शनिवार, 27 जून 2026

सत्कार [ कुंडलिया ]

 212/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप  'शुभम्'


                         -1-

आता  अपने    द्वार   पर, करते  हम सत्कार।

अनाहूत-आहूत   जो,  तजकर   सभी विकार।।

तजकर  सभी विकार,अतिथि को देव मानना।

संस्कार   की  बात,  नहीं  भ्रू   कभी   तानना।।

करें   सभी    सम्मान, नेह    का   रखना नाता।

'शुभम्' न   करना  घात,शरण में जो भी आता।।


                         -2-

सीता  ने   दशशीश    का, किया बड़ा  सत्कार।

भिक्षा   देने  आ  गई, निज  कुटिया  के  द्वार।।

निज   कुटिया   के द्वार, हरण सीता का करके।

हुआ   बड़ा   छल  छद्म, उठाया बिना समर के।।

'शुभम्' गया दशशीश, उठा   रघुपति परिणीता।

त्राहि-त्राहि    की  चीख,कर  रही  माता सीता।।


                          -3-

रहते    जन   जो   गाँव  में, करते  हैं सत्कार।

जो भी   आता    पास   में,करते दुःख निवार।।

करते    दुःख    निवार,  पूछते   पानी- खाना।

कहते   कहाँ   निवास,  बताएँ  किस घर जाना।।

'शुभम्'  नगर  के लोग, न सबसे मतलब रखते।

शोभन  हैं   ग्रामीण,  नेह   रस   में   रत रहते।।


                         -4-

कुटिया   में   शबरी   खड़ी, करने को   सत्कार।

रामचन्द्र   भगवान   का, मन को लिया  सँवार।।

मन को लिया  सँवार, बेर चख- चख कर रखती।

खुला   प्रेम  का   द्वार, नाम   की   माला जपती।।

'शुभम्'  टेकती   एक, बढ़ी   लेकर  वह लठिया।

हुई   आज   आबाद , राम  से  उसकी कुटिया।।


                         -5-

आओ हम स्वागत करें, सुख-दुख का हर हाल।

रहता है सुख भी नहीं, दुख  क्यों करे कमाल।।

दुख क्यों करे कमाल, एक दिन वह टल जाता।

कर   उसका   सत्कार,   बनाएँ  उसका छाता।।

'शुभम्'  सचल  दो भाव,हृदय अपना समझाओ।

पकड़ धैर्य की नाव,निकल दुख निधि से आओ।।


शुभमस्तु,


25.06.2026◆9.30प०मा०

                     ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...