानी पड़ेगी।हमें जग भौजाई नहीं बनना है क्योंकि कमजोर की लुगाई सबकी भौजाई जो होती है ! 

 शुभमस्तु ! 

 14.08.2024●4.00प०मा० 

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सावन सहज सुहावना [ दोहा ]

 353/2024

     

[सावन,झूले,हरीतिमा,त्योहार,उपवास]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

        

                   सब में एक

सावन सहज सुहावना,सर-सर सुरभि समीर।

सर  सरिता  में शीतता, सरसिज वर्ण अबीर।।

सावन   में   अमराइयाँ,  गूँज रहीं हर    ओर।

पींग  बढ़ा   झूलें   जनी,  करें  बाल किलकोर।।


झूले पर   हैं    राधिका,  झोंटा  दें  घनश्याम। 

फर-फर-फर  चुनरी  उड़े, बरसाने का  धाम।।

झूले    भूले   गाँव  के,नर - नारी  हर    बाल।

मोबाइल   ले   हाथ  में, चल  उन्मादी   चाल।।


पीपल बरगद आम की,शुभ हरीतिमा  भव्य।

नयन-दृष्टि  शीतल  बड़ी,दृश्य धरा का  नव्य ।।

दृग  में    बसी  हरीतिमा, पावस का   संगीत।

पिक मयूर प्रमुदित बड़े,कण-कण किया सतीत।।


राखी का त्योहार है,  भगिनी का मृदु   प्यार।

मृदुल  कलाई भ्रात की,खोल खड़ी है   द्वार।।

श्रम - स्नेहन   त्योहार से,चले बारहों   मास।

राखी  होली  दीप   की, दीवाली  सब  खास।।


मन  प्रभु-चरणों   में  बसे,  कहलाए उपवास।

अन्न-त्याग का अर्थ क्या,लगी फलों की  आस।।

करता  है उपवास  जो,  करे   न ऐसा  कर्म।

नीति  सत्य  अवरोध   हो,  सुदृढ़ सेवक  धर्म।।

                 एक में सब

सावन में     झूले पड़े,   राखी का     त्योहार।

चलो करें उपवास हम,  हरीतिमा   के   द्वार।।


शुभमस्तु !

13.08.2024● 11.45प०मा०

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स्वाभिमान का पर्व है [दोहा]

 352/2024

   

[भारतवर्ष,तिरंगा,स्वतंत्र,स्वाभिमान,पर्व]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक

भावी  भारतवर्ष  का,भयकारक है  रूप।

वर्तमान बिगड़ा  बड़ा, बिका हुआ  है  भूप।।

कहते   भारतवर्ष  को,जग में देश  महान।

संस्कार   मरने   लगे,  कहाँ  रही वह शान।।


लिए    तिरंगा  हाथ   में,  होते   हैं बलिदान।

वीर    हमारे  देश  के,   केवल   वही महान।।

छाप   तिरंगा  गाल  पर, कहें देश का   भक्त।

नेतागण   इस   देश   के,  वैभव   में अनुरक्त।।


कहते    हुए   स्वतंत्र  वे, मनमानी   में  लीन।

लूटें  निर्धन  व्यक्ति   को,  नेताजी  धन  छीन।।

जनता आम न हो सकी,किंचित आज स्वतंत्र।

शोषण  कर   उत्कोच  लें, फूँक  रहे   हैं  मंत्र।।


स्वाभिमान   को    बेचकर, नेता बने    महान।

धनिकों  के  घर  भर  रहे, काट देश के   कान।।

स्वाभिमान जिसका  मरा,मनुज निरा वह ढोर।

मर्यादा  का  नाश  कर,  छिपा  हुआ वह   चोर।।


पावन   पर्व    महान है, भारत हुआ    स्वतंत्र।

मिली   हमें    स्वाधीनता,  एकसूत्रता     मंत्र।।

राष्ट्र   पर्व   की    पावनी, आई  घड़ी   विशेष।

अपनों को  पहचान  लें, रहें  न बनकर   मेष।।


                एक में सब

स्वाभिमान का पर्व है,भारतवर्ष     स्वतंत्र।

लिए तिरंगा   हाथ  में, पढ़ें  एकता   -   मंत्र।।


शुभमस्तु !


