409/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
हो गया है
श्रीकलेश
कुकृतयुग का,
जो हो जाए
कम ही है।
संबंधों में
अमन्द दुर्गंध ,
कविता ऐसी
कि बचा नहीं छंद,
बंध निर्बंध।
कुछ भी कह दो
वही कविता है,
करेगा भी क्या
वहाँ जाकर
सविता है ?
यहाँ वहॉं
बस भीड़ ही भीड़
टूट गई
रिश्तों की रीढ़
हाथों हाथ
निवाला छिनता है।
चुपचाप
जिए जा रहा हूँ,
जहर को
सुधा सम
पिए जा रहा हूँ,
हवा में उड़ रहा
एक तिनका है ।
शुभमस्तु !
07.08.2025●12.45प०मा०
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