शुक्रवार, 29 नवंबर 2024

पर मुझे रुकना नहीं है [ नवगीत ]

 545/2024

     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


वर्जनाएँ  तो बहुत हैं

पर मुझे रुकना नहीं है।


दो कदम आगे बढ़ा तो

बढ़ न पाते कदम मेरे

ये करो ऐसा न करना

रात -दिन बंधन घनेरे

आँख खोले यदि चलो तो

पंथ में झुकना नहीं है।


दे रहे उपदेश सब ही

बात उनकी ही सही है

और सब हैं गलत बंदे

सत्य से वह दूर ही है

आज चौराहे पर खड़ा 

भयभीत हो छुपना नहीं है।


राह भी मुझको बनानी

मंजिलें  पानी  मुझे  ही

क्यों भटकना है मुझे यों

दीप क्यों अधबर बुझे ही

चल 'शुभम्' पीछे न जाना

मध्य में  चुकना नहीं  है।


शुभमस्तु !


28.11.2024●10.45आ०मा०

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आदमी की खोज जारी [ नवगीत ]

 544/2024

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी को आदमी की 

खोज जारी।


देह  तो  सबकी  लगे वे

आदमी हैं

आदमी थे वे सभी कल

आज भी हैं

आदमी ही आदमी  पर

बहुत भारी।


नाक मुँह दो आँख तो अच्छे

भले हैं

किंतु  पैने  दाँत  कुछ कहने

चले हैं

आदमी  ही  आदमी  को

तेज आरी।


चमड़ियों   के  रंग   से तू

भरमा नहीं

आदमी   में   आदमी  की

गरिमा नहीं

'शुभम्'समझा शहद-सा जो

विषम खारी।


शुभमस्तु !


28.11.2024●8.45 आ०मा०

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गाँव है तो [ नवगीत ]

 543/2024

                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गाँव   है   तो  गाँव का ही

शोर है।


लाल   गोला  गाँव  के पूरब

उगा है

अमराइयों में वानरों का स्वर

जगा है

मुड़गेर पर वह नाचता इक

मोर है।


ले चले हल   बैल अपने

खेत में

कृषक   नंगे  पाँव चलते

रेत में

दूर नभ में दिख रहा 

घन घोर है।


ले  चली  झुनिया  कलेवा 

शीश  धर

उधर  होरी   व्यस्त  अपने 

खेत  पर

पाँव  की   चप्पल  फ़टी

कमजोर है।


शुभमस्तु !


27.11.2024●12.30प०मा०

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[4:25 pm, 27/11/2024] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

केवल सियासत [नवगीत]

 542/2024

          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक कोना भी नहीं खाली

केवल सियासत।


मंदिरों या मस्जिदों

केवल वही

स्कूल कालेज में वही

बहती  रही

जागीर है उसकी 

उसकी रियासत।


मत समझना आदमी

है आदमी

शक सुबह करना

सदा है लाजमी

नज़र हो केवल भरी

मन में हिकारत।


आँख में घड़ियाल के

आँसू भरे

वेदना दुख दर्द के

द्रुम हैं हरे

आदमी की आदमी से

बस तिजारत।


शुभमस्तु !


27.11.2024●10.30आ०मा०

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सूरज है अति कुनकुना [ दोहा ]

 541/2024

 

[ कुनकुना,धूप,नर्म,ठिठुरन,सूरज]

                  सब में एक

दीवाली के   बाद  ही, दिवस कुनकुना  खास।

सुखद लगा    अति देह को,  गेंदा   भरे   सुवास।।

पीना  जल नित कुनकुना , हो नीरोग  शरीर।

शरद  शिशिर  हेमंत  में, पिएँ  सभी धर  धीर।।


शरमाती  बल  खा  रही,शरद शिशिर  की  धूप।

बदले   प्राची  शाटिका,  नित्य  नए रँग    रूप।।

रूप शरद की धूप - सा,हे कामिनि  अति  रम्य।

नयनों  को  शीतल  करे,रूपसि रूप   प्रणम्य।।


नर्म-नर्म    अति  दूब   है, अमराई   के  मध्य।

पद   परसें   आनंद   दे, रहती  सदा  अबध्य।।

नर्म तुम्हारी   देह   का, सुखद सौम्य अहसास।

बिखरे पाटल पुष्प - से, महके  मधुर    सुवास।।


पौष  मास की  ठंड  में, ठिठुरन करे  धमाल।

हाथ  पाँव  हिम  हो  गए, बुरा गात का  हाल।।

ठिठुरन वाली  ठंड में, पिड़कुलिया  के बोल।

लगते  हैं   रस  घोलते, कर्ण  कुहर में   तोल।।


अब सूरज भी जागते,क्यों प्रतिदिन  सविलंब।

जल्दी  जाते  धाम वे,दिखला अरुणिम   बिंब।।

सूरज   दादा  आपने, ओढ़ लिया  क्यों  शाल!

शीत  सताए    आपको, बिगड़ रहा है   हाल!!

                   एक में सब

सूरज है  अति कुनकुना,  धूप नर्म    कालीन।

ठिठुरन को ले आ गया,खग पशु मनुज प्रवीन।।


शुभमस्तु !

26.11.2024●10.00प०मा०

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एकजुट होकर रहना [ गीत ]

 540/2024

            

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मिला हाथ में

हाथ चलें हम 

 साथ ,एकजुट होकर रहना।


मिले कड़ी से 

कड़ी ,बने जंजीर 

तोड़ कोई क्या  पाए!

रुकना झुकना

नहीं राह में

रुख बदलें नव धार बनाए।।

मुर्दे बहते हैं

प्रवाह में

प्रखर धार में  उलटा बहना।


जहाँ सपोले 

आस्तीन में

 हिंद धरा में  छिपे हुए हैं।

खाते मुफ़्त अनाज

काटते बाँहें ग्रीवा

हिंद चक्षु के  तीक्ष्ण सुए हैं।।

सँभलें -सँभलें

आज गिराते गाज

बाद में कुछ  मत कहना।


बँटने वाला ही

कटता है

भूल न जाना देश हमारा।

हम प्रहरी

हम पोषक पालक

नहीं सपोले हमें गवारा।।

'शुभम्' एक हों

सनातनी सब

हमें अंक माँ के क्यों दहना!


शुभमस्तु !

26.11.2024●7.45 आ०मा०

सोमवार, 25 नवंबर 2024

नवीनीकरण [ व्यंग्य ]

 539/2024 


 

 ©व्यंग्यकार 

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 इस सृष्टि में नया कुछ भी नहीं है।सब कुछ पुराने का दोहराव मात्र है। अभिव्यक्ति की शैली तथा माध्यम भिन्न हो सकता है।किंतु कवि, लेखक,कहानीकार,उपन्यासकार,गीतकार,चित्रकार,कुम्हार, वास्तुकार,रंगकार आदि सभी उसी पुराने ढोल को पीट -पीट कर नया संगीत बनाने सजाने में सन्नद्ध है।अपने-अपने नित्य कर्म से आबद्ध है।यहाँ तक कि इस सृष्टि का निर्माता भी नित्य उन्हीं सुबह,साँझ,सूरज,चाँद,पेड़-पौधों, सरिता,गिरि, सागर को नए रूप में नवीनीकृत करने का प्रयास करता है।और इस जगत में विद्यमान रचनाकार नव निर्माण के गुरूर में समाता नहीं। कोई कुछ नया नहीं कर रहा है। सब कुछ पहले ही विद्यमान है और तू समझ रहा है कि तू नव निर्माता है!सृजनकर्ता है! ब्रह्मा है!अब तो ब्रह्मा जी को भी नव निर्माण से पूर्व सौ बार सोचना पड़ता है कि कहीं पहले तो नहीं बन गया और मैं उसी की पुनरावृत्ति किए दे रहा हूँ! निर्माण भी इतना अधिक हो गया है कि ध्वंस-ईश को अंततः उसका संहार करना पड़ जाता है ।

 बात साहित्य सृजन की करते हैं।हर साहित्यकार नया कहने और लिखने का दम्भ पाले हुए जी रहा है और लेखनी से निसृत सुरा पी रहा है। जब उसे ज्ञात ही नहीं कि इससे पहले भी बहुतों ने इसी बात को अपने ढंग से कह दिया है ,तो तुम्हारा नया क्या है ? सब कुछ पुरानी लकीर को पीटना है। तुम्हें भी अपने ढंग से कलम घसीटना है। सब नवीनीकरण हो रहा है। 

 यहाँ प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जब सब कुछ जीर्णोद्धार है,पुनः-पुनः पूर्वकथित का उच्चार है तो तुम्हारा लिखना बेकार है। बेकार कुछ भी नहीं है। तुम्हें भी ब्रह्मा बनने का पूरा अधिकार है।हाँ,इतना अवश्य है कि रखना नहीं होगा तुम्हें नव सृजन का अहंकार। ईंट भी वही गारा भी वही, नया क्या लाओगे ! नया क्या बनाओगे! नया क्या आजमाओगे! बस अपने गले में टाँगकर प्रशस्ति की तख्ती किंचित इतराओगे। 

