मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

साधना मैं करूँ [गंगोदक सवैया]

 595/2024

              

छंद विधान:

1.गंगोदक सवैया चार चरण का वर्णिक छंद है।

2.यह 8 रगण (212×8) से मिलकर बना है।

3.इसे दास ने  लक्षी सवैया,  और केशव ने मत्तमातंग लीलाकर सवैया नाम दिया है। इसे खंजन सवैया भी कहा जाता है।


                         -1-

साधना मैं करूँ ध्यान में मैं धरूँ,

                         पूजता हूँ तुम्हें कष्ट मेरे हरें।

एकदंती उमापूत आओ प्रभो,

                     विघ्न सारे हमारे पलों में टरें।।

सिद्धि देते सदा ज्ञान की सम्पदा,

                      सङ्ग हों शारदा धीरता को वरें।

भाव हों मानवी नष्ट हों दानवी,

                देश में ख्याति का भव्य भूषण भरें।।


                         -2-

ज्ञान की दायिनी भाव की भाविनी,

                        भव्यता भूषिता तारिणी शारदे।

शब्द - भंडार से नेह से प्यार से,

                      काव्य भूषण बना भक्त को तार दे।।

छंद के बंध का बोध देना हमें,

                     शक्ति की भक्ति का भारती प्यार दे।

गद्य हो पद्य हो दिव्य ही कथ्य हो,

                         कामना है यही मान का हार दे।।


                         -3-

वेश से देश को बंधु यों क्यों ठगो,

                    काम का प्राण से साथ ही साथ है।

साधु हो संत हो  देश के तंत्र हो,

                       मोह के मंत्र हो गाथ ही गाथ है।।

कौन है जो बचे ईश की आँख से,

                       कौन है जो कहे देश का नाथ है।

न्याय भी है यहीं अंकिता भी यहीं,

                       बंद आँखें करे सत्य का पाथ है।।


                         -4-

बोल का मोल है भाव का रोल है,  

                      आदमी लाजमी आदमी तो रहे।

आदमी   रूप   में भेड़िया क्रूर है,

                     बात को जो कहे  तो डटा ही रहे।।

वंश का अंश जाता नहीं है कभी,

                        सत्यभाषी सदा सत्यभाषी रहे।

प्रीति की नीति से भीतियाँ टूटतीं,

                        भाव की संपदा वैर नाशी रहे।।


                         -5-

मात को तात को मान हो मानवो,

                   पाल -पोसा गया त्राण भी  प्राण भी।

प्रात जो जाग  के वंदना जो करे,

                    कीर्ति आयू बढ़े राम का बाण भी।।

 नाम की दुंदुभी विश्व - गुंजार हो,

                        तोड़ दे मोड़ दे क्रूर पाषाण भी।

वेद  भी  हैं  वही  पंच  भूतादि  वे,

                    मोक्ष भी मात से तात निर्वाण भी।।


शुभमस्तु !


31.12.2024●2.00प०मा०

                   ●●●

मिलीं बहुत दिन बाद [ नवगीत ]

 594/2024

          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलो आज कुछ

कह लें मन की

मिलीं बहुत दिन बाद।


बहू ठीक ही

रखती होंगीं

भोजन रोटी दाल,

ठीक समय पर

मिलता होगा

हालत क्यों बेहाल?

खाल लटक 

आई है अब तो

झेले दुःख विषाद।


थकी-थकी-सी 

लगती बहना

पूछो नहीं अतीत,

नहीं रहे वे

दुख में बीतें

अब तो सब विपरीत,

छिन गिन -गिन

दिन काट रही हूँ

आती उनकी याद।


लगता अब तो

हमें उठा ले

ईश्वर अपनी गोद,

बीत गए वे दिन

जो सुख के

मिलता था जब मोद,

अब तो बस

यों पेट भरें हम

बिना दाँत क्या स्वाद ?


शुभमस्तु !


30.12.2024●11.15प०मा०

                ●●●

हमें देश प्यारा [महाभुजंगप्रयात सवैया]

 593/2024

                

छंद विधान:

1.यह 24 वर्णों का वर्णिक छंद है।

2.इसमें 8 यगण (122×8) होते हैं।

3.इसमें 12,12 वर्णों पर यति का विधान है।


                         -1-

जमाना बुरा है कहे जा रहे हैं,

              निहारें नहीं झाँक कोई दिलों में।

सभी दोष देते नहीं दोष लेते,

                  रहें ताकते वे पराए बिलों में।।

पिला ज्ञान देना यही है कहानी,

                 रहें सेफ आला बनाए किलों में।।

कली शाख पै ही लगी सूखती है,

                  खिलें फूल कैसे वनों में मनों में।।


                         -2-

किसे देश की आज चिंता बड़ी है,

                सभी लूट खाने को पैने बड़े हैं।

मिले लूटने का जिसे आज मौका,

                 वही लोग जाने को आगे खड़े हैं।।

न नेता भले हैं न साधू भले हैं,

                   लिए हाथ थैला वे माँगें पड़े हैं।

इसे आदमी के भरोसे न छोड़ो,

                   भले भाड़ में डाल स्वांगों चढ़े हैं।।


                         -3-

नई आज पीढ़ी कहाँ जा रही है,

                    कई जाम -बूटी नशा में अड़े हैं।

उन्हें लाज थोड़ी न आती बड़ों की,

                    तनों से मनों से फँसाए पड़े हैं।।

नहीं मानते बात माता-पिता की,

                       कुल्हाड़ी पगों में गड़ाए चढ़े हैं।

कभी एक भूला जु संध्या न आए,

                       निराशा बड़ी है पियासे खड़े हैं।।


                         -4-

न ढोंगी करेंगे न भोगी करेंगे,

                        सभी देश के लोग गाते चलेंगे।

हमें देश प्यारा बचाना हमी को,

                        कुनेता गुमानी सदा ही छलेंगे।।

खड़ी वीर सेना बचाए हमें जो,

                          उन्हींके सहारे फुलेंगे -फलेंगे।

विदेशी न कोई कभी भी घुसेगा,

                        सभी को मिटाके दलेंगे ढलेंगे।।


                         -5-

हमें देश प्यारा हमारा सहारा,

                         बहे अंबु गंगा हमारा तिरंगा।

यहाँ राम आए यहाँ बुद्ध छाए,

                     यहाँ गाय माता यहीं राज्य बंगा।।

यहीं वेद वाणी सुखी देश प्राणी,

                       यहीं मातृभाषा सु हिंदी उछंगा।

शुभं सत्य वाचा सुहर्षा कुलांचा,

                           हमें मान देता समाना उमंगा।।


शुभमस्तु !


30.12.2024●7.15 प०मा०

कृपापुंज हो श्याम राधे प्रभो [वागीश्वरी सवैया]

 592/2024

  

छंद विधान:

1.वागीश्वरी सवैया में 7 यगण (122) के बाद (12) आने से यह छंद बनता है।

2.इसके प्रत्येक चरण में 23 वर्ण होते हैं।

3.इसके चारों चरण एक ही तुकांतता के होने चाहिए।

4.इसके चरणों में 12,11 वर्ण के यति खंड रखने से लय में सुगमता रहती है।

5.इसमें गुरु के स्थान पर दो लघु वर्ण का प्रयोग अमान्य है।


                         -1-

कृपापुंज हो श्याम राधे प्रभो,

                  आप आओ सदा को उबारो मुझे।

पड़ा मैं हुआ बीच में धार में,

                      नाथ मेरे कहाँ हो सँवारो मुझे।।

मिले भक्ति का दान ऐसा महा,

                     ताप कोई नहीं हो सुधारो मुझे।

रखो लाज श्यामा कन्हैया शुभे,

                    जाप लूँ नाम प्यारा पुकारो मुझे।।


                         -2-

रखूँ पाँव में मातु वागेश्वरी,

                  शीश आओ मुझे आप स्वीकारिए।

कृपा आपकी दास को भी मिले,

                काव्य साकार हो आद्र हो  सींचिए।।

मुझे ज्ञान की प्यास ऐसी लगे,

                  भाव आधार लें ज्योति ही दीजिए।

लगे साधना साधती साध्य को,

                         नाव मेरी उसी पार ले लीजिए।।


                         -3-

मुझे साधना में लगा मातु दो,

                  शारदे ज्ञान की ज्योति पाना तुम्हें।

नहीं लक्ष्य कोई मुझे और है,

                  भारती तामसों को मिटाना तुम्हें।।

तुम्हीं शब्द मेरी तुम्हीं काव्य हो,

                  मालिका का बना एक दाना मुझे।

उबारो मुझे मातु वीणा शुभे,

                दास पाँवों का प्यारा बना लो मुझे।।


                         -4-

नदी के सहारे चला पात जो,

                   पार चींटी गई दौड़ती-कूदती।

मिला राह में बात बोली यही,

                  धार मैं थी बही ऊभती -चूभती।।

भला हो नदी का हरे पात का,

                     वे बचाते नहीं तो सदा डूबती।

सभी यों भला जीव का ही करें,

              जान प्यारी सभी को लगी ऊबती।।


                         -5-

बड़ी बात होती नहीं ये कभी,

                  हाथ दोनों बढ़ाएं करें यों भला।

बड़े हों हमारे उरों में छिपे,

                     भाव भारी नहीं हो उरों में जला।।

रहें यों सभी मेल से जोल से,

                मेल भी जोल भी है नरों की कला।

न कोई कहीं है सदा लोक में,

               आदमी आदमी को भला क्यों खला।।


शुभमस्तु !

