218/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
संत-असंत डकैत लबार।
सबको खुले राम के द्वार।।
राम-नाम की हुई न लूट,
राम-दाम लुटते उपहार।
जीजाजी-साले का जोड़,
सबकी मिली- जुली सरकार।
चाचा संग भतीजा एक,
लूट रहा मंदिर में प्यार।
धाम अयोध्या धन का स्रोत,
नहीं पता था होगी रार।
बाँध पोटली गहना नोट,
महल बनाए औध उजार।
अलग - अलग हो पानी- दूध,
कानूनी पंजा अनिवार।
देख पराए धन की भेंट,
टपक उठी रसना से लार।
'शुभम्' कहानी बनी अनेक,
धर्म किया अघियों ने छार।
शुभमस्तु,
28.06.2026◆11.00प०मा०
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