 कुछ लोग ब्रह्मा बनने के चक्कर में भ्रमित हैं। दिग्भ्रमित हैं। वे नए छंद निर्माता बने हुए हैं।एक चने से भाड़ फोड़ने में लगे हुए हैं। मूढ़ अनुगामियों की भीड़ उनकी पूँछ बनी हुई है। वे हनुमान जी बने हुए कभी इस कँगूरे पर कभी उस कँगूरे पर उछल -कूद मचा रहे हैं और अनुगामी बंदर -बंदरियां सिहा रहे हैं।कभी पूर्ण विराम लगाते हैं ,कभी अर्द्ध विराम सजाते हैं और स्व घोषित नव छंद निर्माण का अपने नाम इतिहास लिखवाते हैं। आदमी की महत्त्वाकांक्षा जो न करे !कम ही है।मैंने पहले ही कहा है कि इस आदमी नामके दो टाँग धारी और दुमहीन नर - नारी की शातिराना चमत्कारी कहाँ नहीं दिखाई देती! अब साहित्य ही क्यों उससे वंचित रह जाएगा! छल -छिद्र मय रूप कहाँ गुप्त रह पाएगा !वह जहाँ भी जाएगा ,अपना चरित्र अवश्य चरितायेगा।उसी हाड़-माँस से जैसे ब्रह्मा जी पशु पक्षी कीट मानव मछली मेढक आदि का निर्माण कर रहे हैं, वह भी इधर का उधर स्थान परिवर्तन मात्र है।किंतु जीव और जगत के लिए वह नित्य नवीन है। 

 नया बना लेने के गुमान में आदमी अपनी खुशियों का लेबल ऊँचा कर लेता है और असली ब्रह्मा को भूल कर स्वयंभू ब्रह्मा बन बैठता है। मैं किसी एक का नाम क्यों लूँ ? वह काशी,मथुरा,पुरी,द्वारिका कहीं भी हो सकता है। उग सकता है। बरसात में अनायास ही कुकुरमुत्ते उग आते हैं। न कोई बीज बोता है, न खाद डालता है।फिर भी सिर उठा तन ही लेते हैं। कुकुरमुत्तों की क्या ! वे तो उगेंगे ही।वैसे ही स्वतः मुरझाकर सूख भी जाने हैं। उन पर आम, सेव या केले नहीं लटक पाने हैं। आदमी का अहंकार जो न करे!

 शुभमस्तु !

 25.11.2024●845आ०मा० 

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है विचित्र अति हाल [ गीतिका ]

 538/2024

         

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भरी  विविधता  जग  जनगण   में।

नहीं   लीन   वे      रस-वर्षण   में।।


धूल  लदी    है    ढेरों     मन   पर,

रुष्टा -  तुष्टा   वे      क्षण -क्षण  में।


कोयल  कम  कागा    ही   बसते,

रुचि  जिनकी है नित बस रण में।


अहंकार    की     काई       छाई,

रमता  है      मन     संघर्षण   में।


नैतिकता   की   पूछ    न    कोई,

झूठ  बिका करता  है    पण  में।


ढूँढ़  रहे       मंदिर    मस्जिद  में,

बसा  हुआ है प्रभु कण- कण में।


है  विचित्र अति  हाल जगत का,

'शुभम्' मिले कैसे  रब   व्रण  में।


शुभमस्तु !


25.11.2024●6.15आ०मा०

                 ●●●

भरी विविधता [ सजल ]


537/2024

            

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समांत        : अण

पदांत         : में

मात्राभार     : 16.

मात्रा पतन   : शून्य।


भरी  विविधता  जग  जनगण   में।

नहीं   लीन   वे      रस-वर्षण   में।।


धूल  लदी    है    ढेरों     मन   पर।

रुष्टा -  तुष्टा   वे      क्षण -क्षण  में।।


कोयल  कम  कागा    ही   बसते।

रुचि  जिनकी है नित बस रण में।।


अहंकार    की     काई       छाई।

रमता  है      मन     संघर्षण   में।।


नैतिकता   की   पूछ    न    कोई।

झूठ  बिका करता  है    पण  में।।


ढूँढ़  रहे       मंदिर    मस्जिद  में।

बसा  हुआ है प्रभु कण- कण में।।


है  विचित्र अति  हाल जगत का।

'शुभम्' मिले कैसे  रब   व्रण  में।।


शुभमस्तु !


25.11.2024●6.15आ०मा०

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गुड़ ही गुणागार! [ व्यंग्य ]

 536/2024


              

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

खीर का स्वाद गुड़ाधारित है।जितना गुड़ ,उतनी खीर मीठी। नहीं तो सीठी की सीठी। न खाए आदमी न चाटे चींटी।ये दुनिया इसी सिद्धान्त पर चल रही है। यही कहानी है जो अविरल रही है।कहने को तो बहुत-सी आदर्श की बातें हैं।बिना गुड़ (दहेज)के तो फ़ीकी सुहाग रातें हैं। न सास खुश न ससुरा,ना ना करते हुए भी नाव जैसा हाथ पसरा।ये हिंदुस्तान है,जहां आदर्श किताबों के लिए हैं और यथार्थ का चमन सजता। हसबैंड का बैंड तभी बजता,जब दुल्हिन के लिए सोने का गहना बजता। क्या ऐसा भी कोई बटलोई है ,जहां बिना गुड़ के बने खीर की रसोई है?

  बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है :मन मन भावे, मुड़ी हिलावे।ये मुड़ी हिलाना ही सुंदर सजीला आदर्श है। मात्र झूठी औपचारिकता।सामने वाले को घोलकर पी जाने की सम्पूर्ण मानसिकता।सभी बटलोइयों में एक ही खीर पक रही है।किसी में चटपटी दाल भाजी नहीं,सब में गाढ़ी -गाढ़ी सफेद खीर रंध रही है। मेरे ख़्याल से इस ब्रह्मांड में आदमी संज्ञाधारी जीव से शातिर ,शरीर और शैतान कोई जीव नहीं है।साँप से भी अधिक जहरीला, कोबरा से भी अधिक फनैला, कीचड़ से भी ज्यादा मैला, धुँए से भी अधिक धुमैला कोई नहीं। सच्चे अर्थों में आदमी एक पहेली है।रसना से गुड़ की भेली है तो भीतर से विष भरी थैली है।

 गन्ना गुड़ का मूल है।उससे चीनी,खांड, मिश्री, शिरका ,राब या शराब कुछ भी बनाइए।अलग-अलग मिठास ,अलग-अलग स्वाद। यह मिठास जिसके भी साथ हो ले,उसी में नया रस घोले। जैसा पात्र वैसा ग्राहक।शराब पसंद को मिश्री पसंद क्यों आएगी ! सबका धन्ना सेठ एकमात्र गन्ना। 

 मिठास का विकास कुछ यों ही नही हुआ।यही वह शै है जो ज़ुबान में हो जाए तो अच्छे -अच्छे को पटखनी खिलाए।प्रकृति ने शहद को भी मीठा ही बनाया।उसे वाणी का गुणगान बनाया।उसे भालू खाए या भलामानुष ,पर मक्खियों के काम नहीं आया। सब कुछ सबके लिए होता भी नहीं है।' जा को काम वा ही है साजे, और करे तो ठेंगा बाजे'। गुड़ में अपना विशेष गुण न होता तो दुनिया में गुड़ गोरी चीनी से पीछे होता। गुड़ अगर गाँव है तो चीनी किसी बनावटी नगर का ठाँव है।कुछ लोग गुड़ बड़े शौक से खाते हैं ,किंतु गुलगुलों से परहेज करते हैं। यह दिखावटी अभिनय सहज ही गले से नीचे नहीं उतरता।हमारे देश में ऐसे भी नेता हुए हैं ,जो खेत में गन्ने के बजाय गुड़ बोते हैं।कोई आलू से सोना बनाने का वहम पाले हुए है।ये हमारे आदर्श लोकतंत्र के नेता हैं !जो ज़ुबान पर नायक और अंदर से सरौता हैं।

 गुड़ बहुत कुछ गुरु के समकक्ष है।गुरु प्रकाश का पुंज है,विस्तारक है तो गुड़ माधुर्य का भंडार है।गन्ने के बाद रसोत्पन्न प्रथम उत्पाद गुड़ ही है।वह गुणागार है।गुणसागर है। गुणाधार है।परंतु वह खारी नहीं ,मीठा है।वह सर्व मिठासों में सर्वजेता (चैम्पियन )है। उसका अनुपात ही खीर के माधुर्य को सुनिश्चित करता है। अरे भई !गुड़ की भेली न दीजिए ,गुड़ जैसा तो बोलिए।

 शुभमस्तु ! 

 24.11.2024●5.00प०मा०

गुड़ ही गुणागार! [ व्यंग्य ]



536/2024 

 

©व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 खीर का स्वाद गुड़ाधारित है।जितना गुड़ ,उतनी खीर मीठी। नहीं तो सीठी की सीठी। न खाए आदमी न चाटे चींटी।ये दुनिया इसी सिद्धान्त पर चल रही है। यही कहानी है जो अविरल रही है।कहने को तो बहुत-सी आदर्श की बातें हैं।बिना गुड़ (दहेज)के तो फ़ीकी सुहाग रातें हैं। न सास खुश न ससुरा,ना ना करते हुए भी नाव जैसा हाथ पसरा।ये हिंदुस्तान है,जहां आदर्श किताबों के लिए हैं और यथार्थ का चमन सजता। हसबैंड का बैंड तभी बजता,जब दुल्हिन के लिए सोने का गहना बजता। क्या ऐसा भी कोई बटलोई है ,जहां बिना गुड़ के बने खीर की रसोई है?

  बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है :मन मन भावे, मुड़ी हिलावे।ये मुड़ी हिलाना ही सुंदर सजीला आदर्श है। मात्र झूठी औपचारिकता।सामने वाले को घोलकर पी जाने की सम्पूर्ण मानसिकता।सभी बटलोइयों में एक ही खीर पक रही है।किसी में चटपटी दाल भाजी नहीं,सब में गाढ़ी -गाढ़ी सफेद खीर रंध रही है। मेरे ख़्याल से इस ब्रह्मांड में आदमी संज्ञाधारी जीव से शातिर ,शरीर और शैतान कोई जीव नहीं है।साँप से भी अधिक जहरीला, कोबरा से भी अधिक फनैला, कीचड़ से भी ज्यादा मैला, धुँए से भी अधिक धुमैला कोई नहीं। सच्चे अर्थों में आदमी एक पहेली है।रसना से गुड़ की भेली है तो भीतर से विष भरी थैली है। 

   गन्ना गुड़ का मूल है।उससे चीनी,खांड, मिश्री, शिरका ,राब या शराब कुछ भी बनाइए।अलग-अलग मिठास ,अलग-अलग स्वाद। यह मिठास जिसके भी साथ हो ले,उसी में नया रस घोले। जैसा पात्र वैसा ग्राहक।शराब पसंद को मिश्री पसंद क्यों आएगी ! सबका धन्ना सेठ एकमात्र गन्ना।

 मिठास का विकास कुछ यों ही नही हुआ।यही वह शै है जो ज़ुबान में हो जाए तो अच्छे -अच्छे को पटखनी खिलाए।प्रकृति ने शहद को भी मीठा ही बनाया।उसे वाणी का गुणगान बनाया।उसे भालू खाए या भलामानुष ,पर मक्खियों के काम नहीं आया। सब कुछ सबके लिए होता भी नहीं है।' जा को काम वा ही है साजे, और करे तो ठेंगा बाजे'। गुड़ में अपना विशेष गुण न होता तो दुनिया में गुड़ गोरी चीनी से पीछे होता। गुड़ अगर गाँव है तो चीनी किसी बनावटी नगर का ठाँव है।कुछ लोग गुड़ बड़े शौक से खाते हैं ,किंतु गुलगुलों से परहेज करते हैं। यह दिखावटी अभिनय सहज ही गले से नीचे नहीं उतरता।हमारे देश में ऐसे भी नेता हुए हैं ,जो खेत में गन्ने के बजाय गुड़ बोते हैं।कोई आलू से सोना बनाने का वहम पाले हुए है।ये हमारे आदर्श लोकतंत्र के नेता हैं !जो ज़ुबान पर नायक और अंदर से सरौता हैं। 

  गुड़ बहुत कुछ गुरु के समकक्ष है।गुरु प्रकाश का पुंज है,विस्तारक है तो गुड़ माधुर्य का भंडार है।गन्ने के बाद रसोत्पन्न प्रथम उत्पाद गुड़ ही है।वह गुणागार है।गुणसागर है। गुणाधार है।परंतु वह खारी नहीं ,मीठा है।वह सर्व मिठासों में सर्वजेता (चैम्पियन )है। उसका अनुपात ही खीर के माधुर्य को सुनिश्चित करता है। अरे भई !गुड़ की भेली न दीजिए ,गुड़ जैसा तो बोलिए। 

 शुभमस्तु ! 

 24.11.2024●5.00प०मा ०


 

सोचने बैठें तो ... [ व्यंग्य ]

 534/2024

            


©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सोचने बैठें तो सोच की पगडंडियाँ शुरू हो जाती हैं। अब यह अलग बात है कि हम किस पगडंडी को अपनी यात्रा के लिए चुनते हैं।अब यह भी तो हमारे ऊपर ही निर्भर करता है कि हमें यात्रा करनी भी है अथवा नहीं।कभी -कभी ऐसा भी होता है कि हम कहीं नहीं जाते और वहीं के वहीं मस्ट मारकर बैठे रह जाते हैं।यदि किसी पगडंडी पर चल पड़ेंगे तो मंजिल भी मिलेगी।इसलिए बेहतर यही रहता है कि चलें।चलते रहें। चल ही पड़ें।अन्यथा पड़े-पड़े क्या झख मारें!क्योंकि हमारे उपनिषदों में चरैवेति चरैवेति का प्रेरक संदेश दिया गया है। यदि चींटी भी चल पड़े तो वह हजारों योजन की यात्रा कर लेती है और गरुण भी यदि बैठा रहे तो एक इंच भी नहीं हिल पाता। इसलिए चलते रहना ही जीवन है।


जिधर भी दृष्टि डालें,सब चल रहे हैं।चलते चले जा रहे हैं। जब सब चल रहे हैं तो उनके चलने का कोई न कोई लक्ष्य भी होगा।कोई न कोई  गंतव्य भी होगा। जहां तक मैं समझता हूँ कोई निरर्थक नहीं चलता।सबकी यात्रा सार्थक ही होती है।सार्थक होनी ही चाहिए।चाँद,सूरज,धरती,आग,पानी कोई भी तो स्थिर नहीं है।सबकी प्रकृति चलना ही है।क्योंकि रुकना ही मृत्यु है और मरना कोई भी नहीं चाहता। इसलिए सबको चलना है।एक यायावर भी निरर्थक नहीं चलता।


चलने का दूसरा नाम जीवन है।यदि जीवन को जीवंत रखना है,तो चलते रहें। रुकें नहीं। युग-युग से  आदमी चलता रहा तो गुफाओं के निवास ,छाल पत्तों के लिबास और मांस आदि से मिटाता हुआ अपनी  भुकास ; वह  आज कहाँ से कहाँ जा पहुँचा है ! यह सब उसके अनथक और निरंतर चलते रहने का सुपरिणाम है। वह चला ,इसलिए आज मानव से दानव और पिशाच के गंतव्य को भी पा सका है। चलने पर यह आवश्यक नहीं कि सब कुछ सकारात्मक ही हो। परिणाम नकारात्मक भी हो सकता है। वह चला है तभी तो नारी को देवी लक्ष्मी दुर्गा और सरस्वती मानने वाला इंसान आज नराधम की मंजिल तक जा पहुँचा है।अपनी माँ बहन को माँ बहन और दूसरे की माँ बहन को भोग्या,क्रीत दासी ,पैरों तले की जूती,वेश्या और दुश्चरित्रा मानने वाला 'महापुरुष' ढोरों से भी नीचे जा पहुँचा। यह भी तो मनुष्य के निरन्तर चलते रहने का परिणाम है। भले ही वह कुपरिणाम हो। जब चलेंगे तो कहीं न कहीं पहुचेंगे भी।


चलते चले जाने की सोच कहाँ से कहाँ की यात्रा करा सकती है, यह  इस मन और बुद्धि के चलने का ही फल है।चलने के लिए रास्ते और पगडंडियाँ चयन करना बुद्धि के चलने का काम है।किसकी बुद्धि कहाँ तक और किस दिशा में चले, कौन जाने ! मन और बुद्धि की चलन-यात्रा  कुछ यों ही नहीं हो जाती ! इसलिए सबके मन और बुद्धियाँ अलग -अलग पथ चुनती हैं। मन और बुद्धि की चलन -यात्रा से ही मनुष्य देव तुल्य, पिशाच तुल्य या दानव तुल्य बनता है। सब चल रहे हैं। सबकी पगडंडियां अलग हैं। रास्ते अलग हैं। मंजिल भी अलग ही होंगीं। आदमी बस अपने को चला रहा है।


ये सोचने के लिए बैठना भी एक चलन - यात्रा है।कहाँ से चले थे,कहाँ जा पहुँचे।यात्रा रुकनी नहीं चाहिए। यह अलग बात है कि अलग -अलग पड़ावों पर किंचित ठहर कर  और सूचिन्तन कर लिया जाए कि भटकें नहीं।अटकें नहीं। यात्रा चाहे जल की हो नभ की हो या भूतल की हो ; यात्रा तो यात्रा ही है।यात्रा है तो आधार भी होना चाहिए। निराधार यात्रा भटकाव मात्र है।जैसे बियावान जंगल में भटक गया हो। ऐसी यात्रा किसी काम की नहीं है। न पौधे रुके हैं न जलचर, नभचर या थलचर ;तो मनुष्य ही क्यों रुके। बस, यात्रा सार्थक और सोद्देश्य होनी चाहिए। हमारी चिंतन - यात्रा भी सार्थक हो,यही कामना है।

क्या -क्या सोचने बैठे थे और क्या सोच बैठे।मन को रुकना नहीं आता। वह नहीं रुका। चलता ही रहा और यहाँ लाकर कर दिया खड़ा कि  चलते रहो।चलते रहो। एक सोद्देश्य यात्रा पथ के यात्री बनो। यही चलने की सार्थकता है।सोचने बैठने की भी।


शुभमस्तु !


24.11.2024●11.15 आ०मा०

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आज तक नहीं भूला वह दिन [संस्मरण]

 533/2024


  

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरू 

  जीवन के कुछ पल ,दिन और छोटी - छोटी घटनाएँ ऐसी भी होती हैं,जो कभी नहीं भूलतीं।बात उन दिनों की है ,जब वर्ष 1975 में मैंने एम०ए० उत्तीर्ण कर लिया था।1976 में मैंने पी-एच०डी० के लिए आगरा विश्वविद्यालय में पंजीकरण करा दिया था।तभी एक दिन साइकिल से आगरा जाते समय मेरा इंटरमीडिएट का सहपाठी हृदयेश कुमार गुप्ता मिला। उसने मुझसे कहा चल मैं तुझे अपनी कंपनी के मालिक से मिलवाता हूँ। शायद तुझे भी जॉब मिल जाये।उस समय मैं बेरोजगार तो था ही,इसलिए मन में एक उम्मीद लिए हुए मैं उसके साथ उस कंपनी के ऑफिस में चला गया। इतना तो अवश्य ही कहूँगा कि वह कंपनी (नाम का उल्लेख नहीं किया जाए तो उत्तम है) आगरा में मेरे घर से चार -पाँच किलोमीटर दूर टेढ़ी बगिया पर स्थित थी।

   कम्पनी के ऑफिस में जाने पर मेरा मित्र तो खड़ा रहा और मुझे बैठ जाने का संकेत किया।एक बड़ी सी मेज के सामने रिवोल्विंग चेयर पर एक तीस वर्षीय युवा व्यक्ति बैठा हुआ था। उसके संकेत पर मैं सामने पड़ी हुई एक कुर्सी पर बैठ गया और अपने दोनों हाथ मेज पर रख लिए। किन्तु यह क्या ? कि सामने बैठे हुए व्यक्ति ने मुझसे कहा ठीक से बैठिए अर्थात उसका इशारा मेरे द्वारा मेज पर हाथ रखना उसे ठीक नहीं लगा।तुरंत ही मैंने अपने हाथ नीचे किए और मेरा चेहरा एकदम फीका पड़ गया। मैं अपमान का कड़वा घूँट पीकर रह गया। मैंने बिना कोई देरी किए वहाँ से बाहर आना ही उचित समझा और मित्र से कहा - अच्छा हृदयेश मैं चलता हूँ। मुझे देर हो रही है।एक पल की भी देरी किए बिना मैंने उस व्यक्ति को यह भी मौका नहीं दिया कि वह मेरे आने का उद्देश्य भी पूछ पाता। वह दिन है कि आज का दिन है इस तरह के अहंकारी धनाढ्यों से एक वितृष्णा हो गई है। 

 शुभमस्तु ! 