13.08.2024●10.45प०मा०

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चलो तिरंगा फहराएँ [ गीत ]

 351/2024

               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आया है दिन

स्वतंत्रता का 

चलो तिरंगा फहराएँ।


त्याग शांति 

हरियाली के रँग

इस झंडे में  लहराते।

केसरिया सित

हरे वर्ण से 

भारतवासी  मुस्काते।।


वीरों का बलिदान

याद  कर

रक्षा- भाव हृदय लाएँ।


शान न इसकी

जाने देंगे

यह कर्तव्य हमारा है।

लहर - लहर कर

फहरे जग में

हमें प्राण से प्यारा है।।


आओ हम सब

जन गण मन गा

एकमेक  सब  हो जाएँ।


विजयी विश्व

तिरंगा प्यारा

नमन सदा भू माता को।

अन्न दूध फल

हमको देते

है प्रणाम जग  दाता को।।


हम अखंड हों

मिटा सपोले

'शुभम्' सभी उर मिल छाएँ।


शुभमस्तु !


13.08.2024● 6.45आ०मा०

                 ●●●

सबको खूँटा चाहिए [दोहा ]

 350/2024

          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खूँटा  गाड़े  आदमी,  निज  बंधन के हेत।

खूँटे  से उद्धार   क्यों,  होता   है नर चेत।।

यहाँ  वहाँ  खूँटे  गड़े, नहीं  एक  दो चार।

मानव   खूँटाबद्ध   है,  खूँटों का संसार।।


नेता  से  चमचा   बँधा, सुदृढ़  खूँटा जान।

आजीवन चमचा  रहा,यही  मात्र पहचान।।

राजनीति  खूँटा   बनी, चाह   रहे  उद्धार।

काला  कम्बल देह  पर, बाँधे बिना विचार।।


सबको  खूँटा  चाहिए, जाग्रत  खूँटा -मोह।

नारी को पति का मिला,खूँटा फिर भी द्रोह।।

संतति खूँटा प्यार का, स्वयं रहा नर गाड़।

नारी को  नित  ढूँढ़ता,स्वयं लगाकर बाड़।।


खूँटे से  दृढ़  रज्जु का,एक सुदृढ़ अनुबंध।

नहीं  छोड़ता एक  भी, जकड़े हुए सुगंध।।

मज़हब   के   खूँटे  सभी,  करते हिंसाचार।

सत्य  नहीं   स्वीकारते, नहीं  मानते हार।।


पंडा    पूजक    मौलवी,  सब  ही ठेकेदार।

खूँटों  से  जन बाँध कर,करें धर्म -व्यापार।।

फिरता छुट्टा साँड़ - सा,बिना काज मनुजात।

खूँटे  से   उद्धार   हो,  सोचे    संध्या प्रात।।


अचल  सचल  निर्जीव  भी,खूँटों के आकार।

मानव  जिंदा  विश्व  में, सचल जीव  साधार।।


शुभमस्तु !


12.08.2024●2.15प०मा०

                   ●●●

आखर नन्हे [ नवगीत ]

 349/2024

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सदा-सदा ये आखर नन्हे

 सीख सिखाते हैं।


कोई खुला बंद है कोई

सबका अलग स्वभाव,

'क' से कलम

खरहा है 'ख' से 

करता नहीं दुराव।


मिल कर रहें एकता धारें

यही सुझाते हैं।


बारहखड़ी खड़ी

करने को 

भाषा को सहयोग,

स्वर का साथ

सदा ही लेना

भाषा रहे निरोग।


जाति नहीं

मजहब वर्णों का

हँस मुस्काते हैं।


ऐसा नहीं

टाँग से वंचित

आखर निरे अपंग,

किंतु टाँग मारें

न कभी वे

देते सबका संग।


'शुभम् 'मूक हैं

बावन आखर

कुछ कह जाते हैं।


शुभमस्तु !


