शनिवार, 27 जून 2026

ऊँट की चोरी निहुरे-निहुरे! [ व्यंग्य ]

 214/2026 


 

 © व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है कि ऊँट की चोरी निहुरे- निहुरे नहीं होती।पर यहाँ तो हो गई।शायद चोरों को इस बात का गुमान भी नहीं था कि वे न जाने कब से ऊँट की चोरी कर रहे हैं,वह ऊँट देश दुनिया और समाज की नज़र से कब तक छिपा रह सकता है ! ऊँट तो ऊँट है, किसी न किसी दिन उसे पहाड़ के नीचे आना ही पड़ेगा। इस बात को ऊँट कभी नहीं सोचता। और यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं कि कोई ऊँट ही ऊँट को चुराए ! पहले आदमी ऊँटों की चोरी किया करते थे ।अरे अब तो ऊँट ही ऊँटों को चुराने लगे! देश और दुनिया को भरमाने लगे। राम नाम की पीली चदरिया ओढ़कर राम को छकाने लगे। पर क्या किया जाए कि वे अपने को ही सर्वोपरि समझ कर ठगने लगे।भक्तों के दान का पैसा सोना चाँदी हीरे जवाहरात चुराने लगे। घड़ा फूटा तो चौराहे पर टूटा। अब न रहा किसी चोर में अपनी थूथन खोलने का बूता। भगवान के मंदिर में डाका पड़ा। चोरों और डाकुओं की दाढ़ियों में ऐसा अड़ा कि तिनकों का पहाड़ ही हो गया खड़ा!

  पहले कहा जाता था कि राम नाम की लूट है,लूट सके तो लूट।पल में परलै होइगी प्राण जाएँगे छूट। पर अब ? यह कहावत झूठी पड़ गई है । राम नाम लूटने से भला क्या होगा ! राम दाम ही न लूट लो। राम नाम से घर गृहस्थी थोड़े ही चलती है ,राम दाम से ही चलती है। जब राम जी ने उन्हें खाँड़ खूँदने का 'सुनहरा' 'रूपहरा' और 'नोट हरा' मौका दिया है ,तो क्यों न लूटें!और उन्होंने ने यथासंभव लूटा।सारी दुनिया को बना दिया झूठा। खांड़ खाई और खूब खूब कूटा। राम की भेंट से बन गए सेठ। आ गई ऐंठ। मंदिर के बड़े प्रशासक ! आप अपने ही सर्वनाशक !! भगवत भक्ति के घाती, चलते फुलाए हुए छाती। ये कलयुगी 'राम शंकर' ! बड़े ही प्रलयंकर ।वही पालक , वही ध्वंशक ,विध्वंशक । 'चंपतों को चपत लगना ज़रूरी है।लोग कहते हैं कि पेड़ों की जड़ें होती हैं। यहाँ तो आदमियों की जड़ें निकल आईं , जो मंदिर के कण- कण में ऐसे समाईं कि वे भगवान राम के मंदिर को अपनी बपौती समझ बैठे। और विशाल दरख़्त बनकर कुछ ऐसे ऐंठे कि राम भी न रहे उनसे जेठे। ये छोटे मोटे पेड़ नहीं, वट वृक्ष बन गए। मंदिर ही नहीं अयोध्या पर छा गए।इनके दाँव तले क्या किसी का पत्ता भी हिल सकता था, हाँ ये पत्ता काट तो जरूर सकते थे। शक्ति के अहंकार में रावण जैसे न रहे, इन 'राम शंकरों' की भला क्या बिसात ! जो राम के ऊपर ही करें घात! घाट- घाट का पानी पीने वाले ये!अंततः कब तक बचने वाले थे!

 राम मंदिर चोरों लुटेरों और डकैतों की आजीवन आय का मोटा अजस्र स्रोत बन गया। इससे चोरों का दल ऐसा तन गया ,जैसे देश के राम भक्तों पर साँप का फन ही तन गया। आस्था पर चोर भारी पड़ गए। देश ने जब सुना जब मंदिर का हाल ! धीमी पड़ गई भक्तों की चाल। उन्हें दिखाई देने लगा मंदिर के बीच खड़ा काल। सुनते ही देश हो गया बेहाल।इससे एक अनुमान यह भी लगाया है कि देश के अन्य मंदिरों में क्या सतयुगी देवताओं को दान संग्रह पर बैठाया है ?जी नहीं। दाल में काला नहीं,ये दाल ही काली है। दान चोरों की नित्य होली और दिवाली है। यह जानकर आस्था शंकित है, थकित है,भ्रमित है, व्यथित है। पर क्या करिए , और क्या न्याय का इंतजार करिए। और किया भी क्या जा सकता है।चोरों का बंधने लगा बस्ता है। भक्तों की आस्था का दान , इतना नहीं सस्ता है। देश के सभी मंदिरों के दान का हिसाब होना चाहिए।उनकी जांच होनी चाहिए।जाँच पूरी होने तक मंदिरों में यथास्थिति बनाई रखी जानी चाहिए। 