30.12.2024 ●1.30प०मा०

                     ●●●

सोमवार, 30 दिसंबर 2024

अगहन पूस माघ ठिठुराते [गीतिका ]

 591/2024

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अगहन    पूस      माघ     ठिठुराते।

अग-जग   को   हैं    खूब   सताते।।


हेमंती       चल      रहीं      हवाएँ,

दुग्ध   -   दुशाला     हैं     ओढ़ाते।


थर - थर   काँप   रहे  नर -   नारी,

ओले  शीतल  जल    घन    लाते।


किट-किट   बजते    दाँत   हड्डियाँ,

सभी    चाहते     भोजन      ताते।


ओस  लदी  पल्लव - पल्लव  पर,

खग मृग ढोर  काँप   सब   जाते।


आलू     सरसों    चना    मटर के,

खेत     खड़े  मन     में     हर्षाते।


'शुभम्' शीत  की   अद्भुत  माया,

गज़क    शकरकंदी   हम  खाते।


शुभमस्तु !


30.12.2024●4.00आ०मा०

                     ●●●

शीत की अद्भुत माया [ सजल ]

 590/2024

        

  समांत         :आते

पदांत            :अपदांत

मात्राभार        : 16.

मात्रा पतन      : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अगहन    पूस      माघ     ठिठुराते।

अग-जग   को   हैं    खूब   सताते।।


हेमंती       चल      रहीं      हवाएँ।

दुग्ध   -   दुशाला     हैं     ओढ़ाते।।


थर - थर   काँप   रहे  नर -   नारी।

ओले   शीतल  जल   घन    लाते।।


किट-किट   बजते    दाँत   हड्डियाँ।

सभी    चाहते     भोजन      ताते।।


ओस  लदी  पल्लव - पल्लव  पर।

खग मृग ढोर  काँप   सब   जाते।।


आलू     सरसों    चना    मटर के।

खेत     खड़े  मन     में     हर्षाते।।


'शुभम्' शीत  की   अद्भुत  माया।

गज़क    शकरकंदी   हम  खाते।।


शुभमस्तु !


30.12.2024●4.00आ०मा०

                     ●●●

चले वन को जब राघव राम [लवंगलता सवैया ]

 589/2024

    

छंद विधान:

1.लवंगलता सवैया में 8 जगण(1$1×8) के साथ अंत में एक लघु वर्ण होता है।

[(121×8)+1]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                           -1-

चले वन को जब राघव राम, 

                सिया वन साथ चलीं सँग साजन।

तजे सब औध -विलास अनेकन,

                       नेंक नहीं कर रोध विचार न।।

रहे अब राम न सीय उदार,

                  मिलें सुख भोग यही अब कारन।।

कहें किससे पति की अनुगामिनि,

                        आज बनों निज गेह सँवारन।।


                         -2-

लिखौ लिपि भाल न मेटि सको,

                    सब होय वही विधना लिखि देवत।

वही उगते सब बीज धरा,

                       जब कर्म किए जग में अनुसेवत।।

बने कृमि साँप गधे खग श्वान,

                           धरे बहु देह अखाद्यन जेंवत।

मिलें तन मानव के अहि रूपक,

                        नित्य डसें नर नाव न खेवत।।


                         -3-

करें करनी जग में शुभ ही,

                   फल तो मिलता यह सोच सभी नर।

बुवें कटु नीम सशूल बबूल,

                         फलें नहिं आम उसूल हृदै धर।।

मिले नर योनि सुभाग बड़े मति,

                             को न सुला मधरामृत पाकर।।

सभी खग ढोर सभोग जिएं,

                       सब कर्म करें नर जीवन लाकर।।


                         -4-

पड़ें पद कंटक संकट धूम,

                  नहीं कछु जो कि सदा सत समरथ।

सदा नहिं धूप न छाँव अनूप,

                      विरूप सुरूप अकूत अकारथ।।

बढ़ें नहिं बाल भवें थिर नेक,

                          बढ़ें सिर केश अबाध यथारथ।

मिले सब काज बँटे सबके,

                कर मूरख जीव न जी निज स्वारथ।।


                         -5-

पढ़े सब वेद नहीं कछु ज्ञान,

                    अधीर सदा मन धी बहि-अंतर।

तजे नहिं काम न नारि कभी,

                    कपि चाह रहा जपि माल सुतंतर।।

नहीं कछु भेद न शूकर श्वान,

                       सदा बँधि मूढ़ रहा निज तंतर।

कहें तन से सब मानव एक,

                           नहीं अघ काटन एकहु मंतर।।


शुभमस्तु !


29.12.2024●8.15 प०मा०

                  ●●●

लली वृषभानु चली [वाम/मंजरी/मकरंद/माधवी सवैया]

 588/2024

               

छंद विधान:

1.यह 24 वर्ण का वर्णिक छंद है।

2.इसमें 7 जगण (1$1×7) +1 यगण(1$$) होता है।

3.सुमुखि सवैया में एक और गुरु जोड़ने पर वाम सवैया बनता है।

4.मत्तगयंद सवैया के आदि में एक लघु वर्ण जोड़ देने से यह छंद बन जाता है।

5.इसे केशव ने मकरंद ,देव ने माधवी, दास ने मंजरी और भानु ने वाम नाम दिया है।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

प्रभात हुआ कलिका खिलतीं बहु,

                        है न अँधेरि निशा तम भारी।

अमौन भए खग कीर मनोहर,

                          नाचत -कूदत हैं नर -नारी।।

अबोध रहे सब जाग गए शिशु,

                          कूक मचावत आँगन भारी।

श्याम सरोरुह खेलि रहे वहिं,

                    मातु जसोमति की गृह-क्यारी।।


                         -2-

अतीत अखंड न लौट सके,

                परमारथ के कछु काज करो जी।

सुभोर   तपे   जब दोपहरी,

                मनभावन पावन साज भरो जी।।

सुगंध भरो सद फूल खिले नव,

                        पातक दूषण दाह हरो जी।

स्वदेश हिताहित जान सदा नर,

                           ढोर मरें हित देश मरो जी।।


                        -3-

लली वृषभानु चली नव कुंजनु,

                            राह मिले ब्रज कुंज बिहारी।

अदेखत ही अँखियाँ जु मिलीं द्वय,

                           चाह मिलीं नहिं जात सँवारी।।

अबोलत बोलि पड़ीं रसना युग,

                             आइ गई तन मौन खुमारी।

कहें निज हाल बताउ सखी,

                         कत चाल न जान परे तव प्यारी।।


                         -4-

अबूझ अदेख अरूप अनूपम,

                           आदि प्रभो तव राज न जानें।

अचूक सुदृष्टि अनामय आखर,

                               वैभव रूप चराचर मानें।।

अधीन सभी जड़ चेतन गोचर,

                           आज अभी नहिं भी पहचाने।

अबेर नहीं   करना  घन साँवर,

                           राज मिले अब लौं नहिं छाने।।


                         -5-

अलाभ सुलाभ विचार करो मत,

                           कर्म प्रभाव मिटे नहिं कोई।

अतीत भलौ सबको लगता निज,

                            मर्म वही जितना फल बोई।।

उचंग न हो कर काज   स-धीर,

                           बचे रस ऊपर केवल छोई।

सुबूत अनेक मिलें जग में,

                         करनी करते शुभ शोभन होई।।


शुभमस्तु !


29.12.2024●2.00 प०मा०

                 ●●●

झूलत क्रीड़त श्याम सुजान [मुक्तहर सवैया ]

 587/2024

    

छंद विधान:

1.आठ जगण  (121×8)के वृत्त को मुक्तहरा सवैया कहते हैं।

2.11,13 पर यति होता है।

3.सुमुखि सवैया के अंत में एक लघु जोड़ देने से मुक्तहरा सवैया बनता है।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

खिले बहु फूल गुलाब बड़े,

                           महके चहके निखरे खुशहाल।

चढ़ें नित देवनु  शीश सभी,

                            सजते फबते बजते नवताल।।

मिले बड़भाग गए घर त्याग,

                             न मानुष ग्रीव पड़े ततकाल।।

नहीं   समभाग   मिलें सबको,

                             फँसा नर जीव अनेकनु जाल।।


                         -2-

चलें सरि तीर नहान करें,

                      जमुना जल के नहिं और समान।

कदंब खड़े तट मंजु बड़े,

                      तहँ झूलत क्रीड़त श्याम सुजान।।

सभी तहँ गाय चरें वन में,

                     ब्रजवासिन की शुभ शानहु मान।

बड़े तरु छोंकर और करील,

                        करें किल्लोल करें खग गान।।


                        -3-

नहीं यह खेल कहें कवि वृत्त,

                           नहीं यह एक सवाय बखान।

अनेक    प्रकार  बताय  रहे,

                        गिनते गिनती कवि विज्ञ सुजान।।

विज्ञान बड़ौ तुक  बंधन कौ,

                         बिगड़े न कहीं सच ही यह मान।

न हीन न बोध रहे मन में,

                          सपना न यथारथ मीत उदान।।


                         -4-

रमा उर में रमती कवि के,

                      कवि तुंग हिमाचल की रसधार।

वहाँ सुर में सरकार बनें,

                    नित रंग खिले नव दिव्य ससार।।

चले सत पंथ वही कवि संत,

                             असंतन के जह बंटहुधार।

नहीं कवि आम सकाम अकाम,

                          अनाम बसे जग में सुखहार।।


                        -5-

सजे दल शीत जमे कण ओस,

                          हरी तरु बेल सजे हर खेत।

नमी भर गाँव सुहात न छाँव,

                           न भू पर पाँव न भाते रेत।।

बड़ी अति रात सुभाय प्रभात,

                         करें नहिं गान  विहंग सवेत।

अमा यह पूस गए रवि रूठ,

                        दिखाइ न दीठ कुसंग सहेत।।


शुभमस्तु !