23.11.2024●9.15प०मा० ●●●

विरत यात्रा [ नवगीत ]

 532/2024

                 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


घोंसले से

घोंसले की

विरत यात्रा।


उड़ रहा तू

पंख के बिन

युग-युगों से,

थकता नहीं

रुकता नहीं

बेपर डगों से,

तू न चालक

चल रही है

तिरथ यात्रा।


प्राण की 

डोरी बँधी 

तू साथ उसके,

देह मिलती

मनुज या खग 

मस्त रस से,

विवश जीवन

और के हित

सिरत यात्रा।


एक पल भी

तू न बैठे

चल निरंतर,

गंतव्य है

फिर भी नहीं

है रिक्त अंतर,

जीव की ये

होती 'शुभम्'

निरत यात्रा।


शुभमस्तु !

23.11.2024●2.15प०मा

स्वयं धुरंधर बन बैठे [ नवगीत ]

 531/2024

       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


टाँगी खूँटी पर

मानकता

स्वयं धुरंधर बन बैठे।


ऊबड़-खाबड़

लय अधकचरी

नहीं वर्तनी शुद्ध कहीं,

ज्ञान- गूढ़

कहलाते खुद ही,

कर लेते वे युद्ध  वहीं,

बतलाए

यदि सुपथ बीच में

उस पर  तने हुए ऐंठे।


लारी नहीं

बोगियां भर-भर 

कवियों की निकली बारात,

सभी कह रहे

दुलहा मैं ही

सुनता नहीं किसी की बात,

लंबी ग़ज़ल

गीत कविताएँ

छंद हायकू भी गेंठे।


शॉल गले में 

पड़ जाए तो

मैं ही सूर निराला पंत,

कालिदास 

मैं ही हूँ तुलसी

मैं मीरा कवयित्री संत,

सम्मानों के

भूखे प्यासे

पे टी एमों पर  लेटे।


शुभमस्तु !

23.11.2024●10.15आ०मा०

                       ●●●

कवियों की बारात [ नवगीत ]

 530/2024

               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखो कैसी

चली जा रही

कवियों की बारात।


सभी कह रहे

मैं ही दुलहा

कविता मेरा प्यार।

मेरे ही सँग 

भाँवर पड़नी

दूर हटो जी यार।।

देखो तो

सौभाग्यकांक्षिणी

संग मने शुभ रात।


नवगीतों की

करे सवारी

कोई दोहा छंद।

कुंडलिया

अतुकांत लिखे वह

तोड़ छंद के फंद।।

व्यंग्य तीर में

मस्ती करता 

'शुभम्'  साँझ या प्रात।


सूत्रधार

नाटक का कोई

लिखे कहानी लेख।

सभी मस्त

मदिरा में अपनी

नया तमाशा देख।।

ऋतुओं  के रँग

शरद शिशिर सँग

है वसंत बरसात।


ग़ज़लकार की

पूछ न बातें

उर्दू का उस्ताद।

लिखे गीतिका

हिंदी में जो

कहे सजल का नाद।।

जितने कवि

उतनी कलमें हैं

करता  कोई  घात।


गद्य - पद्य

कविता व्यंग्यों के

सभी स्वाद का घाट।

संगम यहीं

'शुभम्' के सँग है

सभी रंग के ठाट।।

बच्चों के सँग

बच्चा होता

करता तुतली बात।


शुभमस्तु !


22.11.2024●2.00प०मा०

                ●●●

पंचर बॉय [अतुकांतिका]

 529/2024

                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


किसी का

खोल दिया टायर,

किसी के पहिए की

 निकाल दी हवा,

कोई खड़ी है  

ऊपर उठाए टाँगें 

सीट के बल,

 कैसा है ये

 पंचर वाला मुआ।


सभी को उलझाना

सभी को फँसाना

न किसी का काम 

पूरी तरह निबटाना,

वसूलना भी तो है

उससे इसी काम की कीमत,

है कोई जो उठा ले जाए

अपनी ही बाइसिकिल

किसी की हिम्मत ?


व्यवसाय का फॉर्मूला 

है यही सब

सबको उलझाए रखो,

बारी - बारी से काम होगा

यही सिद्धांत 

दिखाते रहो!


पंचर वालों की तरह ही

प्रकाशन का पहिया

घूमता है,

तब कहीं जाके

सफलता के पाँव चूमता है।


किसी की हवा

निकले तो निकले,

उन्हें तो वसूलने ही हैं

उनसे अपने पैसे जितने,

किसी का वाल्व बदला

किसी को काटा चिपकाया

देखते ही देखते

बाइसिकिल को

सीधा खड़ा करवाया।


शुभमस्तु !

22.11.2024● 12.30 प०मा०

                  ●●●

जब तक जगत में झूठ है! [अतुकांतिका]

 

528/2024

    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जब तक जगत में झूठ है

सब कुछ करें यह  छूट है,

सत्य से नहीं चलता जीवन

 न मानो तो सियासत झाँक लो।


सत्य   एक   कागज   की रसीद है,

झूठ ही   जज    वही    वकील  है,

बैठा   हुआ  है सत्य किसी कोने में,

झूठ हर खास-ओ-आम को  मुफ़ीद है।


झूठ से कहीं   कोई   नहीं डरता,

सभी को मात्र  सत्य   का भय है,

झूठ से चल  रही रोज दाल-रोटी,

वही तो घूमता -फिरता निर्भय है।


बीसियों वर्ष हुए सत्य फाइलों में कैद मिला,

केस चलते रहे न्याय अब तक न

दिखा,

सत्य के ऊपर झूठ का दुशाला काला,

चलता यों ही रहा झूठ का सिलसिला।


झूठ से  किसी को भी खुश कर लो,

रुई की जगह रजाई में भुस भर लो,

झूठ की   धुरी   पर धरती घूमती है,

सत्य को तो पैसों से  क्रय  कर लो।


शुभमस्तु !


21.11.2024● 9.00प०मा०

                   ●●●

[12:28 pm, 22/11/2024] DR  BHAGWAT SWAROOP: 529/2024

                पंचर बॉय

                [अतुकांतिका]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


किसी का

खोल दिया टायर,

किसी के पहिए की

 निकाल दी हवा,

कोई खड़ी है  

ऊपर उठाए टाँगें 

सीट के बल,

 कैसा है ये

 पंचर वाला मुआ।


सभी को उलझाना

सभी को फँसाना

न किसी का काम 

पूरी तरह निबटाना,

वसूलना भी तो है

उससे इसी काम की कीमत,

है कोई जो उठा ले जाए

अपनी ही बाइसिकिल

किसी की हिम्मत ?


व्यवसाय का फॉर्मूला 

है यही सब

सबको उलझाए रखो,

बारी - बारी से काम होगा

यही सिद्धांत 

दिखाते रहो!


पंचर वालों की तरह ही

प्रकाशन का पहिया

घूमता है,

तब कहीं जाके

सफलता के पाँव चूमता है।


किसी की हवा

निकले तो निकले,

उन्हें तो वसूलने ही हैं

उनसे अपने पैसे जितने,

किसी का वाल्व बदला

किसी को काटा चिपकाया

देखते ही देखते

बाइसिकिल को

सीधा खड़ा करवाया।


शुभमस्तु !

22.11.2024● 12.30 प०मा०

                  ●●●

[2:08 pm, 22/11/2024] DR  BHAGWAT SWAROOP: 530/2024

               कवियों की बारात

                     [ नवगीत ]

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखो कैसी

चली जा रही

कवियों की बारात।


सभी कह रहे

मैं ही दुलहा

कविता मेरा प्यार।

मेरे ही सँग 

भाँवर पड़नी

दूर हटो जी यार।।

देखो तो

सौभाग्यकांक्षिणी

संग मने शुभ रात।


नवगीतों की

करे सवारी

कोई दोहा छंद।

कुंडलिया

अतुकांत लिखे वह

तोड़ छंद के फंद।।

व्यंग्य तीर में

मस्ती करता 

'शुभम्'  साँझ या प्रात।


सूत्रधार

नाटक का कोई

लिखे कहानी लेख।

सभी मस्त

मदिरा में अपनी

नया तमाशा देख।।

ऋतुओं  के रँग

शरद शिशिर सँग

है वसंत बरसात।


ग़ज़लकार की

पूछ न बातें

उर्दू का उस्ताद।

लिखे गीतिका

हिंदी में जो

कहे सजल का नाद।।

जितने कवि

उतनी कलमें हैं

करता  कोई  घात।


गद्य - पद्य

कविता व्यंग्यों के

सभी स्वाद का घाट।

संगम यहीं

'शुभम्' के सँग है

सभी रंग के ठाट।।

बच्चों के सँग

बच्चा होता

करता तुतली बात।


शुभमस्तु !


