सोमवार, 29 जून 2026

संत-असंत डकैत लबार [ गीतिका ]

 218/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संत-असंत       डकैत        लबार।

सबको   खुले    राम    के    द्वार।।


राम-नाम    की    हुई     न   लूट,

राम-दाम        लुटते       उपहार।


जीजाजी-साले      का        जोड़,

सबकी   मिली- जुली     सरकार।


चाचा    संग         भतीजा     एक,

लूट     रहा    मंदिर    में     प्यार।


धाम अयोध्या     धन   का   स्रोत,

नहीं      पता     था    होगी   रार।


बाँध       पोटली     गहना     नोट,

महल  बनाए       औध     उजार।


अलग - अलग    हो     पानी- दूध,

कानूनी      पंजा          अनिवार।


देख  पराए     धन      की     भेंट,

टपक     उठी     रसना   से  लार।


'शुभम्'   कहानी     बनी   अनेक,

धर्म    किया    अघियों   ने   छार।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆11.00प०मा०

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