28.12.2024●9.00प०मा०

                   ●●●

अदेर चलें बदराह टलें [सुमुखि सवैया]

 586/2024

       

छंद विधान:

1.सुमुखि सवैया जगण (जभान) [121 ×7  +लघु गुरु ]की आवृत्ति पर चलता है।

2.मदिरा सवैया के प्रारंभ में एक लघु लगाने से सुमुखि सवैया बन जाता है।

लघु (भानस ×7) +गुरु


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

कभी न कभी यदि चंचल हो मन,

                              मानव की मति खूब हरे।

मिले नहिं राह कुपंथ मिले,

                           तहँ लोग कहें जन ये बिगरे।।

चलें वह चाल न हो अभियोग,

                               रहें उर के कपड़े सुथरे।।

बुरी वह बात न हो हित में,

                          सब मान कथा जग में उजरे।।


                        -2-

सखा मनमोहन के सिगरे मिलि,

                           माखनचोर बिलार बने।

मिले इक ठौर सभा करते,

                    सिग आपस में ठिकठाक तने।।

रहौ हुशियार न जान परे कछु,

                         मीत जु बाँटिक खात चने।

गए मिलि पौरि नहीं कछु शोर,

                      दही मिलि हाथ  गुवाल सने।।


                        -3-

दिनेश कहें जड़ मानव जाग,

                         न सो इतना सत पंथ चले।

रहे   मत   हाथनु हाथ धरे,

                  अपनी मति आप ही आप छले।।

न बोल बड़े इतने मुख से,

                  धरि मौन सुमारग क्यों न चले!

मिले पल तोहि गिने जग में,

                    इक आय घड़ी जब प्राण टले।।


                        -4-

महेश कहें सुन पारवती मम,

                            लोग भए बड़चाल छली।

चलें न सुपंथ कुपंथ नराधम,

                           मात किए दुर दांत बली।।

गिरे मुख लार   दिखे पर नार,

                         नहीं अब रक्षित कांत कली।

यहीं अब पास लिखा नर नाश,

                      करें हरि श्याम उजास भली।।


                        -5-

अदेर  चलें बदराह टलें,

                  सब लोगन को सदबुद्धि मिले।

नहीं पर वित्त रहे नर चित्त,

                    मिटे अघ ओघ समृद्ध किले।।

चले पतवार खुलें नवद्वार,

                      खिलें सुमनाद्र तुषार हिले।

रहे यह देश न किंचित क्लेश,

                    मिटें अघ म्लेक्ष रहें न गिले।।

शुभमस्तु !


28.12.2024●12.15 प०मा०

                     ●●●

मोहन सोहन जोहन आवत [अरसात सवैया ]

 585/2024

    

छंद विधान:

1.अरसात सवैया चार चरणों का वर्णिक छंद है।

2.इसमें सात भगण ($11) के साथ एक रगण ($1$) होता है।

[भगण×7 +रगण]


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

वानर बागनु में फिरते  जहं,

                      पेट भरें कछु भोजन पाइकें।

दौड़त गाँवनु  में छत ऊपर,

                       छीनत ढूंढत बाखर जाइकें।।

लेत उठावत भागत कूदत,

                     कोइ खवावत प्यार सों आइकें।

हाथ गिलोल लिए जन धावत,

                    आँख दिखावत है सतराइकें।।


                        -2-

बालक खेल धमाल करें बहु,

                        नाचत कूदत औसर पाइके।

आयु बढ़े तब भेद उगे मन,

                       खेलत बालक बालक जाइके।।

जानहिं भेदहु लिंगन कौ तब,

                    छोरिनु सों छिपि प्यार जताइके।

ढूंढत औसर एकल मेलन,

                       गोपन ही रखि बात बताइके।।


                         -3-

यौवन में नहिं शीत सतावत,

                   घाम न ताप न नेंक सतावती।

नाचति देह उघारि जनी तहँ,

                    आइ बरातनि नाच नचावती।।

पौरुष नंग -धड़ंग नहीं वहँ,

                      सूटहु कोटहु  धारत धावती।

हीट बढ़ी जनि के तन में वहँ,

                    स्लीवहु छाँड़ि सुदेह सुहावती।।


                         -4-

गावति गीत चली सजनी सजि,

                      नाचति -कूदति संग सुहागिनी।

कोइ बजाय रही डफ-ढोलक,

                       गाइ रही तिय बंध सु-रागिनी।।

फागुन मास धमाल धमाधम,

                       रंग गुलाल लगाय सुहासिनी।

कौन कहे ब्रज की महिमा शुभ,

                      नंद किशोर कमाल करावनी।।


                         -5-

बोलत बोल झरें जस सौरभ,

                   कांति सुदेह कही नहीं जा रही।

सूरत साँवरि कान्ह सुहासिनि,

                  वीथिन -वीथिन बेढव छा बही।।

तीरथ धाम लली वृषभानजु,

                    आइ रही ब्रज संगिनु आ कही।

मोहन सोहन जोहन आवत,

              बैयरबानिहु  हीय श्यामजु चाहहीं।।


शुभमस्तु !


27.12.2024●7.15प०मा०

                    ●●●

धेनु चरावत आवत श्याम [चकोर सवैया]

 584/2024

      

छंद विधान:

1.यह चार चरण का समतुकांत वर्णिक छंद है।

2.इसमें सात भगण ($11×7) +गुरु लघु ($1) अर्थात भानस से चकोर सवैया बनता है।

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                      -1-

आजु चलो जमुना तट पै,

                      तहँ धेनु चरावत आवत श्याम।

खौंसि चलें कटि में मुरली,

                     सँग आवत कृष्णसखा सरनाम।।

रूप निहारि निहाल बनें हम,

                          औरन सों हमको नहिं काम।।

एकहि रूप बसौ मन में, 

                  तब लौटि जु आवत हैं निज धाम।।


                       -2-

देख सखी अपनी मटकी,

                   अब लेहु सँवारि मिलें घनश्याम।

खाइं   न  बात कछू बिगड़े, 

                      टुटिहै मटकी बचनों नहिं चाम।।

गेहनु जाएँ त सास लड़े,

                      घर में करती फिरती बदनाम।

जाइ रही दधि बेचन को,

                    गुजरी गुजरी थमि के अविराम।।


                       -3-

गाय चराय रहे वन में,

                   सब ग्वालहु बाल सखा वन वास।

श्याम बिना मन नाहिं लगौ,

                        कत देर भई करते कत रास।।

दीखत आइ   रहे सिर पै, 

                       धरि मोरपखा करते मुख हास।

आस-बिसास बंधौ मन में,

                   सब फूलि उठे वन के घन कास।।


                          -4-

छाँव घनी वट की इतनी, 

                         तहँ राजत हैं हरि श्याम सुदाम।

गाय रहीं   चरि झाड़िनु में,

                      नहिं पास जु एकहु गाम न धाम।।

खोलि जु पोटरि बाँट रहे,

                       हरि मूठ चना भरि बात न आम।

आपस में खिलवाड़ करें,

                  हँसि श्याम सखा अपने घनश्याम।।


                        -5-

साँझ भई अब तौ वन में,

                     घर लौटि चलें अपनी सब गाय।

रास राचावन को निधि में,

                   सब बोल सखा अपनी निज राय।।

मात यशोमति याद करें,

                      मन में उठते -बिठते नव भाय।

बोलि परे सब साथ सखा,

                    चलनों चलनों चलनों यह राय।।


शुभमस्तु !


27.12.2024●11.45आ०मा०

                       ●●●

मात्र अंगुलियाँ [अतुकांतिका]

 583/2024

             


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करांगुलियों की तरह

एकता नहीं देखी

थप्पड़ हो या पकड़

मुक्का हो या जकड़

अरे आदमियो !

कुछ इनसे भी सीख।


बहुउद्देशीय

ये हाथ के दो पंजे,

घने काले केश हों

या निचाट गंजे,

कमाल ही करती हैं

ये दशाङ्गुलियाँ!


हाथ धोकर

किसी के

पीछे पड़ना हो,

अथवा किसी

दुश्मन से लड़ना हो,

पीछे नहीं रहतीं

दशांगुलियाँ!