22.11.2024●2.00प०मा०

                ●●●

गुरुवार, 21 नवंबर 2024

विश्वशांति का स्वर्ग [ दोहा ]

 527/2024

      

[भारत,दिनेश,स्वर्ग,विश्वशांति,पहरेदार]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक

प्रथम नमन उस भूमि को,भारत जिसका नाम।

जन्मे   पाले   पुष्ट    हो , आएं उसके     काम।।

सकल   विश्व   में  एक ही, भारत हिन्दू   देश।

अलग-अलग भाषा भले,अलग-अलग बहु वेश।।


दिनमणि दिनकर दिव्य हो,कहता जगत दिनेश।

सबको नव्य प्रकाश दो,प्रसरित रश्मि   सुकेश।।

हैं     कृतज्ञ    हम  आपके,भरते दिव्य   प्रकाश।

हे    दिनेश   वंदन   करें,  करते  हो  तम  नाश।।


गुरु  जननी  अपने  पिता,यही स्वर्ग शुभ  धाम।

संतति   वही   कपूत  है, भजे और का   नाम।।

स्वर्ग   नहीं   अन्यत्र   है, नरक  नहीं   अन्यत्र।

जननी  -  पितु  पद  पूजिए, स्वर्ग मिले सर्वत्र।।


जन - जन  मन  बेचैन है,विश्वशांति  की बात।

लगती   है  उपहास - सी,    चरण कुठाराघात।।

विश्वशांति  के  दूत  हम,  बनें  करें    कल्याण।

नर्क   बना   है   विश्व  में,  मानवता म्रियमाण।।


सीमा   पर  दुश्मन  खड़ा, उसे न हमसे   प्यार ।

भारत  की    रक्षा   करें,    बनकर   पहरेदार।।

उत्तर    सीमा    में   अड़ा,  ईश्वर का उपहार।

रक्षक  हिमगिरि   शुभ्रतम,  अपना पहरेदार।।


                  एक में सब

विश्वशांति का स्वर्ग है ,भारत  दिव्य दिनेश।

इसके  पहरेदार हैं,   ब्रह्मा   विष्णु     महेश।।


शुभमस्तु !


20.11.2024●6.30आ०मा०

                   ●●●

मंगलवार, 19 नवंबर 2024

क्या कीजिए? [ नवगीत ]

 526/2024

               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दर्पणों से

लड़ रहा है आदमी

क्या कीजिए ?


इधर दर्पण

उधर दर्पण

चतुर्दिक दर्पण महल है,

दृश्य

 चारों ओर तू ही

कौन जो तुझसे सबल है!

तोड़ता है

हाथ अपने आप ही

क्या कीजिए ?


एक बीहड़

अंदरूनी

एक बीहड़ बाहरी भी,

तू बँधा

बिन शृंखला के

सिर सजी है गागरी भी,

दोष औरों पर

लगाता रात - दिन

क्या कीजिए ?


आँधियाँ

अंतर सुनामी 

नित्य प्रति की बात है,

हारकर भी

चाहता क्या हारना 

पा रहा नित घात है,

दूसरों को दुःख

दे - देकर सताए

क्या कीजिए ?


19.11.2024●2.00प०मा०

               ●●●

राम न मिलते [ नवगीत ]

 525/2025

         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम न मिलते

शिला अहल्या

नारी कैसे हो जाए!


पुरुष परुषता 

सिद्ध कर रहे

खोज राम की जारी है,

फ्रिज में

फ्रीज़ नहीं फल सब्जी

खंडित मिलती नारी है,

जिसने छुआ 

नहीं सीता को

रावण दानव कहलाए?


दाँव लगाया

अपना तन - मन

कहलाती घरवाली है,

रार-प्यार होते

न अकेले

बजे न एकल ताली है,

एक - एक मिल

दुनिया बनती

तेरा घर वह बन जाए।


कितने यहाँ

विभीषण बैठे

डाल गले तुलसी माला,

भेद खोलते

देश नाश को

चर्म चक्षु पर है जाला,

'शुभम्' यहाँ

कलयुग पसरा है

राम कहाँ से आ पाए!


शुभमस्तु !


19.11.2024●10.45 आ०मा०

                 ●●●

पूनमी चाँद [ गीत ]

 524/2024

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उपमाएँ अब

वे सब झूठी

लगने लगीं पूनमी चाँद।


जब से

चंद्रयान पहुँचा है

खुली तुम्हारी सारी पोल,

चंद खिलौना

लेने की भी

जिद झूठी थी मात्र किलोल,

लगते हो तुम

अब छूने में

जैसे हो गीदड़ की माँद।


सूरज दादा

धूप न देते

रूप न सुंदर  हो जाता,

प्रेयसि के

गालों की उपमा

कवि न एक भी दे पाता,

तल पर की

चलने की कोशिश

मिले मात्र खर खाबड़ खाँद।


सागर अति

प्रसन्न हो जाता

जब आती है पूनम रात,

ले हिलोर

उठता गिरता है

कभी सुनामी का हो पात,

'शुभम्' दूर के

ढोल सुहाने

लगते हैं जो करते नाँद।


शुभमस्तु !


19.11.2024●6.15आ०मा०

                   ●●●

सोमवार, 18 नवंबर 2024

कहाँ विलुप्त हो गई [ नवगीत ]

 523/2024

         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गंध गाँव - गाँव  की

पारिजाती छाँव  की

कहाँ विलुप्त हो गई।


गाँव - गाँव कब रहे

नाले-नालियाँ   बहे

ट्रैफिक  का झाम है,

जींस   टॉप  धारतीं

कटाक्ष  बाण मारतीं

बाला परी  नाम  है,

वीडियो  में  नाचतीं

रोड में    कुलांचतीं

नारि सुप्त   हो  गईं।


कंकरीट     के   उगे

जंगलात   में    भगे

लोग  और  कौन  हैं,

नीति है  न चरित्र  है

महकता  ये   इत्र  है

धर्म  - कर्म   मौन  है,

माटी  के  दीप   नहीं

लड़ी ही   लड़ी   दही

रीति   गुप्त  हो  गई।


सड़कों   का  जाल है

कृषक     बेहाल    है

डेंगुओं का   जोर  खूब,

नीम   नहीं   बेर  आम

आदमी हैं सब निकाम

शेष    कहाँ    दूब   है ,

'शुभम्'  कहाँ मेघ  रहे

वेद वाक्य   कौन  सहे

धरा    मुक्त   हो   गई।


शुभमस्तु !


18.11.2024●1.45 प०मा०

                ●●●

मौजूदगी तुम्हारी [ नवगीत ]

 522/2024

         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मौजूदगी

तुम्हारी पल - पल

बहुत -बहुत मुझको अखरी है।


नहीं ग़वारा

हुआ आज तक

बारम्बार  तुम्हारा आना।

खड़ी हुई हो

थाल सजाकर

दीप जलाए यों मुस्काना।।

ध्यान टिका है

एक बिंदु पर

किंतु बुद्धि चंचल चकरी है।


कालचक्र 

कब रुकता कोई

उसमें भी आगमन तुम्हारा।

चिंतातुर 

कर देता मन को

पीना पड़े सलिल जब खारा।।

ऊँट खड़ा हो

मरुथल में ज्यों

खड़ी  सामने यह बकरी है।


कहते होता

मधुर - मधुर फल

उसकी  भी तो सीमा कोई।

विदा प्रतीक्षा

जब - जब होती

खुशियाँ भरी आँख तब रोई।।

'शुभम्' समय

जब शुभागमित हो

हो आबाद घड़ी सँकरी  है।


शुभमस्तु !


18.11.2024● 12.45 प०मा०

                    ●●●

शब्दों की सरिता [नवगीत]

 521/2024

         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शब्दों की

सरिता में चलकर

बड़ी दूर तक मैं बह आया।


टूटे मिले

किनारे कितने

मेढक मछली सीप शिवारें।

कछुओं ने

 हड़काया मुझको 

करके अपनी बंद किवारें।।

फिर भी

रुका नहीं यात्रा पथ

मुझको आज कहाँ पहुँचाया।


अवरोधक

उभरे टीले जो

गतिरोधन  करते ही पाए।

उपदेशक

समझा था जिनको

लगता पथ को रहे भुलाए।।

तिनके का

मिल गया सहारा

काव्य सरित में खूब नहाया।


अपनी आँखें

चलो खोलकर

कौन तुम्हें भरमा पाएगा !

अपने दीपक

आप बनो तो

अँधियारा क्यों कर छाएगा??

दीवाना मैं

शब्द - सुमन का

कविता ने हरदम महकाया।


शुभमस्तु !


18.11.2024●11.45आ०मा०

                        ●●●

जनी -जनी को प्रिय [ गीतिका ]

 520/2024

          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जनी- जनी को प्रिय कनबतियाँ।

रस ले- लेकर  सुनतीं  सखियाँ।।


नुक्कड़  पर दो सास  मिल गईं,

चुगली रस से सुरभित जनियाँ।


छींके     पर     टाँगी     मर्यादा,

बही  जा रहीं    गँदली  नदियाँ।


लोकलाज  कुललाज   न   देखें,

अनाघ्रात  मसलीं   नवकलियाँ।


पतित   समाज    गर्त   में  डूबा,

भले बिगड़ती हैं  शुभ छबियाँ।


उपदेशक     उपदेश    दे     रहे,

ग्रीवा   झुका न  देखें   छतियाँ।


'शुभम्'  दिखावे  की  दुनिया है,

गिना  रहे  औरों   की   कमियाँ।


शुभमस्तु !


18.11.2024● 6.45आ०मा०

                   ●●●

रस ले- लेकर [ सजल ]

 519/2024

               

समांत      : इयाँ

पदांत       :अपदांत

मात्राभार   :16

मात्रा पतन  : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जनी- जनी को प्रिय कनबतियाँ।

रस ले- लेकर  सुनतीं  सखियाँ।।


नुक्कड़  पर दो  सास  मिल गईं।

चुगली रस से सुरभित  जनियाँ।।


छींके     पर     टाँगी     मर्यादा।

बही  जा  रहीं  गँदली    नदियाँ।।


लोकलाज  कुललाज   न   देखें।

अनाघ्रात  मसलीं   नवकलियाँ।।


पतित   समाज    गर्त   में  डूबा।

भले बिगड़ती हैं  शुभ छबियाँ।।


उपदेशक     उपदेश    दे     रहे।

ग्रीवा   झुका न  देखें   छतियाँ।।


'शुभम्'  दिखावे  की  दुनिया है।

गिना  रहे  औरों   की   कमियाँ।।


शुभमस्तु !