12.08.2024●11.00आ०मा०

कर्मठता की पूजा [ गीतिका ]

 348/2024

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


होंनहार       बिरवान     फले     हैं।

जन - जन   वंदित  सदा  भले   हैं।।


कर्मठता       की      पूजा     होती,

विपदाओं      के      ढूह    टले   हैं।


मंजिल  बस    उनको    मिलती  है,

बिना      रुके  जो  राह    चले   हैं।


स्वार्थ    लिप्त   अपने   हित  जीते,

जन  - जनता   को   सदा  खले  हैं।


अहंकार     में     चूर      रात - दिन,

सूरज     उनके     शीघ्र    ढले    हैं।


दीनबंधु         निर्धन       हितकारी,

सभी    लगाते     उन्हें    गले    हैं।


'शुभम् ' कर्म   ही  सदा   अमर  है,

कर्महीन   ने      हाथ    मले     हैं।


शुभमस्तु!


12.08.2024●2.30आ०मा० 

                   ●●●

होंनहार बिरवान [ सजल ]

 347/2024

               

समांत   :  अले

पदांत    :    हैं

मात्राभार :  16.

मात्रा पतन :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


होंनहार       बिरवान     फले     हैं।

जन - जन   वंदित  सदा  भले   हैं।।


कर्मठता       की      पूजा     होती।

विपदाओं      के      ढूह    टले   हैं।।


मंजिल  बस    उनको    मिलती  है।

बिना      रुके  जो  राह    चले   हैं।।


स्वार्थ    लिप्त   अपने   हित  जीते।

जन  - जनता   को   सदा  खले  हैं।।


अहंकार     में     चूर      रात - दिन।

सूरज     उनके     शीघ्र    ढले    हैं।।


दीनबंधु         निर्धन      हितकारी।

सभी    लगाते     उन्हें    गले    हैं।।


'शुभम् ' कर्म   ही  सदा   अमर  है।

कर्महीन   ने      हाथ    मले     हैं।।


शुभमस्तु!


12.08.2024●2.30आ०मा० 

                   ●●●

रविवार, 11 अगस्त 2024

खूँटा - युग [व्यंग्य]

 346/2024

               

©व्यंग्यकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


        आज हम सब खूँटा - युग में साँस ले रहे हैं।वैसे पहले से ही यहाँ खूँटों की कोई कमी नहीं थी,किंतु बरसात में कुकुरमुत्तों की तरह नए - नए खूँटे उगते जा रहे हैं।परम्परागत खूँटे अपने स्थान पर अपनी स्थाई जड़ें जमाये हुए हैं।नित्य नए उगते हुए खूँटों की तो जैसे बाढ़ ही आ गई है।

खूँटा पालतू पन का दूसरा नाम है।किसी के पालतू बन जाने से उसका दुम हिलाना भी आवश्यक हो जाता है। आवश्यकता पड़ने पर पालतू की दुम सहलानी भी पड़ती है। यह तो वक्त - वक्त की बात है कि कब किसे किसकी दुम सहलानी पड़े।आदि काल से खूँटे का महत्त्व कभी कम नहीं हुआ।आप तो जानते ही हैं कि मतलब के लिए गधे को बाप बनाना पड़ता है। तो यह खूँटे से बँधना कौन सी बड़ी बात है! परंपरागत खूँटे से गाय भैंस बकरी बँधती चली आ रही हैं।ढोर को चारा चाहिए और खूँटा मालिक को दूध। इस प्रकार खूँटा और दूध का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।जब गाय दूध देना बंद कर देती है,तो उसे उसका मालिक खूँटा बंधन से मुक्त कर छुट्टा खाने के लिए छोड़ देता है। यदि विश्वास न हो तो प्रतिदिन सड़कों ,गलियों ,खेतों आदि में छुट्टा गायों के झुंड के झुंड देख लीजिए।यही हमारी गौ माता हैं,जिन्हें उनके पुजारी मालिकों ने खूँटा -मुक्त कर दिया है कि जाओ और दूसरे के खेतों को चरो ,जहाँ चाहे विचरो या कहीं भी जा मरो ,पर इस खूँटे से टरो।जब दूध ही नहीं तो तुम्हारी जरूरत ही क्या है ?वैसे तू हमारी पूजनीय गौ माँ है।वैसे तेरे साथ ही हम खूँटे को भी पूज लेते हैं। दूध देने तक तेरी लात भी सह लेते हैं।जब दूध ही नहीं तो लात क्यों सहें और खूँटे से बाँध कर चारा कहाँ से ला धरें!

