गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

रूप [ सोरठा ]

 374/2026


                   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 देख न सका चरित्र, ब्याह हुआ बच्चे हुए।

 देखा   छायाचित्र,  रूप -रंग   का बाहरी।।

पाता   छद्म   अनेक,रूप देखकर आदमी।

 अंतर बसा विवेक,यदि हो संभव झाँकिए।।


छिपते     चोर- लबार,  भोले-भाले  रूप में।

ठगते   शब्द    उचार ,  भद्र जनों को छद्म से।।

फैलाए निज   जाल,रूप-  मोहिनी  नारि की।

व्यापक करे कमाल,पुरुषों   को  ठगती फिरे।।


 रूप   साधु का   धार,रावण ने सीता हरी।

दिया   राम   ने   मार,हुआ बुरा परिणाम ये।।

छलती    विश्वामित्र,   रूप - जाल में मेनका।

 सूँघ   देह  का इत्र,भंग हुआ तप निमिष में।।


 मन  कटु  विष आगार,लगे अप्सरा देह से।

 शून्य मृदुलता प्यार,छले रूप  से कामिनी।।

हुआ कलंकित चाँद,ठगी अहल्या रूप से।

घुसा अँधेरा फाँद,गौतम ऋषि का वेश धर।।


 करते ठगी अनेक,पुलिस वेश धर चोर भी।

मिले  ठगी  की टेक,छली रूप के छद्म से।।

यही वास्तविक रूप,देख रूप समझें नहीं।

गिरें न    छद्मी कूप,   पहले   मन चिंतन करें।।


चटुल जटिल जंजाल, 'शुभम्'  रूप के जाल का।

करते  नहीं   सवाल,  निर्मल   मन  फँसते   वहाँ।।


शुभमस्तु,


29.10.2026◆3.00आ०मा०

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