18.11.2024● 6.45आ०मा०

                   ●●●

न अवरोध करना [ नवगीत ]

 518/2024

           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चले जा रहे हैं

सभी राह अपनी

न अवरोध करना।


किसी के फटे में

न टाँगें फँसाना

न उसको गिला हो,

बिलखते हुए को

इच्छित दिलाना

न तुमको मिला हो,

यथाशक्य भूखे को

भोजन खिलाना

सुख से विचरना।


अपनी ही चिंता में

खोए हैं सारे

मिले नाम नामा,

बँधे शीश पर

लाल पीले मुड़ासे

धार गेरू पजामा,

हँस रहीं सुर्खियाँ 

आज अखबार की

दे रहे खूब धरना।


दिखावे में जीना

दिखावे में  मरना

यही जिंदगी है,

उदित भानु को ही

मस्तक झुकाना

यही वन्दगी है,

'शुभम्' कैसे समझोगे

दुनिया की चालें 

चढ़ना -उतरना।


शुभमस्तु !


15.11.2024●3.45प०मा०

                 ●●●

शुक्रवार, 15 नवंबर 2024

सिद्धांतों की सड़क! [अतुकांतिका]

 517/2024

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बहुत ही सहज है

सिद्धांतों की संगमरी सड़क

बना लेना,

किंतु चलते वक्त

पगडंडियाँ खोजना!

मनुष्यता तो नहीं है।


बेहतर हैं ऐसे लोगों से

ढोर खग जल जीव सभी

जो समय के सिद्धांत के

पालक हैं,

वे भटकते नहीं

श्रेयता के लोभ में

पथ बदलते नहीं।


चाहिए तुम्हें बड़ा नाम

मुक़ाम और भी ऊँचा

तैयार हो तुम 

अपने पतन के लिए,

सराहनीय नहीं यह,

मानवता भी नहीं।


डटे रहो 'शुभम्'

मील के पत्थर की तरह

अविचल अडिग,

राहगीरों भटके हुओं को

रास्ता तो दिखलाओगे!

बिना कुछ बोले

बिना अँगुली किए

पूजे जाओगे।


शुभमस्तु !


14.11.2024●5.15प०मा०

                    ●●●

बुधवार, 13 नवंबर 2024

करते रहो उद्योग धंधा [ नवगीत ]

 516/2024

      

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करते रहो

उद्योग धंधा

फूलता -फलता तुम्हारा।


वेश में हैं

राज कितने

निहित है उद्धार सारा,

देश पीछे

आप आगे

आप ही उसका सहारा,

जो कहो 

वह देश सेवा

जो करो चंदा-सितारा।


सैकड़ों 

अपराध करके

दूध के धोए हुए हो,

रक्तरंजित

हाथ  भी ले

खा रहे मीठे पुए हो,

सुनते नहीं

विनती किसी की

ऊँचा चढ़ा तव भाल पारा।


आदमी को

आदमी तुम

कब समझ लो जानना है,

किस लोक से

आए हुए हो

अब हमें पहचानना है,

मुक्त होना

चाहते सब

कब करो जग से किनारा।


शुभमस्तु !


13.11.2024●4.45 प०मा०

                 ●●●

जागीं कनक खदान [ नवगीत ]

 515/2024

         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चूल्हे नहीं

सुलगते भट्टे

जागीं कनक -खदान।


जिस-तिस

किसी प्रकार बटोरे

भर-भर झोली वोट,

गर्म-गर्म

सिंक रहीं चपाती

पिस्ता सँग अखरोट,

जीरा पड़ा 

ऊँट के मुँह में

मेरा देश महान।


भूखे को

भूखा मरना है

विधि का यही विधान,

स्वर्ण सेज पर

ऊँघ रहे हैं

धनिक रजाई तान,

विकसित करें

देश ये  सारा

नहीं लिया है ठान।


सबकी अपनी

अपनी ढपली

अलग -अलग संगीत,

बहरे कान

जीभ पर चीनी

एक न अपना मीत,

'शुभम्' देश

भगवान भरोसे

जनता टूटी छान।


शुभमस्तु !


13.11.2024● 11.30 आ०मा०

                 ●●●

शरद सुहानी शाम [ नवगीत ]

 514/2024

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


धकिया रही

माघ को भीगी

शरद सुहानी शाम।


बादल के

स्वेटर  को पहने

निकल रहा है घाम,

कलकल नदी

गा रही गुनगुन

जपती माला राम,

लिए बैल हल

निकल पड़े हैं

खेतों में सब गाम।


माघी  पूनों

शॉल ओढ़कर

निकल पड़ी इस ओर,

ब्रह्म मुहूरत 

पावन वेला

मुंडगेरी  पर मोर,

स्नान करें

घन अंधकार में

ललना ललित ललाम।


देवठान को

सुप्त देवगण

जाग गए हे मीत,

परिणय के 

बंधन में बँधते

युवती-युवक सप्रीत,

'शुभम्' सुप्त

सब देव जगे तो

क्यों न जगे ये काम?


शुभमस्तु !


13.11.2024●9.45आ०मा०

जिज्ञासा का शोध [दोहा]

 513/2024

          

[जगत, मंच, कठपुतली,जीवन,खिलौना]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक


जगती  जननी जगत की, जिज्ञासा  का शोध।

जितना भी जिसने किया,प्राप्त नहीं सद बोध।।

जगत   पहेली   जीव   की, सचराचर   संसार।

ब्रह्म  मोह  माया  सभी,  करना  उचित  विचार।।


जगती  के  इस मंच पर,अभिनय करते  पात्र।

कोई   राजा   रंक   है,  कोई   जनता    मात्र।।

शोभा  बनता मंच की,  करके नाटक    नित्य।

कविता   का   कोई  धनी,सिद्ध करे औचित्य।।


जीव  कर्म  का  फूल  है, नित  देता है   गंध।

कठपुतली-सा नाचता,कभी न हो   निर्बंध।।

कठपुतली   संकेत   पा, नाच रही   पुरजोर।

अपना तो कुछ भी नहीं,फिर भी भरे  हिलोर।।


जीवन  जाग्रत  खेल है,जब तक घट  में  प्राण।

क्षण-क्षण माँगे छाँव को,तदपि नित्य म्रियमाण।।

सबको जीवन चाहिए, सबको ही  अति  मोह।

करता  कर्म  अकर्म  भी,अन्य जीव से     द्रोह।।


जीव  खिलौना में मगन,खेल रहा  बहु  खेल।

कनक  कामिनी  कामना,की चलती नित रेल।।

बनें  किसी  के  हाथ का,नहीं  खिलौना  मीत।

चलना  स्वयं   विवेक   से,सदा मिलेगी   जीत।।

                  एक में सब

जगत-मंच  पर खेलता,कठपुतली  का खेल।

नित्य खिलौना खोजता, जीवन  बनता  रेल।।


शुभमस्तु !


13.11.2024●3.45आरोहणम् मार्तण्डस्य।

                    ●●●

हेलमेल से ये मानव [ गीत ]

 512/2024

           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


युग बीते

अब भी हैं रीते

हेलमेल से ये मानव।


तरुवर खग से

क्या हम सीखे

लड़ना रक्त बहाना ही,

हो आलिंगनक्रुद्ध

परस्पर 

सबका हृदय दुखाना ही,

वर्णभेद में 

खोया सोया

बना हुआ है  तू दानव।


प्राण प्राण में

चाहत जागे

सबको गले लगाने की,

घृणा द्वेष 

अघ रहें न कोई

सोचें जगत सजाने की,

जिधर सुनें

बस यही सुनें हम

गूँज रहा कोलाहल रव।


देखो

 है इनमें भी जीवन

तरह-तरह की नभचारी,

श्वेत श्यामला

अरुण चोंच की

सबकी सब हैं आभारी,

बहुत भा गया

भाव 'शुभम्' को

करती हैं कलरव नव- नव।


शुभमस्तु !

12.11.2024●4.00आ०मा०

                      ●●●

नारंगी के रंग की ! [दोहा गीतिका ]

 511/2024

         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नारंगी   के    रंग    की, एक  अलग   ही  शान।

भिन्न-भिन्न  हैं  फाँक  सब,मिलता नहीं निदान।।


नहीं    शुद्धता    दूध  में, धनिया मिश्रित  लीद,

लोग  मिलावटखोर   हैं,  फिर भी देश  महान।


नेताओं    की   क्या   कहें, देशभक्ति  से   दूर,

धन  की   जिंदा   कोठरी, नेता  की पहचान।


आडंबर   भरपूर    हैं ,   धर्म   ढोंग   में    चूर,

जिसकी भी दुम उठ गई,कटें नाक सँग कान।


परदे     के      पीछे     बड़े,  करते पापाचार,

पहन   बगबगे   सूट वे, मूँछ रहे निज   तान।


कथनी  -  करनी  में  बड़े,जिनके बड़े   विभेद,

उपदेशक  'विख्यात'  वे, पढ़ें साम का   गान।


'शुभम्'  नहीं  लक्षण  भले,पतित रसातल देश,

' विश्वगुरू ' इस  देश  का,  कैसा  ये उनमान।


शुभमस्तु !