            आज के युग में चमचों और गुर्गों के लिए नेता एक सशक्त टिकाऊ और  आयकारी खूँटा है।यह अलग बात है कि उसने इन्हीं के सहारे जनता को लूटा है।बस हाँ जी, हाँ जी कहना ; और सदा खुश रहना।दिन को रात कहे तो रात कहो।रात को दिन कहे तो दिन ही कहो। जिस खूँटे से बँधे हो, उसी के रहो।अपनी विवेक - बुद्धि को  पीछे ही रखो।खूँटे की सौ -सौ कमियों को मखमली चादर तले ढँको।खूँटे के समक्ष सदैव निरीह प्राणी दिखो।अवसर मिले तो काजू किशमिश और भरे भगौने भखो।हाँ,इतना अवश्य है कि घोड़े की पिछाड़ी और नेता की अगाड़ी से अपने को दूर ही रखो।खूँटे और डोर के बीच दूरियाँ से दिखो।

पत्नियों ने अपने -अपने पतियों को अपना खूँटा मान लिया है।यह अलग बात है कि कोइ -कोई पत्नी ही पति का खूँटा बनी हुई हैं।संतान होने और पत्नी के लिए और भी कई खूँटे पैदा हो जाते हैं।जिन्हें छोड़कर अपना रुख मोड़कर वह कहीं नहीं जा सकती।बस बँधे रहना है। यही गृहस्थी है। वहाँ एक से एक मजबूत खूँटे उपलब्ध हैं।

देश की सामाजिक ,धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था खूंटाधारित व्यवस्था है।सब किसी न किसी खूँटे से बंधकर सुख लूट रहे हैं।समाज है,इसलिए उसे सेवा चाहिए।उसे भी कुछ खूँटों का सहारा चाहिए।इसके लिए समाज सेवी अहर्निश  तैयार हैं।जो खांड खूंदेगा ,वह खांड तो खायेगा ही।वे भी खा रहे हैं और खूँटा बनकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।धर्म पंडे ,पुजारियों,महंतों और

सेवा कर्मियों के खूँटों से बंधा है। यदि ये न हों तो भक्त बेचारे मंदिर में पूजा भी न करने पाएँ।इसके लिए उन्हें भले ही पंडे पुजारियों को सेवा शुल्क देना पड़े ,तो वे देते भी हैं।अन्यथा भगवान के पूजन क्या ,दर्शन से वंचित होने का भय भी है।राजनीति तो पूरी की पूरी नेताश्रित है। वही इसके सुदृढ़ खूँटे हैं।इनके बिना बेचारी अपंग है।चमचे अपनी चमचेगीरी और मक्खनबाजी से गुर्गे अपनी गुर्गाई और तेल मालिश से उसे खूँटों को चिकनाते चमकाते रहते हैं।जैसे बाँस के लट्ठ को तेल पिलाकर मजबूत बनाया जाता है ,वैसे ही खूँटों को मक्खन से सुदृढ़ करना अनिवार्य हो जाता है।

