219/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
भले खुले मंदिर के द्वार।
नैतिकता की छुट्टा हार।।
सजे अयोध्या धाम खड़े,
किंतु पाप का बड़ा प्रचार।
मंदिर धंधे का घर नेक,
धर्म हुआ है तारम तार।
हया नहीं आँखों में शेष,
चचा-भतेजे सब हुशियार।
झोंक कैमरा-दृग में धूल,
टपकाते थे मुख से लार।
जीजा-साले सब सम्बंधी,
सोना-चाँदी करते पार।
ऊँचे-ऊँचे भवन खड़े,
जिनमें सुखी रहें नर-नार।
चोर कहे औरों को चोर,
उड़ें हवाई काली थार।
'शुभम्' पहनते पीले वस्त्र,
करते घर भर का उद्धार।
शुभमस्तु,
29.06.2026◆ 6.45 आ०मा०
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