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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
ब्याह हुआ बच्चे हुए, देख न सका चरित्र।
रूप -रंग का बाहरी, देखा छायाचित्र।।
रूप देखकर आदमी,पाता छद्म अनेक।
यदि हो संभव झाँकिए, अंतर बसा विवेक।।
भोले-भाले रूप में, छिपते चोर- लबार।
भद्र जनों को छद्म से,ठगते शब्द उचार ।।
रूप - मोहिनी नारि की,फैलाए निज जाल।
पुरुषों को ठगती फिरे,व्यापक करे कमाल।।
रावण ने सीता हरी, रूप साधु का धार।
हुआ बुरा परिणाम ये,दिया राम ने मार।।
रूप- जाल में मेनका, छलती विश्वामित्र।
भंग हुआ तप निमिष में, सूँघ देह का इत्र।।
लगे अप्सरा देह से, मन कटु विष आगार।
छले रूप से कामिनी, शून्य मृदुलता प्यार।।
ठगी अहल्या रूप से, हुआ कलंकित चाँद।
गौतम ऋषि का वेश धर,घुसा अँधेरा फाँद।।
पुलिस वेश धर चोर भी, करते ठगी अनेक।
छली रूप के छद्म से,मिले ठगी की टेक।।
देख रूप समझें नहीं,यही वास्तविक रूप।
पहले मन चिंतन करें,गिरें न छद्मी कूप।।
'शुभम्' रूप के जाल का,चटुल जटिल जंजाल।
निर्मल मन फँसते वहाँ,करते नहीं सवाल।।
शुभमस्तु,
29.10.2026◆3.00आ०मा०
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