खूँटा - महिमा अनन्त है।खूँटा सजीव हो या निर्जीव , उसका अपना विशेष स्थान है। खूँटा बंधित खूँटे के बंधन से महान है।खूँटा ही तो उसकी आन -बान और शान है।यदि आप किसी खूँटे से बँधे हुए हैं,तो आपको क्या बतलाना।आप तो स्वयं अनुभवी हैं।हो सकता है आप भी किसी के लिए खूँटा -  स्वरूप हों। युग ही खूँटों का है,तो खूँटात्व से आप बच भी कैसे सकते हैं।खूँटा-धर्म निभाना आपसे अधिक भला कौन जान-समझ  सकता है।धर्म , समाज,राजनीति,कूटनीति, शिक्षा, व्यवसाय, नौकरी, अन्य आय(रिश्वत,दलाली,मिलावट,??) आदि किसी भी क्षेत्र से जुड़े हुए होंगे ,तो कोई न कोई कहीं न कहीं आपके खूँटे भी अस्तित्व में विराजमान होंगे।खूंटाभा की द्युति ही निराली है।जहाँ हरी-हरी हर पेड़ की डाली है।जहाँ राह न भी हो तो खूँटों ने राह निकाली है।खूँटों से बंधित जन ने खुशियों भरी बजाई ताली है।उसे फिर घूमने -फिरने के लिए खुला आसमान है।मोबाइल उसके हाथ में है,मुट्ठी में जहान है।

शुभमस्तु !

11.08.2024●4.00आ०मा०

                  ●●●

खूँटा [ गीतिका ]

 345/2024

                 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लोग   मुझे   कहते   सब    खूँटा।

गड़ा   ठौर   पर    अपने    खूँटा।।


गाय   भैंस   पालतू     ढोर   सब,

इन  सबकी    चाहत    है   खूँटा।


शेर    नहीं    बँधते     खूँटे     से,

चीता    नहीं      चाहता     खूँटा।


मतलब  से     सब  बँधे  हुए  हैं,

वरना  जड़  होता     हर    खूँटा।


टुकड़े  की   खातिर  कूकर   भी,

अपनाते   हैं  जन    का    खूँटा।


बिना   डोर  के     बँधते   चमचे,  

नेताओं    को     समझें     खूँटा।


घर  वाली  पति से   बँध  जाती,

कहती  है     संतति  को   खूँटा।


महिमा  'शुभम् ' बड़ी   भारी है,

नाम  कमाता  जग    में    खूँटा।


शुभमस्तु !


11.08.2024●2.15आ०मा०(रात्रि)

खूँटे से सब बँधे हुए [गीतिका ]

 344/2024

              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 

खूँटे   से   सब    बँधे    हुए  हम।

कोई  ज्यादा  कोई   कुछ   कम।।


सबके   खूँटे   अलग -  अलग  हैं,

कोई     सुदृढ़     कोई      बेदम।


राजनीति   के     कुछ    खूँटे   हैं,

कोई     पीता   धर्मों    की    रम।


खूँटे   ने  बाँधा  न     किसी   को,

सभी आप बँध  करते छम- छम।


सेवा  में   समाज    की   बँधकर,

लगा  रहा मस्तक  पर   कुमकुम।


कोई    बनता     पहलवान   भी,

ठोक  रहा   दुर्बल  को  ही  खम।


नोटों   का   खूँटा    है    जिसका,

निर्धन को ही   बन   जाता   यम।


'शुभम्' न चलता काम किसी का,

बिना  न खूँटा  निकले धम - धम।


शुभमस्तु !


10.08.2024●7.15प०मा०

                 ●●●

शनिवार, 10 अगस्त 2024

शब्दोत्सव [आलेख ]

 343/2024 


 

 ©लेखक 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' '

        शब्द' की महिमा के समक्ष मैं निःशब्द हो जाता हूँ।प्रकृति स्वरूप परमात्मा ने 'शब्द' जैसी अद्भुत शक्ति का सृजन कर संसार को दिया है।कोई भी सार्थक ध्वनि एक विशेष अर्थ का बोध कराती है।उस शब्द के अर्थ की ग्राह्यता की क्षमता हर जीव की अलग - अलग होती है।कोयल की कुहू-कुहू,कौवे की काँव -काँव, मोर की मेहो-मेहो ,मुर्गे की कुकड़ -कूँ, गौरैया की चूँ -चूँ ,मेढक की टर्र-टर्र, झींगुर की झर्र-झर्र,कुत्ते की भों-भों,बंदर की खों -खों, शेर की दहाड़, हाथी की चिंघाड़,सियार की हुआ -हुआ आदि अनेकशः हजारों लाखों शब्दों का अपना विशेष महत्त्व है।जिस जंतु का जो शब्द है, उसका सजातीय भी उसका अर्थ भलीभाँति जानता समझता है।

         अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य को भी शब्द की विशेष और अद्भुत शक्ति अपने सहज रूप में प्राप्त है। यह अलग बात है कि उसकी भाषा हिंदी,उर्दू,गुजराती, बंगला, तमिल,तेलुगु, कन्नड़,मलयालम, उड़िया,अंग्रेज़ी, चीनी,फ्रेंच,जापानी, रूसी आदि कुछ भी हो सकती है। शब्द एक ध्वनि विशेष है,जिसकी ग्राह्यता की अपनी सीमा है।यों तो बादलों की गर्जन, आकाशीय तड़ित की तड़कन,घण्टे की घन-घन,टन- टन कुछ संकेतक शब्द ही तो हैं।

         सामान्यतः प्रत्येक मनुष्य अपनी -अपनी भाषा की अभिव्यक्ति शब्दों के माध्यम से ही करता है,जो उस जैसे अन्य मनुष्यों के लिए सहज रूप में बोधगम्य होती है।इसके साथ ही सहित्यकार अपने विशेष शब्द -शृंगार और शृंखला से उसे गद्य या पद्य का एक नया रूप देकर उसे आकर्षक और विशिष्ट बना देता है। यह उस साहित्यकार अथवा कवि विशेष का विशेष योगदान है,जो मानव मात्र के लिए उपयोगी है।उन्ही शब्दों को एक विशेष शैली सूत्र में पिरोकर वह एक ऐसी माला का निर्माण करता है,कि पाठक या श्रोता के मुख से सहज ही वाह!वाह!! निकल पड़ता है।यही उस शब्द - साहित्य का चमत्कार है। 

              यों तो रोना भी एक शब्द है। गाना भी शब्द है।किंतु रोने,गाने,हँसने, खिलखिलाने सबका शब्दकोष भी अलग ही है।जब शब्द लय, गति, प्रवाह, रस,अलंकार ,शब्दशक्ति आदि से समन्वित होकर प्रकट होता है,तब वह सहित्य का रूप ग्रहण कर जन हितकारी बन जाता है। यही उस शब्द- साहित्य की सार्थकता है।यह अलग बात है कि वह लिखित रूप में किसी कृति का रूप धारण करता है अथवा मौखिक वाङ्गमय रूप में ही अस्तित्व ग्रहण करता है।प्रचार - प्रसार और बहु जन हिताय बनाने के लिए उसे ग्रंथकार बनाना भी आवश्यक हो जाता है।शब्द के इसी चमत्कारिक रूप से ही साहित्य की विविध विधाओं :कहानी, उपन्यास,नाटक, एकांकी,व्यंग्य, निबंध, लेख,निबंध, आलेख,जीवनी, रेखाचित्र,संस्मरण, मुक्तक काव्य,(दोहा,चौपाई,सोरठा, कुंडलिया,सवैया,कवित्त आदि) तथा प्रबंध काव्य (महाकाव्य, खण्डकाव्य)का प्रादुर्भाव हुआ है।जो आज भी साहित्य साधकों की शब्द साधना का संस्कार बन कर उभरा है। 

