शनिवार, 27 जून 2026

अखंड ज्योति [ संस्मरण ]

 215/2026


                 

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मनुष्य के जीवन में सामाजिक परम्पराओं और रीति रिवाजों का विशेष महत्त्व है। अपने दस शतक पहले के जीवन की कुछ मधुर स्मृतियों को वाणी प्रदान करता हूँ तो लगता है कि अभी कल ही की बात है। उन दिनों होली दीवाली रक्षाबंधन आदि सभी त्योहार बड़े ही उत्साह और हर्षोल्लास पूर्ण ढंग से मनाए जाते थे। मुझे यह अच्छी तरह से याद है कि जिस रात  होलिका दहन होता था,उस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पिताजी होली की आँच एक जलते हुए उपले के रूप में घर पर लाते थे।  मेरी माँ उसी उपले की आँच से घर की होली की अग्नि प्रज्वलित किया करती थीं।गोबर की बनी हुई गुलरियों के ढेर को सजाकर उसकी पूजा करने के बाद उसी होली की आग से उसे जाग्रत किया जाता था।


सुबह होने पर घर के चूल्हे की आग इसी होली की आग से जलाई जाती थी। घर की होली की आग में जौ और गेहूं की बालियाँ भूनकर खाई जाती थीं,जिन्हें आखत डालना कहा जाता था। आखत अर्थात नवान्न का श्रीगणेश। आखत ,जो अक्षत का ही भाव लिए हुए है। सबसे महत्त्वपूर्ण और खास बात यह थी कि यही आग वर्ष भर जिंदा रखी जाती थी। 


होली की आग को अगली होली तक जिंदा रखने की यह अमर परम्परा निरंतर चलती रहती थी। ऐसा नहीं था कि तब घरों में माचिस नहीं होती थी। घर पर माचिस होने के बावजूद यह एक रीति और परम्परा की बात थी। सुबह भोजन बनने के बाद किसी उपले को जलाकर चूल्हे की राख में गाड़  दिया जाता था। शाम होने पर पुनः उसी उपले को निकाल कर आग सुलगा ली जाती और भोजन बनने के बाद अगली सुबह के लिए पुनः गाड़ दी जाती।उस आग की ज्योति को इसी क्रम से वर्ष भर जिंदा रखा जाता था। जब बोरसी में दूध औटाया जाता तो भी इसी आग से काम लिया जाता। यही हमारी सामाजिक परम्परा की एक अखंड ज्योति थी। 


एक वर्ष तक निरंतर आग को इस प्रकार जीवित रखना कोई आसान काम नहीं है। आज भी गाँवों में गैस के साथ साथ लकड़ी उपलों के चूल्हे हैं,किन्तु अब वह बात नहीं है। अब तो खट से लाइटर जलाया और स्टील का चूल्हा जला लिया। यह भी न हुआ तो सर्र से माचिस जलाई और खाना बनाना शुरू। अब न ऐसी कोई परम्परा है और  अखंड ज्योति। वे सब बातें समय के साथ चली गईं।न वे लोग रहे और न वे बातें। सब कुछ बदल गया। अब आदमी का धैर्य चुक गया है। यह बहुत बड़े धैर्य का ही प्रतीक था कि होली की आग की एक ही ज्योति को वर्ष भर जिंदा रखा जाता था।


उस समय मिट्टी के बने हुए चूल्हे प्रायः खुले आँगन अथवा दालानों में हुआ करते थे।ऐसे समय में उस आग को सुरक्षित रखते हुए अगले दिन के लिए बचाये रखना कठिन होता था। बरसात और जाड़े के दिनों में बहुत कठिनाई होती थी।उन दिनों की बरसात आजकल की तरह होने वाली हल्की फुल्की बरसात नहीं थी।एक एक पखवाड़े तक सूरज देवता के दर्शन भी दुर्लभ हो जाते थे। ऐसे में चूल्हे  की राख की रजाई में आग की ज्योति को बचाना किसी तरकीब का काम होता था। बरसते हुए बादलों के नीचे चूल्हे पर परात उढ़का  कर आग को बचाया जाता था।


यही मेरी माँ की अखंड ज्योति थी। जिसकी रोटी खाकर हम बड़े हुए और होश सँभाला। अतीत के दिनों की वे मधुर स्मृतियाँ भुलाए नहीं भुलाई जातीं। ईश्वर ने वही अखंड आग की ज्योति हमारे मन और आत्मा में भर दी है और साहित्य की ज्योति के रूप में निरंतर प्रकाशवान है। यही तो मेरे माता और पिता के वे संस्कार हैं, जो हमारे जीवन का पाथेय हैं। अब न वे दिन रहे और न वे बातें ,पर उनकी अमर स्मृतियाँ तन मन में स्थायी रूप से प्रवाहमान हैं। 


शुभमस्तु,


27.06.2026◆8.00 प०मा०

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