 राम के मंदिर में भी भाई भतीजावाद ,जीजा सालावाद, जातिवाद,मित्रवाद, असत्यवाद जम कर चला। जिसने भी अपने गले में झाँका ,उसे अपना चोरत्व नज़र नहीं आया।कहना यह चाहिए कि कलयुग में भला कौन है जो अपने गले की पड़ताल करता है! उसे तो इतना आत्म विश्वास है कि वह जो भी करता है, सत्य ही करता है।यहाँ तो लोग दूसरे के हमाम में झाँका करते हैं। मंदिरों में वही लोग गेरुआ और पीतांबर में विचरते हैं और स्वतंत्र रूप से खड़ी फसल चरते हैं। वे नहीं मानते कि राम कोई जीवंत राम हैं। उनके जाने राम मूर्ति भर हैं। इसलिए वे मूक बने खड़े हैं, हमारे लिए उनके गले में हीरे जड़े गलहार हैं , आज मानवीय मूल्य निहायत सड़े हैं। चोरी को अपना अधिकार मानते हैं। और तो और उनकी पत्नियाँ भी उनकी अंधी समर्थक हैं। क्योंकि उन्हें सोने से लादने में उनकी योजना सार्थक है। इस अंध समर्थन में उनका प्रयास भरसक है। क्या आज की 'पतिव्रताओं' पर किसी को कोई शक है? उनकी विलासिता की हर सामग्री हर साधन चकाचक है।इसलिए वे कैमरे के सामने बयान दे रहीं खटाखट है। 

 सिंहों नहीं, सियारों के झुंड में भी रंगा सियार कब तक नजर नहीं आएगा। एक न एक दिन पकड़ा अवश्य जाएगा।फिर उसका जो हाल होगा,क्या उसकी कल्पना कर पाएगा? पर यह चोर नहीं ,सभी चोरों का आत्मविश्वास है कि ऊँट की चोरी भी निहुरे-निहुरे हो सकती है। और हुई भी । उन्होंने कर भी ली। पर दुर्भाग्य उनका कि अंततः पकड़े ही गए। और अब सलाखों के पीछे अपनी किस्मत को कोस रहे हैं कि काश ! आत्म विश्वास हो तो इन राम दाम के चोरों जैसा ! जिसकी हर दुम पर सोना चाँदी हीरा मोती और पैसा ! चोर चोर होते हैं,राम भक्त या देश भक्त नहीं हो सकते। यदि उन्होंने ये सोचा होता कि ये राम हैं ,सच्चे राम हैं,कोई पत्थर की मूर्ति नहीं ,तो दान धन चुराने में हाथ जरूर काँपते। दान पात्र से लेकर बैंक काउंटर तक किंचित न हाँफते। नौकर को स्वयं के मालिक होने का गुमान हो गया। इसलिए वह अपनी मालिकी के जहान में खो गया। पर अब क्या है !दूध का दूध पानी का पानी हो गया ! किसी ने बाबरा बाबर बनकर लूटा और आज के इन रावणों ने पुनः राम की रमा को लूटा। निर्वेद के स्थान पर उगा दिया वैभव का बूटा। विलासिता ऐयासी छाई रही।भक्ति और धर्म की न परछाईं रही।उनके दिल और दिमाग में जमी काई ही रही।जो कुछ भी किया मनभाई ही बही।मुझे कोई दूध का धोया नज़र नहीं आया। पर राम को राम भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता। भक्तों और अनुरक्तों के बिना राम भी राम कैसे ? राम राम राम ! हो गया काम !! कैसे लगे राम मंदिर में चोरों पर लगाम! सुबह से शाम ,एक ही काम। दाम दाम और दाम ही दाम। जय जय श्रीराम! जय जय अयोध्या धाम!! 

 शुभमस्तु, 

 27.06.2026◆12.30 प०मा० 


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