और तो और

पाँव की भी

साथ देने में

आगे दौड़ती हैं,

हार हो या जीत

पीछा नहीं छोड़ती हैं,

ये पदाङ्गुलियाँ!


न कोई हिन्दू

न मुसलमान!

न पंजाबी

न किस्तान,

सभी की सभी

अँगुली महान!


हीनता बोध नहीं

छोटाई का,

सवर्णता की ऊँची

नोज़ नहीं

अपनी बड़ाई का,

सब मात्र अंगुलियां,

न छुआछूत 

न भय का भूत,

धन्य हो हमारी

बीस कर- पदांगुलियाँ!


शुभमस्तु !

26.12.2024 ●6.45प०मा०

                 ●●●

गीत मल्हार नहीं कजरी अब [ किरीट सवैया ]

 

582/2024


छंद विधान:-

1.किरीट सवैया चार चरण का सम वर्ण वृत्त है।

2.यह भगण ($11×8) पर आश्रित होता है।

3.प्रत्येक चरण में भगण की 8 आवृत्तियाँ होती हैं।

4.चारों चरणों की तुकांतता एक समान होती है।


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                      -1-

कोकिल बोल सुने जब से हम,

                           सूरत देखन को ललचावत।

मंजुल रूप   निहारि   सकें तव,

                            देह गुलाबनु -सी महाकावत।।

पायल की  ध्वनि बाजत है नव,

                            अंग गुलाल सु-रंग लगावत।।

मो वश में अब नाँहिं प्रिये मन,

                          देहनु  आज अनंग जगावत।।


                       -2-

भीतर -भीतर आग जले तन,

                          बाहर से मुख नेह जतावत।

प्रीति न जान परे उजले तन,

                       अन्तर में अति दाह जलावत।।

मानव दानव भेद नहीं कछु,

                       आदम आदम को तन खावत।

हाय नहीं अब भेद रहौ तृन,

                       होय कुपूत औ तात सतावत।।


                       -3-

गीत मल्हार नहीं कजरी अब,

                         वेद न मंत्र पढ़े जनता अब।

आग लगी चहुँ ओर महारण,

                       कृष्ण कहाँ कर चक्र धरें जब।।

देश जले  परदेश  जलें जन,

                         शांति मुई दुष्क्रान्ति रही सब।

क्रूर भए जन भूप कहें जग,

                      नाश भयौ सिगरे जग कौ अब।।


                       -4-

भारत देश महान कहें जन,

                      भारत के गुण खूब सुनावत।

मारत -मारत   खाइ रहे नर,

                     लाश जलाइ-जलाइ जु तापत।।

नागनु पालि   डसाइ कहें यह,

                        है यह पुण्य प्रताप सतावत।।

काल बली नहिं माफ़ करे अब,

                        कृष्णहु रामहु  अंश नसावत।।


                       -5-

स्वारथ लागि सधें सिगरे जन,

                        स्वारथ साधि लगें मनभावन।

स्वारथ पूरण   होत   नहीं अब,

                        जान नहीं पहचान न पावन।।

मीत न रीत न प्रीत बची जग,

                          जेठ समान तपे घन सावन।

एक न शेष बिना स्वारथ जन,

                        जीवत हैं जन मानुष खावन।।


शुभमस्तु !

26.12.2024●6.30प०मा०

                    ●●●


सब एक समान नहीं दिन हों [महामंजीर सवैया]

 581/2024

  

छंद विधान:-

1.यह चार समतुकांत चरण का और 26 (12+14) वर्णिक छंद है।

2.इसमें क्रमशः 08 सगण(11$) तथा अंत में लघु गुरु(1$) आता है।

3.प्रत्येक चरण में12 वर्ण पर यति होता है।

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

बदलो - बदलो युग के लड़को,

             निज मात पिता अरमान बने रहें।

उर से न विलीन सु-मान कभी,

             भर जीवन वे सिर-छान बने रहें।।

जब भूख लगे  तब भोज मिले,

              सिर पै  सुनने तव कान तने रहें।

पद -सेव करौ पितु की जननी,

              झट दौड़ि करौ सब काम कहें रहें।।


                      -2-

बदली - बदली लगती  जगती,

            अब मानव की  मति ही न टिकी रहे।

तन नंग -  धड़ंग उघार  फिरें,

                तिय प्रीतम संग नहीं जु सटी रहे।।

नहिं मानत बात पिता -पति की,

                  नभ डोर पतंग सदा जु कटी रहे।

जब   ब्याहुलि   आइ गई घर में,

                  तबहूँ मितवा सँग जान डटी रहे।।


                      -3-

बदरा बदराह  चले  नभ के,

                  बदली  न रही बदली बदली  रहे।

बिजली चमके  दमके गमके,

                 नभ में कर शोर सदा सुलगी रहे।।

झकझोरि  चले द्रुम बेल हवा,

                     वन -बागनु में बरजोर बनी रहे।

बरसें   बुँदियाँ   घनघोर  धरा,

                    घर -खेतनु की भरपूर सनी रहे।।


                           -4-

जब पूस लगौ जस फूस जलै,

              मम आँखिनु सों जलधार सदा बहे।

तरु ओस चुचाइ -चुचाइ रहे,

                  यह नाकहु नीर बहाइ गदा दहे।।

अब ओढ़ दुशाल चढ़े नभ में,

                 रवि तेज प्रताप न कौन कहाँ सहे।

सब एक समान नहीं दिन हों,

                 वह कौन जु वीर महान सदा रहे।।


                       -5-

अब कोयल मोर सुशांत भए,

                 तमचूर जगे कुकड़ूँ करते रहें।

सित चादर ओढ़ जगी जगती,

                घर खेतनु -बागनु में झरते रहें।।

तन के सब हाड़ बजें जन के,

                जग -जीवन से कछु यों टरते रहें।

जब शीतल ब्यार चले पछहाँ,

               नभ में रवि जी तप भी करते रहें।।


शुभमस्तु!


26.12.2024●3.15प०मा०

                     ●●●

वे दिन दूरि गए अपने [दुर्मिल सवैया]

 580/2024

    

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                      -1-

बरसें    नभ   से  जल बिंदु  घने,

बिन  पावस   लोग  न  मेह कहे।

चहुँ   ओर   कुहास  उसास भरे,

सब जीव कहें  नहिं  जात  सहे।।

अति शीतल   शीत  उछाल भरे,

सरि में सब  पात  सु - धार  बहे।

चल  माघ  नहान   करें   जमुना,

पिय हाथनु  हाथ    सधीर  गहे।।


                      -2-

ढिंग हाथनु  हाथ   दिखे  न  हमें,

अब  पूसहु -  माघ  सताइ   रहे।

सित  चादर  ओढ़   दिनेश  चले,

सरि  देवपगा   सम -  धार बहे।।

सब   खेत   भरे    हरिआइ  रहे,

मटरें  निज    हाथ   बढ़ाइ  गहे।

बहु  लोग  अलाव  जलाइ   उठे,

अपनी - अपनी  सब बात कहे।।


                      -3-

कब  साँझ भई   कब  भानु  उदै,

दिन जात न जान   परे  अब तो।

मुखड़ा  अपनों    दिखराइ  नहीं,

जब  जात छिपे चमके तब तो।।

सिग तेज गयौ कितकूँ  रवि कौ,

जपि वृद्ध  रहे अब  तो प्रभु को।

कंपि हाड़ बजें तन के   निशि में,

नहिं चैन परे दिन में    सब  को।।


                      -4-

अब  वे   दिन   दूरि   गए अपने,

जब गाँवनु  साँझ  अलाव जलें।

सब लोगहु   घेरिक   बैठि  तपें,

जल  शीतल  छूअत अंग  गलें।।

अपनी  जन ठोकि  बजाय कहें,

कुतियानु क शावक  खूब  पलें।

जब  भोरहिं  घाम   जगाइ हमें,

तब  छाँड़ि अलाव  पलंग चलें।।


                      -5-

तब  खेलत   खेल   अनेक  नए,

घमियात  रहें     बतियात    रहें।

इक गोलक  गोल    बनाइ  लई,

तहँ काँच बनी कछु   गोलि ढहें।।

कछु  खेलत  दण्डिक-गूल  बना,

कबहूँ जल में निज    नाव   बहें।

अपने  लघु  यान उड़ें   नभ   में,

घर  में अपने  पितु  - मार  सहें।।


शुभमस्तु !