11.11.2024●8.00आ०मा०

                   ●●●

कैसा ये उनमान! [सजल ]

 510/2024

               

समांत      :आन

पदांत       :अपदांत

मात्राभार   :24

मात्रा पतन :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नारंगी   के    रंग    की, एक  अलग   ही  शान।

भिन्न-भिन्न  हैं  फाँक  सब,मिलता नहीं निदान।।


नहीं    शुद्धता    दूध  में, धनिया मिश्रित  लीद।

लोग  मिलावटखोर   हैं,  फिर भी देश  महान।।


नेताओं    की   क्या   कहें, देशभक्ति  से   दूर।

धन  की   जिंदा   कोठरी, नेता  की पहचान।।


आडंबर   भरपूर    हैं ,   धर्म   ढोंग   में    चूर।

जिसकी भी दुम उठ गई,कटें नाक सँग कान।।


परदे     के      पीछे     बड़े,  करते पापाचार।

पहन   बगबगे   सूट वे, मूँछ रहे निज   तान।।


कथनी  -  करनी  में  बड़े,जिनके बड़े   विभेद।

उपदेशक  'विख्यात'  वे, पढ़ें साम का   गान।।


'शुभम्'  नहीं  लक्षण  भले,पतित रसातल देश।

' विश्वगुरू ' इस  देश  का,  कैसा  ये उनमान।।


शुभमस्तु !


11.11.2024●8.00आ०मा०

                   ●●●

गुरुवार, 7 नवंबर 2024

कैसे हो सुमङ्गल [अतुकांतिका ]

 509/2024

             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कभी चाँद

कभी सूरज 

कभी तारे,

सबका अपना ही मान,

सबके प्रति

कृतज्ञता ज्ञापन 

सबका ही ध्यान।


क्षिति जल पावक

गगन और समीर,

मिट्टी पत्थर

सोना चाँदी सबकी

अपनी तकदीर,

लोहा भी ताँबा भी

गंगा यमुना सुतीर।


सबको ही पूजा

पर आदमी नहीं

आदमी के लिए आदमी,

एक दूजे के 

रक्त का प्यासा !

खड़ा है लिए हाथ में

भोथा- सा गँड़ासा !


इधर  धर्म

उधर हिंसा !

कैसा विचित्र

यह किस्सा!

शांति का संवाहक,

जान का ग्राहक।


मानवता के नाम पर

मानव ही एक दाग़,

जिधर भी दृष्टि जाए

आग ही आग !

अरे !अब तो उठ जाग।


कैसी तेरी शिक्षा

कैसी है इबादत!

सब ढोंग आडंबर

किसने दी इजाजत,

शहर भी गाँव भी

जंगल के जंगल,

कैसे हो 'शुभम्'

धरती पर सुमंगल!


शुभमस्तु !


07.11.2024●5.00प०मा०

                  ●●●

अतुकांत कविता की तरह [ अतुकांतिका ]

 508/2024

      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पति की पत्नी से

पत्नी की पति से

तुक मिली

 तो क्या मिली,

एक जाए पूरब

एक जाए पश्चिम

दोनों की

 अलग -अलग ही गली।


कितने जोड़ों की 

एक सम है 

एक ही लय है ?

गूँजता है सामवेद कहाँ

एक दूसरे से भय है।


दोनों का भूगोल अलग

कैमिस्ट्री भी,

पौध की मिट्टी अलग

हिस्ट्री भी,

कुंडलीकार ने

फिर भी मिला दिया,

अब रात दिन 

बजाओ खंजड़ी

तंबू सिला दिया।


गृहस्थी में

छंद का बंध बनाना

विवश जरूरत है,

वरना अंगूर खट्टे हैं

संपूरक हैं,

अतुकांत कविता की तरह

ऊँट और बकरी हैं,

एक छत के नीचे 

असमता में सम हैं,

तुक तो मिलती ही कब है?

अँधेरे की कृपा से

समांत एक सम हैं।


शुभमस्तु !


07.11.2024●3.45 प०मा०

                ●●●

उजालों की दुनिया [ नवगीत ]

 507/2024

             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इधर भी उधर भी

उजालों की दुनिया।


दिये हाथ में

सेत आशा के लेकर,

बहे स्वेद के कण

प्रतिदर्श देकर,

दमकती चमकती

मशालों की दुनिया।


भटकाए कोई

अटकाए कोई,

खारों में हमको

गिराए भी कोई,

लहू माँगती है

कसालों की दुनिया।


पूजे  मुझे 

आज संसार सारा,

चाहत यही है

न रहना बिचारा,

मिले बस 'शुभम्' को

दुशालों की दुनिया।


शुभमस्तु !


06.11.2024 ●10.15आ०मा०

                     ●●●

मनमानी कविता करें [ दोहा ]

 506/2024

      

[परिवार,तस्वीर,अतीत,कविता,जवान]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


            सब में एक

ब्याह  हुआ  परिवार में, उगी एक  दीवार।

नई   ब्याहुली  आ  गई,   ईंट-ईंट बीमार।।

सास-ससुर  को  मानती, नहीं  बहू परिवार।

पड़ी  खटाई   दूध में,   रिश्ते तारम - तार।।


घर-घर की तस्वीर का,बदल गया सब हाल।

आधुनिकाएँ  आ  गईं, ठोक  रही  हैं ताल।।

नारंगीवत   देश   की,   बनी     नई तस्वीर।

बाहर  से   सब  एक  सम, अंदर कई  लकीर।।


अब अतीत की   बात है, वसुधा ही  परिवार।

आँगन   में   दीवार   है,चूल्हे   जलते    चार।।

आछे  दिन  पाछे गए, उज्ज्वल  रहा  अतीत।

वर्तमान  रोता  हुआ, गया  समय वह   बीत।। 


कोई   छोटी   टाँग   है,   कोई   जैसे    बाँस।

कविता थुलथुल नाचती,कहीं शरद का काँस।।

मनमानी कविता करें, नियम धरे सब  ताक।

आज लतीफेबाज   ही,  जमा  रहे हैं   धाक।।


सीमा  पर  तैनात    हैं, सैनिक   वीर जवान ।

रक्षा  करते  देश   की,  मातृभूमि की   शान।।

वही  जवानी  धन्य   है,करे  देश हित   काम।

कहना उसे जवान क्या,प्रिय हो केवल चाम।।


                  एक में सब

कविता से परिवार की,बदलें कवि तस्वीर।

वह अतीत की बात है,थे जवान कवि  धीर।।


शुभमस्तु !


06.11.2024●12.15 आ०मा० 

                   ●●●

मंगलवार, 5 नवंबर 2024

थीं चाहतें मन में बड़ी [ गीत ]

 505/2024

        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


थी चाहतें

मन में बड़ी ये

दर्शन करे भगवान का।


मंदिर गया

जूते उतारे

और अंदर   घुस  गया,

बिंबित हो रहे

जूते युगल

मन में चुचाता रस नया,

मस्तिष्क में

जूते बसे थे

क्या करे अरमान  का?


जैसा गया

वैसा ही लौटा

क्या मिला भगवान से?

कोई चुरा ले

शूज़ महँगे

डरता रहा इंसान से,

तिलक छापा 

भी लगाया

शीश  ऊँचा  दान का।


जूते बसे

मस्तिष्क में दो

आ सकें  भगवान क्यों?

रह सकेंगे

फिर हृदय में

अलविदा  रहमान यों?

सुन 'शुभम्'

पर्याप्त होता

प्रेम-पल्लव  पान का।


शुभमस्तु !


05.11.2024●5.00प०मा०

                 ●●●

नगर फिरोज़ाबाद हमारा [ गीत ]

 504/2024

       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कहलाता    सुहाग   की नगरी

नगर    फिरोजाबाद     हमारा।


रंग-बिरंगी         बना   चूड़ियाँ,

दुनिया      भर        में     नाम।

अपनी    एक   अलग छवि देता,

उच्च       कोटि       का   काम।।

पहनें     सभी    सुहागिन  बहनें,

नभ       का      एक     सितारा।


स्वेद    सिक्त   मजदूर  रात दिन,

करते          अनथक        काम।

राधा     सीता      माता   पहनें,

साथ       श्याम      या     राम।।

गली-गली में  खन-खन बजतीं,

अतिशय         हमको    प्यारा।


देश  -   विदेशों    में   निर्यातित,

सज्जा  के     सामान      सभी।

एक  बार जो     भी   आता  है,

भूल  न  पाता  नगर      कभी।।

'शुभम्' दिशा  दक्षिण में  बहती,

यमुना   जी        की      धारा।


शुभमस्तु !


05.11.2024●9.15 आ०मा०

                  ●●●

झलक गाँव के जीवन की [ गीत ]

 503/2024

     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


झलक गाँव के

जीवन की

जीवंत हो गई।


छप्पर तले

सजे हैं बर्तन

एक मेज पर,

रोटी सेंक रही

चूल्हे पर

 पुता हुआ घर,

ननद और

भाभी ओटे पर

कहाँ खो गईं।


आँगन बीच

बिछी खटिया पर

कपड़े लादे,

बकरी बँधी

नाद पर चरती

परिजन  सादे,

लिए परात

धो रही कपड़े

व्यस्त हो गई।


चुगतीं दाने

गौरैया सब

बिखरा-बिखरा,

मस्ती का जीवन

निर्मल है

सुथरा -सुथरा,

'शुभम्' नहीं

कोई खाली 

क्या चीज हो गई।


शुभमस्तु !


04.11.2024●11.00 प०मा०

                    ●●●

सोमवार, 4 नवंबर 2024

कौन अपना या बिराना! [ नवगीत ]

 502/2024

         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आज तक कब जान पाया!

कौन   अपना   या  बिराना!


