213/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
चौंसठ कलाओं में
बाईसवीं कला
हाथ की सफाई
पड़ी नहीं दिखाई
राम नाम की ओढ़ चदरिया
राम दाम की
हो गई कमाई।
खाँड़ खूँदी है
तो खाँड़ ही खाएँगे
वे भी तो राम के ही हैं
तो राम को छोड़
और कहाँ जाएँगे!
डाकुओं की नज़रों में
डाका कोई अपराध नहीं
जितना भी मिल गया
राम का प्रसाद ही सही,
राम-राम जपना
राम का दाम अपना
ये सच है
नहीं कोई सपना।
एक सच को
छिपाने के लिए
हजार झूठ,
जब तक मौका मिला
कर ली लूट,
मिल जो रही थी
पूरी-पूरी छूट।
घड़ा न भरे जब तक
फूटता भी नहीं,
अब भर गया है तो
दुनिया देख रही,
कैसी कही !
बना दिया न
दान दाताओं के
दिमाग का दही,
खुल गई पापों की बही।
आओ हम सब
जुगाली करें
हासिल क्या होगा
जीभ की खुजली ही
कुछ- कुछ दूर करें,
अंततः होना है क्या
वही ढाक के तीन पात।
शुभमस्तु,
36.06.2026◆7.00आ०मा०
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