25.12.2024●6.00पतनम मार्तण्डस्य।

                ●●●

कौन न चाह करे सुख की [ सिंहावलोकन सवैया ]

 579/2024

  


छंद विधान:  1.सिंहावलोकन सवैया चार चरणों का एक  समतुकांत  वर्णिक छंद है।

2.इसमें 08 सगण (II2 ×8)

=24 वर्ण होते हैं।

3.इसकी प्रथम पंक्ति का अंतिम शब्द दूसरी पंक्ति का प्रथम शब्द होता है।


 ©शब्दकार

 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                         -1-

अब कौन न चाह करे  सुख की,

जग कोइ  भले  दुख  में मरतौ।

मरतौ   धरतौ   डग    पाँव  बड़े,

अपने  सुख हेत  सभी  करतौ।।

करतौ सब काज  बुरे - भल वो,

धन छीनि  चुराइ   भरे    धरतौ।

धरतौ  मन में    अपराध   नहीं,

भव-सागर   पार   नहीं तरतौ।।


                         -2-

सद शीतल  शीत - बयार   चले,

खग -ढोर न चैन मिले पल को।

पल को नहिं नींद  लगे   रतियाँ,

परसें  कब चाह लगे  जल को।।

जल को असनान   न भावत है,

इक  नाक दु नैन  भरें   छलको।

छलको घट  शीश   धरे  रमणी,

ठिठुराति चली दिन हू  ढलको।।


                      -3-

जिनके उर आग लगी  जलनी,

अब कौन उपाय  करें   सिगरे।

सिगरे  नर -नारि न होंय जले,

भलमानुस नाहिं सदा  बिगरे।।

बिगरे   टपकाय   रहे   रसना,

पहने तन पे   थिगरी - थिगरे।

थिगरे न दिखें अपने   तन के,

निज आग में जारि मरे उजरे।।


                     -4-

रवि  पूरब से उठि  झाँकि रहे,

चमकाइ रहे   मुखड़ा   डरते।

डरते  नहिं  नेंक   घटाइ सके,

अति शीत बढ़ौ जन हू मरते।।

मरते खग -  ढोर  अनेक धरा,

जल -जीव नहीं जल में तरते।

तरते जन छोड़ि गए जन जो,

यमराज लिए   पशवा  हरते।।


                  -5-

अपनी - अपनी  करनी  सबको,

फल देति कभी न कभी नर को।

नर को नहिं केवल लाभ   मिले,

कब हानि मिले कितनों डर को।।

डर को कछु काज करे तिय जो,

भरपूर   मिले   फल  हू भर को।

भर को न क्षमा मिलती तिल की,

नर -नारि कँपें  तहँ  पा  थरको।।


शुभमस्तु !


25.12.2024●12.30 प०मा०

                    ●●●

मानव-जीवन ओस-सा [ दोहा ]

 578/2024

   

[धुंध,धुआँ, कुहासा,ओस,उजास]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्

                  सब में एक

जिनके मन मष्तिष्क में,सघन धुंध - संभार।

वे मानें  कब  देश  को, मिला  शुभद उपहार।।

धुंध हटे  तब  ज्ञान का,फैले जगत   प्रकाश।

दृष्टि  स्वच्छ  हो  दिव्यता,करे तमस का नाश।।


धुआँ-धुआँ  हर  ओर  है, भटक रहे जन  राह।

फिर भी इच्छित लक्ष्य की,मन में अटकी  चाह।।

जहाँ  धुआँ उठता  मिले, वहीं मिलेगी   आग।

नहीं  समझना  धूम  को, श्वेत उमड़ता   झाग।।


पौष-माघ  के   शीत में, सजल कुहासा आम।

राही  भटकें  राह  में, अटक  रहे सब   काम।।

उदित   किरण मार्तण्ड की,गया कुहासा  दूर।

अग-जग में प्रसरित हुआ,दिव्य भानु  का नूर।।


पल्लव  दल  गोधूम  के,चमक रहे कण ओस।

लगता  मुक्ता  सोहते, दस-दस बीसों   कोस।।

मानव-जीवन  ओस-सा,कब ढुलके अनजान।

हवा चले किस ओर की,तनिक नहीं पहचान।।


जब तक हृदय उजास में,तब तक बसता ज्ञान।

मानवता  मरती  नहीं,  सद्य शुभगतर   ध्यान।।

उषा -रश्मि समुदित हुई,विकसित दिव्य उजास।

कलरव  में द्विज  लीन हैं, करते सुमन  सुहास।।


                 एक में सब

धुंध   धुआँ कण  ओस से,बढ़े कुहासा खूब।

ज्यों-ज्यों दिव्य उजास हो,मखमल लगती दूब।।


शुभमस्तु!


24.12.2024●10.45 प०मा०

                     ●●●

रहना हो जिस हाल! [ नवगीत ]

 577/2024

         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पेट सभी का

रोटी माँगे

रहना हो जिस हाल।


तन पर 

भले  फटे-मैले हों

कपड़े तारम -तार,

तीन ईंट का

चूल्हा लेता

उदर भूख का भार,

सिर पर भले

नहीं हो छत जो

बन जाता वह ढाल।


करने की

कुछ भी मजबूरी

बहा देह का स्वेद,

हर अभाव में

रोटी होती

व्यक्त न करती खेद,

सबसे बड़ा

वेद है रोटी

बदले सबकी चाल।


कम से कम में

काम चलाना

सबल मनुज की सोच,

केन पतीली

के बर्तन भी

करें न मन को पोच,

'शुभम्' कहाँ तक

और बखानें

जटिल जीव जंजाल।


शुभमस्तु !


24.12.2024●5.00आ०मा०

                ●●●

सोमवार, 23 दिसंबर 2024

हाहाकार हठात करे [नवगीत]

 576/2024

              


 ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हेमंती है

हवा हठीली

हाहाकार  करे।


हाड़ काँपते

किटकिट बजते

हिलते दुखते दाँत,

बुढ़िया-बुढ़ऊ

छिपे सौर में

भूख मर रही आँत,

कब निकले

गुनगुनी घाम वह

तन की शीत टरे।


सौंधी - सौंधी

भुजिया महके

सरसों की नमकीन,

साग चने का

मकई रोटी

मोटी, नहीं महीन,

बैंगन का

भुर्ता रस रंजक

नित  चटखार भरे।


कलरव 

पड़ता नहीं सुनाई

चिड़ियों का गुणगान,

पंख फुलाये

पड़ीं नीड़ में

देह रजाई तान,

'शुभम्' माघ

पूसों की सर्दी

क्या-क्या जुलम धरे।


शुभमस्तु !


23.12.2024● 2.45प०मा०

                    ●●●

खिसक रही है रात [ नवगीत ]

 575/2024

            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गद्दा गरम

रजाई ठंडी

खिसक रही है रात।


सन्नाटा

झनकार कर रहा

बरस रहा है शीत,

हार गई है

लाल अँगीठी

शीत गया है जीत,

कैसे कहूँ

कहानी तुमसे

जमी जीभ की बात।


पूस चले 

ज्यों फूस जले दव

कब सुबह हो शाम,

पिड़कुलिया

डाली पर रटती

राम राम बस राम,

जमी नालियाँ

नाले बिलखे

ओस करे बरसात।


नव दुल्हनियां

आई थी जो

लगा अभी था माघ,

बतियाने में

सकुचाती है

पति   है  पूरा  घाघ,

'शुभम्' न चाहे

मिले तिया से

तनिक न कोई मात।


शुभमस्तु!


23.12.2024● 1.30प०मा०

चाँद निहारे गगन-चाँद को [ गीत ]

 569/2024

   

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चाँद निहारे

गगन-चाँद को

कौन बड़ा है छोट।


लगता बड़ा

धरा से इतना

ले सूरज की जोत,

प्राण चेतना

हीन सदा तू

रजनी प्रभा उदोत,

मैं दिन-रात

पूर्णिमा -ऊजर

निज साजन की ओट।


तू निकला

मैं खड़ी निहारूँ

कब घर आएँ  पीव,

उनका पथ

कर दे रे उज्ज्वल

फैला किरण करीब,

पहने मैं

आभूषण साड़ी

पहने तू न लँगोट।


रुकता पल भर

नहीं रात-दिन

यात्रा पथ में लीन,

तपता कभी

शीत तू झेले

आभा कांति विहीन,

समझ न लेना

ढूँढ़  रही मैं

चाँद  तुझी में खोट।


शुभमस्तु !


17.12.2024●1.15प०मा०

              ●●●

नहीं गरजते [ गीतिका ]

 568/2024

               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नहीं     गरजते    जो   बरसाते।

धरती  का कण-कण    हर्षाते।।


बातें    बड़ी - बड़ी    गढ़ते   हैं,

बढ़चढ़    कर    कोरे   इतराते।


करने  से   पहले   न    खोलते,

भेद  कर्म  का  कुछ  कर पाते।


सूरज  सोम  मौन   ही   चलते,

अग-जग  में प्रकाश  भर जाते।


जीते  हैं  कुछ   खाने  भर  को,

करते कम  अधिकाधिक  खाते।


बने  हुए   कुछ  भार   धरा  का,

चलते   हैं     इठला     मदमाते।


'शुभम्' सफल है जीवन उनका,

जिनके  गीत  सभी   जन गाते।


शुभमस्तु !

16.12.2024● 4.45आ०मा०

                 ●●●

जीते हैं कुछ [ सजल ]

 

567/2024

            

समांत        : आते

पदांत         :  अपदांत

मातृभार     :   16.

मात्रा पतन  :  शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नहीं     गरजते    जो   बरसाते।

धरती  का कण-कण    हर्षाते।।


बातें    बड़ी - बड़ी    गढ़ते   हैं।

बढ़चढ़    कर    कोरे   इतराते।।


करने  से   पहले   न    खोलते।

भेद  कर्म  का  कुछ  कर पाते।।


सूरज  सोम  मौन   ही   चलते।

अग-जग  में प्रकाश  भर जाते।।


जीते  हैं  कुछ   खाने  भर  को।

करते कम  अधिकाधिक  खाते।।


बने  हुए   कुछ  भार   धरा  का।

चलते   हैं     इठला     मदमाते।।


'शुभम्' सफल है जीवन उनका।

जिनके  गीत  सभी   जन गाते।।


शुभमस्तु !

