गुरुवार, 18 सितंबर 2025

संतान [ कुण्डलिया ]

 568/2025

    

                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करते  विनती  ईश  से,  मिले  शुभद  संतान।

वंश   वृद्धि    होती   रहे,  देना  प्रभु वरदान।।

देना   प्रभु   वरदान,ख्याति दुनिया में   छाए।

कुल का हो शुभ नाम, पिता का मान  बढ़ाए।।

'शुभम्'  जननि  का  दूध, लजाने से वे   डरते।

संतति  रहे    प्रबुद्ध, वंदना   प्रभु  से   करते।।


                         -2-

जैसा   जिसका  कर्म  हो,फल उसका  संतान।

मात-पिता    के    मर्म  से, उपजे पुत्र महान।।

उपजे     पुत्र     महान,    सुताएँ   रमा दुलारी।

खेलें   आँगन   बीच, भरें नित ही किलकारी।।

'शुभम्' न करना  काम,कभी कुछ ऐसा-वैसा।

फले   आम से   आम,  मधुर रसपूरित जैसा।।


                         -3-

चाहत    शुभ  संतान  की, देना  नहीं कपूत।

सूरज - सा  जगवंद्य  हो,यद्यपि एक प्रभूत।।

यद्यपि एक   प्रभूत, ज्योति जग में चमकाए।

मात -पिता कुल  नाम, ध्वजा ऊँची फहराए।।

'शुभम्'  पिता  का मान,सदा ही देता  राहत।

राम  भरत  या  श्याम,तभी पूरित हो  चाहत।।


                         -4-

मानव   या  खग  ढोर  सब, जन्माते संतान।

हो गुणज्ञ  यह  तत्त्व  की,ऊँची बात महान।।

ऊँची   बात   महान, न   संख्या जैसे मछली।

चन्द्र  सूर्य - सा  मान,नहीं मेघों की बिजली।।

'शुभम्'   करे  कल्याण,वंश का बने न दानव।

संतति   शुभद  प्रमाण, सदा ही रहती मानव।।


                            -5-

माता      को  जो   पूजती,  श्रेष्ठ वही  संतान।

आजीवन  निज  पितृ का,करे नहीं अपमान।।

करे   नहीं   अपमान,  वंश   में  नाम   कमाए।

खोले  प्रगति    वितान, समय को नहीं  गँवाए।।

'शुभम्' वही  है   धन्य,पिता संतति जो   पाता।

जननी     वही   अनन्य,पूज्य कहलाए    माता।।


शुभमस्तु !


18.09.2025●5.30 प०मा०

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