220/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
राम-रतन की बेढब चोरी।
हुई अयोध्या धाम न थोरी।।
जिनका चरित नहीं था गोरा।
लगा मुखौटा लगता भोरा।।
रक्षक ही भक्षक बन जाएँ।
फिर किस पर विश्वास टिकाएँ ।।
जो धन दानपात्र का गिनते।
नोट जेब में वे ही चिनते।।
नैतिकता जब मर जाती है।
मानवत्व को छल पाती है।।
इष्ट मित्र थे साला-जीजा।
नित्य चोरते चचा -भतीजा।।
सोना चाँदी हीरा मोती।
चुरा रहे थे सभी सगोती।।
जिसको 'ट्रस्ट' कहा था सबने।
वही भ्रष्ट पाया है जग ने।।
ट्रस्ट - छाँव में चोरी होती।
भक्त माँगते राम- मनोती।।
चंपत जी सब जान रहे थे।
पर जिद अपनी ठान रहे थे।।
भेद खुले नाकें कट जाएँ।
फिर कैसे मुखड़ा दिखलाएँ।।
दबी आग बाहर आ जाती।
भारत भर को वह झुलसाती।।
कहते चोर राम नित जपना।
समझे दान पात्र धन अपना।।
'शुभम्' चोर की अशुभ मिताई।
पिटे संग पिटवाए भाई।।
शुभमस्तु,
29.062026◆4.15 प०मा०
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