16.12.2024● 4.45आ०मा०

                 ●●●

[5:04 am, 16/12/2024] DR  BHAGWAT SWAROOP: 568/2024

               नहीं गरजते

लुढकाना भी उसकी चाहत है [ नवगीत ]

 566/2024

   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खाना भी 

लुढकाना भी उसकी चाहत है।


कोई जिए-

मरे,    उसे   क्या    लेना-देना!

सीधी -टेढ़ी

अँगुली से घी अपना  कर लेना,

सुलगे

सारा देश  मिले सुकून राहत है।


आग लगाकर

हाथ    सेंकता   लाश   भूनता,

होली  का

त्योहार मनाता मनुज-खून का,

मानव का वह

शत्रु, मौत   का   संग्राहक  है।


'शुभम्'  भाड़ - सा

देश,  बनाया  कौन  न  जाने,

दहक रही है

आग, क्रूर लिखता अफ़साने,

द्रोही वह

साक्षात ,ध्वंश का संचालक है।


शुभमस्तु !


14.12.2024●10.00 आ०मा०

                      ●●●

पहुँच कर एक फोन करना [ नवगीत ]

 565/2024

    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जा रही हो

पहुँच कर एक फोन करना।


चाहता हूँ

छोड़    मुझको   तुम  न  जाओ,

तुम हँसो

खिलखिल सुमन मुझको हँसाओ,

चाहता क्या

मैं  हृदय में मौन भरना?


आदमी का

आदमी   से आसरा है,

मधुर हो अथवा

हृदय   से  जो खरा है,

चाहतीं क्या

तुम नहीं सँग-सँग विचरना?


स्वप्न पाले हैं

हृदय  में  शहद  जैसे,

मान भी मनुहार

लो मत रूठ ऐसे,

जैसे बहा

अब तक बहे पुनि नेह झरना।


शुभमस्तु !


13.12.2024● 2.15प०मा०

                  ●●●

हेमंत ठिठुरता [गीतिका ]

 574/2024

             



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिसने    अपना    पाठ  रटा    है।

उसका   ही    तम-तोम   फटा  है।।


निकला   सूरज  ज्योति  बिखरती,

अंबर  में  अति  भव्य    छटा   है।


पौष      मास       हेमंत   ठिठुरता,

सघन  कोहरा   यहाँ   कटा      है।


चना      नाचता    सरसों    सरसी,

गोल      बैंजनी     सजा  भटा  है।


गलियारे      में       बालक   खेलें,

ओढ़  रजाई     वृद्ध     सटा    है।


टप -टप   ओस  बरसती  नभ से,

कभी  गगन में  श्वेत      घटा   है।


'शुभम्' जमी है   ओस  कोस  तक,

जल कण पल्लव   सघन   पटा  है।


शुभमस्तु !


23.12.2024● 12.45आ०मा०

                 ●●●

निकला सूरज [ सजल ]

 

573/2024

       


समांत        : अटा

पदांत         : है

मात्राभार    :16

मात्रा पतन  : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिसने    अपना    पाठ  रटा    है।

उसका   ही    तम-तोम   फटा  है।।


निकला   सूरज  ज्योति  बिखरती।

अंबर  में  अति  भव्य    छटा   है।।


पौष      मास       हेमंत   ठिठुरता।

सघन  कोहरा   यहाँ   कटा      है।।


चना      नाचता    सरसों    सरसी।

गोल      बैंजनी     सजा  भटा  है।।


गलियारे      में       बालक   खेलें।

ओढ़  रजाई     वृद्ध     सटा    है।।


टप -टप   ओस  बरसती  नभ से।

कभी  गगन में  श्वेत      घटा   है।।


'शुभम्' जमी है   ओस  कोस  तक।

जल कण पल्लव   सघन   पटा  है।


शुभमस्तु !


23.12.2024● 12.45आ०मा०

                 ●●●

[7:31 am, 23/12/2024] DR  BHAGWAT SWAROOP: 574/2024

हमारा एकमात्र धर्म :विरोध [ व्यंग्य ]

 572/2024



 ©व्यंग्यकार 

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 बनाते रहें वे जनहितकारी योजनाएँ,करते रहें वे देश हितकारी काम,इससे हमें क्या ?हम तो वह बिल्ली हैं जिसको यदि नहीं मिलेगा पीने को दूध और नहीं मिलेगी चाटने को मलाई तो भरी हुई मटकी को फैला देना ही हमारा कर्तव्य है।अरे भाई !हमें उस कहावत को भी तो सही सिद्ध होने देना है कि बिल्ली यदि खाएगी नहीं तो लुढ़का तो देगी ही।इसलिए रात -दिन हमें मटकियाँ लुढ़काने और दूध दही फैलाने में ही आनंद आता है। अब इस फैलाने गिराने से किसी का कोई नुकसान होता है ,तो हो। हमें इससे कुछ भी नहीं लेना- देना। हमारा जो काम है,वही हम कर रहे हैं। हमसे जो अपेक्षा की जाती है या की जा सकती है,भला उसके विपरीत हम कैसे जा सकते हैं! हम वही करते हैं ,जो हमारे लिए करणीय है।जो हमारा करणीय है ,वही हमें वरणीय है।आइए आप भी हमारे कर्तव्य का स्तुतिगान करें, हमें हमारे कर्म के लिए महान कहें,जिससे हम चैन की नींद सोएँ और शांति से रहें। 

  हम जो चाहते थे,हमें नहीं मिला। वे जो चाहते थे,उन्हें मिल गया।हमारी और उनकी चाहत भी एक ही थी।जब एक ही चीज की चाहत के दो प्रत्याशी हों तो इच्छित वस्तु मिलेगी तो एक को ही। मलाई की मटकी में से दो लोग तो मिल बाँट कर खा नहीं सकते।कोई साझे की मटकी तो है नहीं,जो साझेदारी से काम चला लिया जाए। आप यह भी अच्छी तरह से जानते हैं कि साझे की मटकी चौराहे पर फूटती है,तो दर्शकों की भीड़ मज़ा लूटती है।भला मटकी के प्रत्याशियों को क्या मिलता है! इसलिए मटकी पर एक का अधिकार ही तर्कसंगत फबता है।अब वह अधिकार हमें नहीं मिला,तो खीझ तो स्वाभाविक है।उन्हें न मिलता तो जो खीझ आज हमारे पास है ,वह उनकी झोली में होती। अब हमारे हिस्से में मटकी लुढ़काना ,मलाई का माल न खा पाना, रसना में रिसता हुआ रस भर आना, फिर भी तरस -तरस जाना ;बस यही तो शेष रह गया है। 

   आप या कोई भी हमसे यह उम्मीद भी क्यों करें कि हम कोई देशहित की बात सोचेंगे या देश हित करेंगे। यह काम तो मलाई खाने वालों का है, मटकी मालिकों का है कि वे देश हित की सोचें देश हित करें।हम तो मलाई भरी मटकी को देख-देख दूर से ललचा रहे हैं।इसीलिए तो ऊधम मचा रहे हैं। अब ये भी न मचाएं तो क्या करें ? हमारा भी तो कुछ अस्तित्व है ,अपने अस्तित्व प्रदर्शन के लिए कुछ न कुछ करना तो जरूरी है।कुछ धुँआँ ,धक्कड़, धमाल,बवाल और सवाल तो होते रहने चाहिए ।हम तो इन्हीं से जिंदा हैं।

 ये तो एकदम साफ़ है कि देशभक्ति हमारे हिस्से की चीज नहीं है। हमें तो विपरीत ही चलना है। सीधी बहती हुई गंगा को उलटा बहाना है। सही को भी गलत बताना है।जो हो रहा है,उसके उलट जताना है।इसलिए धक्कामुक्की से बात बने तो वह भी कर जाना है। अपना महत्त्व जो दिखाना है।हर सत्य को असत्य बताना है। देश को गुमराह कराना है। यही हमारा धर्म है। विपरीतता हमारा कर्म है। इसी में सत्तासन का छिपा हुआ मर्म है। हम जितना ही उलटा चलेंगे,हमारे जैसे उलटे हमारे साथ हो लेंगे ।क्योंकि उन्हें भी तो हमारे समर्थन में झंडा ऊँचा करना है।देश जले तो जले। हमें क्या !हम देश और जनता का कितना भी भला सोचें, कोई हमें भला नहीं कह सकता। हमें देशभक्त नहीं बता सकता। विपरीतता ही हमारा मंत्र है।इसी से तो चलता हमारा तंत्र है।अब कोई भले ही कहे कि यह देश विरोधी हैं,षडयंत्र है।पर हम हैं कि अपनी करनी के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं।हमें इनको शांत नहीं रहने देना है, मलाई-मटकी को हिलाते- झुलाते रखना है, भले ही उसका स्वाद हमें नहीं चखना है। पर इन्हें भी चैन से नहीं रखना है। 