         शब्द वह सुमन है;जिसे फेंक कर मारें तो पत्थर है और करीने से सजा दें तो पूजा का फूल बन जाता है।माला में गूँथ देने पर वही शब्द साहित्य बनकर जन -जन के गले में सुशोभित होता है।प्यार में भी शब्द है और फटकार में भी शब्द है। कहीं वह फूल है तो अन्यत्र शूल भी है।शब्द की महिमा का जितना भी गुणगान किया जाए,कम ही है।सम्पूर्ण संसार शब्दमय है।चाहे वह नदी की हिलोर हो,या सागर की रोर हो, पावस में नाचता मोर हो,या स्कूली बच्चों का शोर हो,सर्वत्र शब्द ही शब्द है।वह विरहिणी के वियोग में है तो गर्भिणी के आसन्न प्रसवयोग में भी है।कहीं वह वीणा की झंकार है,तो कहीं धनुष की भीषण टंकार है।कभी वह युगल प्रेमियों का प्यार है,तो कहीं वात्सल्य मय पिता की पुत्र को मीठी ललकार है।शब्द की समस्त सृष्टि में गुंजार है।मानव मात्र पर शब्द का अधिकार है।शब्द की सरकार है।बिना शब्द के सब बेकार है।यद्यपि कोई शब्द ईश्वरवत निराकार है। फिर भी वह इस कोमल हृदय के आर है तो पार भी है।यही शब्दोत्सव शृंगार है। 

 शुभमस्तु ! 

 10.08.2024●10.30आ०मा० 

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तिनका [बाल कविता]

 342/2024

           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बड़े    काम  का   तिनका   होता।

पार  लगाता      नहीं     डुबोता।।


बनता    कभी    सहारा     छोटा।

ढँकता  इज्जत  बना      लँगोटा।।


गैर   काम    का    उसे   न जानें।

तिनके      की   खूबी   पहचानें।।


चींटी     को    वह  पार    कराए।

तारक बन    तिनका   तब आए।।


यदि  अपनी  पर तिनका   आता।

दूध  छठी  का  याद     दिलाता।।


किसी  आँख  में  यदि गिर जाए।

अश्रुपात  कर    बहुत    रुलाए।।


'शुभम् ' न व्यर्थ तनिक यों जानें।

तिनके   की    ताकत   पहचानें।।


शुभमस्तु!


10.08.2024●4.30आ०मा०

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हरियाली [बालगीत]

 341/2024

                    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हरियाली      ही    हरियाली     है।

हरी - हरी     लहरी     डाली   है।।


सावन   भादों    बरस    रहे   हैं।

ताल, नदी- नद हरष    बहे    हैं।।

तारों  भरी  न    नभ -थाली    है।

हरियाली   ही     हरियाली     है।।


धरती  पर   उगतीं  बहु    झाड़ी।

हरी  दूब  भी    तनकर    ठाड़ी।।

अमराई      झूले      वाली     है।

हरियाली   ही    हरियाली    है।।


नीम   बबूल     शमी    हरियाये।

शीशम आम    खूब    लहराए।।

पीपल  पीट    रहा    ताली    है।

हरियाली   ही     हरियाली    है।।


बेलों  का     वितान    लहराया।

सुखद सघन  पेड़ों   की  छाया।।

बतियाती  लगती     नाली    है।

हरियाली  ही    हरियाली    है।।


फहराता  है     'शुभम्'     तिरंगा।

कल- कल   बहतीं यमुना -गंगा।।

झूला  झूल    रही     आली    है।

हरियाली   ही     हरियाली    है।।


शुभमस्तु !


09.08.2024●3.00प०मा०

               ●●●

घेवर [बालगीत]

 340/2024

                  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सावन   की      सुस्वादु    मिठाई।

जीजी     मेरी      लेकर     आई।।


रक्षाबंधन      पर्व            मनाया।

राखी    लेकर     हमको    आया।।

घेवर      की     मधुरता    सुहाई।

सावन  की     सुस्वादु     मिठाई।।


मधुमक्खी  का     छत्ता    लगता।

खाने   में   भी   रुचिकर  जमता।।

भैया  ने      भी  रुचि    से   खाई।

सावन   की     सुस्वादु    मिठाई।।


मुख   में  दाँत   नहीं     दादी   के।

घेवर  नर्म  खा  रही    रुचि    से।।

बाबा जी     को भी    अति   भाई।

सावन की     सुस्वादु      मिठाई।।


मैदा       चीनी   से      बनती     है।

खूब     कढ़ाई  में      छनती     है।।

कौन  न  चाहे        लोग -    लुगाई।

सावन  की      सुस्वादु      मिठाई।।


रबड़ी     किशमिश    चेरी    डालें।

सुंदर  मीठी    उसे     बना     लें।।

'शुभम्' करें    घेवर  -    कविताई।

सावन  की     सुस्वादु     मिठाई।।


शुभमस्तु !