प्यार  में जिसके  जिया हूँ,

स्तन्य-सा उसका  पिया हूँ,

लोग   कुछ  ऐसे   लुभाते,

हम  वहीं   जाकर  ठगाते,

मित्रवत  उसको  समझता,

शत्रु-सा मुझ पर बिखरता,

आदमी  का क्या ठिकाना,

कौन अपना   या  बिराना।


आँधियाँ     झंझा   सुनामी,

खरब   में    खेलें   छदामी,

पेंडुलम   बन  लटकता  हूँ,

राह में   नित   भटकता  हूँ,

शांति  का  जंगल रुपहला,

आकृष्ट करता छद्म दहला,

हाथ  इंसाँ    के    बिकाना,

कौन  अपना  या   बिराना।


शब्द   हैं    बस   एकता  के,

नाम     देवी  -    देवता   के,

बहुरूपियों   के    रंग   छाए,

रूप    उनके     झिलमिलाए,

चाहतें  जन   की    बड़ी    हैं,

सामने   अनगिन   खड़ी    हैं,

चाहते  दिल     को  छिपाना,

कौन  अपना  या    बिराना।


शुभमस्तु !


04.11.2024● 3.30प०मा०

                   ●●●

अनुभाव तुम्हारा छिपा हुआ [ नवगीत ]

 501/2024

   

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


'सदभावों' के

पीछे-पीछे

अनुभाव तुम्हारा छिपा हुआ।


धन की चाहत ने

दुनिया में

मानव को कितना बदला है,

कहता जो

कलमकार खुद को

उसका मानस भी गदला है,

अर्जन कुछ

धन का हो जाए

धनदेवी की मिल जाय दुआ।


बनिये हैं

कहें नहीं कविवर

केवल धंधे की सोच बड़ी,

कविता बेचें

रख ठेले पर

कवियों के दर पर हुई खड़ी,

कवि आँख फोड़ता

लिख- लिख कर

खाताधारक को मालपुआ।


ये छन्दहीन 

लँगड़ी कविता

छोटी लंबी जिसकी टाँगें,

हम गद्य कहें

या लेख जिसे

जो अर्थ भाव अपना माँगें,

बतलाओ

'शुभम्' सत्य  इतना

कैसा ये अंधा काव्य-कुआ।


शुभमस्तु !


04.11.2024●1.15प०मा०

                  ●●●

कोई स्वयं महान कहे [ नवगीत ]

 500/2024

        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नाम बड़े हैं

दर्शन छोटे

कोई स्वयं महान कहे ।


कोई पंत

निराला कोई

कोई तुलसी सूर कबीर,

कालिदास 

कोई कहलाता

पीट रहे वे थकी लकीर,

मैं महान कवि

शायर मैं ही

मैं कविता की शान कहे।


सिर की मणि

कवि गौरव कहता

छायाप्रति में मुस्काता,

पगड़ी पीली

शीश सुहाती

नई चाल में इठलाता,

मैं खोजी हूँ

नए छंद का

अपना अनुसंधान कहे।


क्रय विक्रय का

खेल चला है

पुरस्कार  सम्मान का,

उतनी मीठी

खीर बनेगी

जितना गुड़ में दान का,

'शुभम्' बाढ़

कवियों की आई

स्वयं काव्य की खान कहे।


शुभमस्तु !


04.11.2024●12.30प०मा०

                ●●●

जाग्रत जीवन -ज्योति कर [ दोहा गीतिका ]

 499/2024

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाग्रत जीवन-ज्योति कर,जग में करें धमाल।

जगती के  जीवन  बनें, नहीं किसी को  साल।।


सब  जाते  निज  राह में, एकांतिक पथ   एक,

समाधान  निज खोजते,द्रुम की नव्य  प्रवाल।


सीमा  पर   तैनात  हैं, सैनिक  लाख   हजार,

बने  हुए   हैं   देश  की , सुदृढ़  रक्षक   ढाल।


करते   हैं  कुछ  भी  नहीं,उपदेशक बन  लोग,

रात -दिवस   बजते  रहें,उनके केवल   गाल।


बगुला   बैठा   मौन  धर,पहने  वसन   सफेद,

टाँग  उठाई  शून्य   में,  मैं   ही   श्रेष्ठ   मराल।


शांति  नहीं   संतोष  भी,  जीवन   है   तूफान,

परिजन  उकताए   हुए, नहीं  एक सम  ताल।


'शुभम्'  बनाना  जिंदगी, सबका अपने  हाथ,

जागा  नहीं  विवेक  तो,  बिगड़े  तेरी   चाल।


शुभमस्तु !

04.11.2024●4.30आ०मा०

                     ●●●

जगती के जीवन बनें [ सजल ]

 498/2024

          


समांत      : आल

पदांत       :अपदांत

मात्राभार   :24.

मात्रा पतन: शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाग्रत जीवन-ज्योति कर,जग में करें धमाल।

जगती के  जीवन  बनें, नहीं किसी को  साल।।


सब  जाते  निज  राह में, एकांतिक पथ   एक।

समाधान  निज खोजते,द्रुम की नव्य  प्रवाल।।


सीमा  पर   तैनात  हैं, सैनिक  लाख   हजार।

बने  हुए   हैं   देश  की , सुदृढ़  रक्षक   ढाल।।


करते   हैं  कुछ  भी  नहीं,उपदेशक बन  लोग।

रात -दिवस   बजते  रहें,उनके केवल   गाल।।


बगुला   बैठा   मौन  धर,पहने  वसन   सफेद।

टाँग  उठाई  शून्य   में,  मैं   ही   श्रेष्ठ   मराल।।


शांति  नहीं   संतोष  भी,  जीवन   है   तूफान।

परिजन  उकताए   हुए, नहीं  एक सम  ताल।।


'शुभम्'  बनाना  जिंदगी, सबका अपने  हाथ।

जागा  नहीं  विवेक  तो,  बिगड़े  तेरी   चाल।।


शुभमस्तु !

04.11.2024●4.30आ०मा०

                     ●●●

रविवार, 3 नवंबर 2024

क्या कीजिए! [ नवगीत ]

 497/2024

              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जल गई रस्सी

न ऐंठन जा सकी

क्या कीजिए।


उम्र बीती

पार अस्सी कर लिया 

बुझता दिया है,

मोम होना था

जिसे पर हो सका क्या?

पत्थर का हिया है !

खाल लटकी

देह की

कुछ भीजिए।


दिखता नहीं है

आदमी हंकार में

बंद चमड़े के  नयन तेरे गले ,

खोल तो ले

ज्ञान का वह चक्षु भकुए

ढोर भी हैं आज तो तुझसे भले।

सत्य सुनकर

कान से क्यों रोष में

क्यों खीजिए?


दूसरों के ठौर पर

बैठा स्वयं को

कैसा लगेगा सोच तो ले आज !

ऊँट जाए जब

कभी पर्वत तले

गिर पड़ेगा भूमि पर सिर ताज,

सुन 'शुभम्' के

हाथ से हो ले  अलंकृत

यह लीजिए।


शुभमस्तु !


03.11.2024●12.15प०मा०

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सिद्ध करने में लगा हूँ [ गीत ]

 496/2024

          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सिद्ध करने में

लगा हूँ मैं बुढापा।


बालपन यों ही

नहीं मैंने बिताया,

खेल क्रीड़ा में

नहीं यों ही गँवाया,

भूल कर भूला नहीं

मैं   व्यर्थ  आपा।


बढ़ता प्रबुद्धि की

दिशा में रात-दिन मैं,

बीज जो बढ़ने लगा

था  विपल छिन में,

हुआ बचपन 

अग्नि में ज्यों तपा तापा।


शुद्ध यौवन को करूँ

चिंता  बड़ी थी,

शृंग - सी  दीवार 

सत  पथ में खड़ी थी,

अंततः प्राप्तव्य का

पथ  डगर   नापा।


वृद्धता को

सिद्ध करने में लगा हूँ,

मैं सभी का बंधु हूँ

सबका सगा  हूँ,

नाम है मेरा 'शुभम्'

शुभता ही   जापा।


शुभमस्तु !


02.11.2024● 9.45आ०मा०

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जय गोवर्द्धन धाम [अतुकांतिका]

 495/2024

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रास रचैया

यशुमति छैया

राधा के घनश्याम

ब्रजरक्षक

बलदाऊ भैया

शत- शत सहस प्रणाम।


छिंगुली अँगुली

पर धारण कर

गिरि को उठा लिया,

इन्द्रकोप से

की ब्रज रक्षा

जय गोवर्द्धन धाम।


क्या राधा

क्या गोप गोपियाँ

क्या बाबा नन्द महान,

गौएँ रँभा रहीं हैं वन में

मुरली की सुन तान।


मित्र मनसुखा

सखा सुदामा

श्रीदामा का साथ,

ललिता नंदा

सखी अंगना 

विनत अहर्निश माथ।


हे योगेश्वर

नीति प्रणेता

बहु प्रतिभा के स्वामी,

सोलह सहस

आठ पटरानी

कहे न कोई कामी,

धन्य 'शुभम्'

नतमस्तक युगवर

हरि अवतारी श्याम।


शुभमस्तु !


02.11.2024●9.00आ०मा०

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शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

एक दिया उनकी सेवा में [ गीत ]

 494/2024

      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक दिया

उनकी सेवा में

सब जन  ज्योति जलाना।


पत्नी बालक

मात - पिता को

छोड़े हुए खड़े हैं।

नेह भाव

उनके भी मन में

घर को छोड़ पड़े हैं।।

घर से अधिक

देश ही प्यारा

उनको शीश झुकाना।।


माँ कहती

पापा आएँगे

लेकर  खेल खिलौने।

कपड़े खील 

मिठाई घी की

ज्योति जले हर कोने।।

किंतु उन्हें

छुट्टी न मिली है

फिर कैसा  घर आना?


सीमा पर 

तैनात वीर को

कवि यह शीश नवाता।

राष्ट्र धर्म है

पहले जिसको

कैसे  दीप  जलाता !!

'शुभम्' वही 

भगवान हमारे

शुभचिंतक निज जाना।


शुभमस्तु !


01.11.2024●4.45प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...