   विरोध हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।मलाई -मटकी हमने भी चाटी है। थोड़ी नहीं भरपूर चाटी है।देश विरोधी रहना हमारी परिपाटी है। इतिहास की परतें उधेड़ो इसकी बड़ी गहरी घाटी है।पर अब तो हमारा राजफाश हो ही चुका है।यही हाल रहा तो अब पुनः मटकी हाथ नहीं आने वाली।मटकी का निकल गया दीवाला और हमारी हो गई दिवाली की होली। अब कितना भी मलें मस्तक पर चंदन रोली,सारा देश ही कर रहा है हमसे ठिठोली।कितने भी चलवाएँ ईंट पत्थर या बम या बरसायें गोली, ये जनता भी नहीं रही अब इतनी भोली कि जो भी भरमाए उसकी हो ली ? लोग जाग गए हैं और हम विपरीत वाहकों के सो गए हैं। 

   हम तब भी विपरीत थे ,किंतु छद्म।और आज खुलेआम विपरीत हैं।कोई हमें भारत - भक्त न समझे। यहाँ की सीधी -सादी जनता को अब इतना मूढ़ भी न जाने। उन्होंने अपना भला-बुरा जान लिया है।अपना अतीत चीन्हा है और भविष्य पहचान लिया है। वे जान गए हैं कि हम विपरीतवाही ही आस्तीन के रंगीले नाग हैं।हम देश भक्त नहीं,देश विरोधी हैं ;छद्म आग हैं।हमें उलटा ही चलना है।सारे देश को और उसके भविष्य को छलना है। हमारे अनुगामियों और अनुयायियों को तो गलना है;क्योंकि हम उनके भी शुभचिंतक नहीं हैं।बस उन्हें इस्तेमाल करना है और उसके बाद फेंक देना है। 'यूज एंड थ्रो' के उसूल पर चलना है।हमारा एक मात्र धर्म विरोध जो है, स्पीड ब्रेकर।यदि स्पीड ही ब्रेक ही नहीं हुई तो हमारी सार्थकता ही क्या !

 शुभमस्तु ! 

 22.12.2024●9.15आ०मा०


 ●●●

राजनीति इसको कहते हैं! [अतुकांतिका]

 571/2024

      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिद्र ढूँढ़कर 

चौड़ा कर दो

राजनीति इसको 

कहते हैं,

नहीं किसी को

 देश दीखता,

देशभक्त का तमगा

टाँगे,

रौंद रहे वे 

देश नित्य ही।


सत्तासन की

सबको चाहत,

जैसे भी 

मिल पाए ,

भले भाड़ में

जनता जाए,

सब सुविधा ये पाएँ।


नहीं दूध से

धुला एक भी,

चोर-चोर मौसेरे भाई,

बोतल पर लेबल

चिपकाए,

एक रात में 

लेबल बदले,

साँपनाथ

वासुकि कहलाए!


जिनसे पलना

उन्हें चूसना

पेंशन वेतन

राशन पानी,

मुफ्त सभी कुछ

धंधा अच्छा

ऊँचे भवन

राज की धानी।


अपना उल्लू

सीधा करना

एक उसूल 

यही है सबका,

सत्ताधारी या

विपक्ष हो

'शुभम्' नहीं है

चिंतन इनका।


शुभमस्तु !


19.12.2024● 4.45 प०मा०

                 ●●●

नेकी जाती साथ में [ दोहा ]

 570/2024

         

[अविश्वास,रामायण,विद्या,नेकी,कालचक्र]

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                 सब में एक

अविश्वास से भक्ति का,नहीं निकट  सम्बंध।

द्रवित  न  होते   देवता, देता मलय न   गंध।।

अविश्वास  उर  में बसे, विच्छेदित   हो  नेह।

कलहपूर्ण   गार्हस्थ्य   हो, खंडित होते   गेह।।


रामायण में  भक्ति  का, उमड़े सिंधु  समीर।

हनुमत  जैसे  भक्त  हैं,  लक्ष्मण-से रणधीर।।

रामायण का   देश  ये, राम पुरुष     आदर्श।

सीता  जैसी  संगिनी, सुथरा   विमल  विमर्श।।


विद्या की  शुभ   दायिनी,  मातु शारदा  नेक।

सदा  कृपा  उनकी  रहे,  जाग्रत  रहे विवेक।

विद्या जिनके  पास है, कला श्रेष्ठ   साहित्य।

सद्गुण   का  भंडार  हैं,प्रेम  सुधा आधिक्य।।


नेकी जाती    साथ   में, शेष  न जाए  साथ।

करते  जो   नेकी  नहीं,पीट  रहे निज   माथ।।

नेकी   में    ही   नाम है,    नेकी यश-भंडार।

करते  जो  नेकी  नहीं,  बहें   समय की   धार।।


कालचक्र  रुकता नहीं,गति उसकी अविराम।

हुआ न मानव एक भी, लिया समय  को थाम।।

कालचक्र    के   पाँव  से, पिसे  क्रूर      तैमूर।

शेष  न   भू  पर  अप्सरा, नहीं  एक भी    हूर।।


                   एक में सब

कालचक्र  नित  रौंदता, नेकी विद्या सर्व।

अविश्वास का अर्थ क्या,रामायण संदर्भ।।


शुभमस्तु!

18.12.2024●3.45आ०मा०

                   ●●●

गुरुवार, 12 दिसंबर 2024

चले जाते हैं सब! [ अतुकांतिका ]

 550/2024

          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चले जाते हैं सब,

चलते चले जाते हैं,

न जाने कहाँ

किस ओर

 किस लोक में,

फिर लौट कर नहीं आते!


यादें रहती हैं कुछ दिन

कुछ घड़ियाँ मास वर्ष,

छोड़ी हुई भौतिक चीजें

बीती हुई घटनाएँ कुछ,

उसके बाद क्या 

कुछ भी तो नहीं

सभी कुछ हो ही जाता है फुस।


फिर किस बात की अकड़

किस बात का तरेरना मूँछें,

राह चलता इठकर   मूरख

किसी को बात नहीं पूछे,

आज क्या है कहाँ है 

कल क्या होगा,

न रहेगी ये ऐंठ

न रहेगा  चोगा।


गुज़र गईं सदियां

समय रुकता न कभी,

जीव किस ओर गया

लील गया अंबर

या निगल गई है ज़मीं।


मिट जाएँगे ये चिह्न

ये मकान महल दोमहले,

न जान ख़ुदा अपने को

मैं  कौन हूँ जानना पहले।


हवा का एक पिंड

चर्म माँस अस्थियों के भीतर,

कब निकल जाएगा पता क्या

सुकर्म से जी ले जी भर,

नियति के हाथों का 'शुभम्'

रह गया तू  खिलौना हे नर।


शुभमस्तु !


04.12.2024●1.00प०मा०

                  ●●●

मोबाइल के सब मतवाले [बालगीत]

 422/2024

     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मोबाइल   के    सब   मतवाले।

खेल  खेलते     नए     निराले।।


'गुल्ली  डंडा'     'आँख  मिचौनी'।

नहीं   खेलते       छौना - छौनी।।

'हरियल डंडे'    पर  भी    ताले।

मोबाइल    के  सब    मतवाले।।


'कंचा गोली'    या    'नव गोटी'।

'गुट कंकड़' की    बातें  छोटी।।

पड़े   'कबड्डी'   के  अब   लाले।

मोबाइल  के   सब    मतवाले।।


बदला  'शुभम्'   जमाना  भारी।

मोबाइल  ने  कर   दी   ख्वारी।।

बीत  गए   दिन  'गुच्ची'     वाले।

मोबाइल के     सब    मतवाले।।


शुभमस्तु !

16.09.2024◆7.45आ०मा०

                     ★★★

शिक्षक है आजीवन शिक्षक [अतुकांतिका]

 383/2024

   


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शिक्षक

रहे सर्वदा शिक्षक

आजीवन दायित्व निभा,

निवृत होता नहीं 

कर्म से

आज या कि कल

जो बीता।


अन्य सभी

अधिकारी मंत्री

सांसद या कि 

विधायक हो,

भूतपूर्व ही

 कहलाता है

भले नगर अधिनायक हो।


वर्तमान में

शिक्षक जीता

बढ़ता जाता

ज्ञान -उजास,

अन्य सभी की

आँखें मुंदतीं

भूत भूत हाँ 

और न खास!


भूतपूर्व

पुलिस का डंडा

सरकंडा बन

झुक जाता,

अधिकारी 

अधिकार शून्य हो

रॉब नहीं 

दिखला पाता।


'शुभम्' बड़ा

सौभाग्य तुम्हारा

जो शिक्षक हो

आजीवन,

दर्जी बनकर

सिलते रहना

फटे हुओं की

हर सीवन।


शुभमस्तु !


05.09.2024●11.15आ०मा०

                ●●●

क्या नया खास है! [ नवगीत ]

 564/2024

     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कवियों में

क्या नया खास है।


हाड़-माँस की 

वही देह हैं,

नौ- नौ सबके

द्वार गेह हैं,

महाकाव्य लिखता है कोई

कोई रचता उपन्यास है।


एक सदृश 

दिल   सबका  धड़के,

 ये  कवि है 

क्या कुछ भी बढ़ के ?