09.08.2024 ●2.15 प०मा०

                    ●●●

विषाक्त पवन [अतुकांतिका]

 339/2024

               


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


विषाक्त पवन

परित : हमारे

बह रहा है रात- दिन,

बच सको तो

देख लो बचकर,

दूभर साँस लेना।


कर सको तो

कर लो 

अपना बचाव,

भले हिंसक न होना,

टेढ़ी अँगुलियों के बिना

घी कब निकलता?

यह ध्यान रखना।


जी सको तो

आप जी लो

शांति से,

पर ये जमाना

जीने न देगा

शांति से तुमको 

यहाँ पर।


जा रही है

दुनिया कहाँ

किस ओर

कोई न जाने,

बढ़ता ही जा रहा

संघर्ष जीवन का

हमारा।


एकता और प्रेम

अच्छे हैं किताबों में

सदा से,

किंतु हैं विपरीत 

सब हालात

 हक़ीक़त भी यही है।


देख तो जग में

'शुभम्' अब झाँक बाहर,

दृश्य दहलाने के लिए

अंतर तुम्हारा,

कोई उजाले की 

किरण दिखती नहीं है।


शुभमस्तु !


08.08.2024●9.45प०मा०

                 ●●●

बूँद [बाल कविता]

 338/2024

       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 नन्हीं -   नन्हीं    बन    गिरती   हूँ।

बादल  से     बुँदियाँ    बनती   हूँ।।


नहीं   धार   बन     गिरता   पानी।

कण - कण   टूट     बने  बर्फानी।।


कहते   सभी  लोग    जल  बरसा।

देख -  भींग  मन   सबका  हरषा।।


सह   पाता   कब     धारा   कोई।

बूँद   बना     धरती     पर    बोई।।


नभ  मेघों   से     बाहर     आती।

समझ न  अपनी   गति  मैं पाती।।


खेत  वनों     ऊसर    में   गिरती।

सरिता सीपों     बीच   विचरती।।


कभी   धूल में    गिर    जाती  हूँ।

 मोती भी  बनती     स्वाती    हूँ।।


केले   में      चंदन    मैं    बनती।

कभी सर्प विष   बन कर डसती।।


वृक्ष   -  मूल   में   अमृत  भरती।

जीवन     देकर    मैं  तब तरती।।


'शुभम् ' बूँद   की अकथ कहानी।

वर्षा ऋतु     का    अमृत  पानी।।


शुभमस्तु !


08.08.2024●1.30प०मा०

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भू ख़ुम्बी [बालगीत]

 337/2024

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पावस    की       सौगात   नवीनी।

भू खुम्बी   महके     अति   भीनी ।।


 जब  सित  श्याम मेघ   नभ छाते।

धरती पर   जल   अति   बरसाते।।

जेठ  मास   की     गरमी     छीनी। 

भू खुम्बी   महके    अति    भीनी।।


कोई    लाल      सफेद     सुहानी।

धरती     माता      बनती    दानी।।

हरित  वर्ण   से   रहित     प्रवीनी।

भू खुम्बी    महके    अति  भीनी।


धरती   से   जब     बाहर   आए।

फोड़  धरा को    मुख    चमकाए।।

लवनी  की    कोमलता     लीनी।

भू खुम्बी  महके    अति  भीनी।।


खोद    उखाड़    घरों   में    लाएँ।

अम्मा  से      सब्जी      पकवाएँ।।

नमक  मिर्च   सँग , कहीं न  चीनी।

भू खुम्बी    महके    अति   भीनी।।


आओ  'शुभम्'    खेत   में   जाएँ।

खुम्बी  खोज    मेंड़    से     लाएँ।।

किसी  -  किसी   में  जाली झीनी।

भू खुम्बी महके     अति   भीनी।।


शुभमस्तु !


08.08.2024 ●12.30 प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...