ब्रह्मलोक में विचरण करता

रहता नित नव भाव वास है।


कहते 

रवि मंडल से ऊपर,

उड़ता है 

कवि रहे न भू पर,

'शुभम्' न कहता गप्प वृथा ये

समझ न लेना कहीं हास है।


शुभमस्तु !


12.12.2024●2.30प०मा०

                ●●●

सृजन- शृंखला का तीसवाँ फूल [ नवगीत ]

 563/2024

       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कली में है

सृजन -शृंखला का तीसवाँ फूल।


शब्दों की लतिकाएँ

शब्दों के पेड़,

शब्दों के पल्लव दल

शब्दों की मेड़,

कहीं लगीं हैं बाड़

कहीं  नियम गया भूल,

हरी - नम्र फली में है

सृजन-शृंखला का तीसवाँ फूल।


हर फूल की

अपनी अलग ही सुगंध है,

कहीं कोई व्यंग्य 

कहीं  कविता   निर्बंध  है,

कुंडलिया या गीतिका

दिया चौपाई दोहा को तूल,

शोध - कृति  में ये

सृजन -शृंखला का तीसवाँ फूल।


पद्य की विद्योत्तमा

गद्य  के  कालिदास हैं,

सृजन की लतिका पर

बारह मास मधुवास है,

ओढ़ा दिया 'शुभम्' ने बस

अक्षर -शब्द का दुकूल,

हेमंत में प्रस्फुटित हो

 सृजन -शृंखला का तीसवाँ फूल।


शुभमस्तु !


12.12.2024●2.00पा०मा०

                 ●●●

काँटों से देश बचाएँ [अतुकांतिका ]

 562/2024

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


यों तो निकाला 

जा सकता है

किसी काँटे से काँटा भी,

पर वे मानते हैं

उनका जन्म ही 

हुआ मात्र चुभने के लिए।


उलझना और  उलझाना

उनका काम है,

बिना इसके उन्हें

मिलता कब विश्राम है!

वही तो करते हैं 

वे दिन - रात यहाँ।


देश का क्या

वह तो चलता ही रहेगा,

वे देश के लिए 

कुछ भी  न करें

कोई क्या करेगा ?


वे  अपना काँटापन छोड़ 

फूल क्यों बनें?

अपनी शुष्कता 

तीक्ष्णता पर क्यों न तनें!

यही तो उनका

वास्तविक गुणधर्म है!

अपना अस्तित्व दिखाने का

'शुभकर्म' ? है!



जैसे सड़क पर

कोई गतिरोधक,

वैसे ही संसद मार्ग पर

विपक्ष छद्म शूल -बोधक,

देशद्रोह ही 

उनकी  शक्ति है!

विदेशी आक्रांताओं से

विशेष अनुरक्ति है!


'शुभम्' शूलों से 

बचाव ही समझदारी है,

देशभक्ति है

देश हितकारी है,

आओ हम सब

 काँटों को जानें,

उनकी विध्वंशक 

मानसिकता को पहचानें,

गृहयुद्ध की 

आकस्मिकता को टालें,

निष्कर्ष यही कि

देश को बचाएं।


शुभमस्तु !


12.12.2024●11.00आ०मा०

                   ●●●

बुधवार, 11 दिसंबर 2024

छाँव के घर धूप हो [ नवगीत ]

 561/2024

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चाहत यही

छाँव के घर धूप हो।


अनमना सूरज उठा

मुख  ढाँप कर,

वायु  भी बल

खा रही है काँप कर,

चाहत यही

जिंदगी  नव रूप हो।


कुकड़ कूँ के 

बोल मीठे कान में,

भर रहे हैं शहद

वृहद  विहान  में,

चाहत यही

सर्वत्र  मीठी चूप हो।


ले कलेवा

चल पड़ी धनिया कहीं,

जोतता है

खेत  पति  होरी  वहीं,

चाहत यही

नजदीक कोई कूप हो।


अब 'शुभम्'

वे गाँव तो मर ही गए,

शहर में 

तब्दील हो कब के ढए,

चाहत यही

वह गाँव ही फिर भूप हो।


शुभमस्तु !


11.12.2024●6.00प०मा०

                  ●●●

एक कविशाला बनाऊँ आज से [ नवगीत ]

 560/2024

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सोचता हूँ

एक कविशाला बनाऊँ आज से।


क्यों भटकते

कुछ अटकते हैं उधर,

नोट दे क्रय

कर रहे कविता सुघर,

सोचता हूँ

घोष  कर  दूँ ताज से।


छंद तुक

लय भाव का शिक्षण मिले,

हृदय बगिया में

सुमन   कवि    के   खिलें,

सोचता हूँ

मुक्ति   वाचा - खाज  से।


आधिकारिक

पत्र   सबको  चाहिए,

कर प्रदर्शन

कक्ष   में  लटकाइए,

सोचता हूँ

सबको दिखाएँ नाज से।


शुभमस्तु !


11.12.2024●11.30 आ०मा०

                  ●●●

लिखना आना नहीं जरूरी [ गीत ]

 559/2024

    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लिखना आना नहीं जरूरी

नोटों की ताकत में दम हो।


रंग - बिरंगे    मढ़े   फ्रेम   में

पत्र प्रमाणन के हों  हासिल,

सजे कक्ष जब  देखें  तुलसी

सूरदास  हो   जाएँ  गाफ़िल,

कौन  पूछता  कैसा   लिखते

नोटों से ही  हर  - हर बम हो।


नेपाली    या    देशी   कोई 

अच्छा  है  कविता का धंधा,

 खड़े   अनाड़ी  लगा  कतारें

देने   वाला   भी  बस  अंधा,

कालिदास उतरे  धरती  पर

ठोंक रहे वे अपनी खम हो।


कविता  रोती  नौ - नौ   आँसू

नहीं  शारदा  को   वे    जानें,

कृपा रमा   देवी   की   बरसी

लंबी    - चौड़ी     डींगें   तानें,

'शुभम्' धुरंधर को   क्यों  पूँछें

कोई  नहीं किसी से कम हो।


शुभमस्तु !


10.12.2024●11.45प०मा०

                   ●●●

चिंतन करना देश हित [ दोहा ]

 558/2024

          

         [चिंतन,देर,रेत,राह,चरण]

                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                   सब में एक

चिंतन कर   ले  ईश का,हे नर मूढ़   अजान।

प्राण   पखेरू  जाएँगे,  उड़  ऊपर ले   मान।।

चिंतन करना  देश हित,जन -जन का कर्तव्य।

नहीं जानता एक भी,शुभद अशुभ भवितव्य।।


करना  हो  शुभ काज जो,करे न पल की देर।

पल-पल से जीवन बना,कब हो क्या  अंधेर।।

जीवन  में  पछता  रहे,  करते  समय  विनष्ट।

सोते  जगते  देर  से,  प्राप्त   करें वे    कष्ट।।


समय  मुष्टिका   में  भरी ,सुरसरिता की  रेत।

कण- कण  जाए  रीत सब,भरे भले बहु  खेत।।

उल्लंघन   मत रेत   का,   करना मानव   मूढ़।

सोच पड़े  यदि  आँख में, अनल यान  आरूढ़।।


राह  वही    उत्तम   सदा, प्राप्त  करे     गंतव्य।

चलना  नहीं  कुराह  में,लक्ष्य न मिलता भव्य।।

पता   न  हो यदि राह का, ज्ञात करें  सद  राह।

वृथा    सदा   भटकाव  है, पथ होता  अवगाह।।


युगल चरण पितु  मात के,संतति को वरदान।

जो   जितनी  सेवा  करे,  उतना  बने   महान।।

मित्र सुदामा- कृष्ण का,  कितना प्रेम   पुनीत।

चरण युगल  धो  मित्र के, करते याद   अतीत।।


                एक में सब 

चरण पड़े जो रेत में,  शुभद  न   लगती  राह।

चिंतन करके  देर तक,  शीतल करते    दाह।।


शुभमस्तु !


10.12.2024●10.45प०मा०

                    ●●●

मत पूछो कौन! [ गीत ]

 557/2024

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


झूठ का पुलिंदा

मत पूछो कौन !


जो उसको लाया

उसे  ही   सताया

पीता  रहा खून,

मीठे कोयल के बोल

शहद बातों में घोल

खाए बिना मिर्च नून,

नित्य ग्रीवा का फंदा

शोषित क्यों  मौन।


स्वयं  फिरे आजाद

अनुगामी   बरबाद

करे एक नहीं काज,

भला चाहता है कौन

सदा बजा करे फोन

खुजाए जाओ खाज,

छाँट भेजा है चुनिंदा

रेड कारपेटी लॉन।


झूठ बुलाए  न भगवान

काजू पिस्ते के पकवान

बाँट भाषण की खीर,

शयन कनक सजी शैया,

कोई  बाप  नहीं भैया,

मिली  ऐसी   तकदीर,

चले हेकड़ी का  रंदा

एक नहीं  दस भौन।


शुभमस्तु !


10.12.2024●8.45 प०मा०

                  ●●●

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...