गुरुवार, 7 अगस्त 2025

त्यौहार [ कुण्डलिया ]

 412/2025

     

               


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

जीवन  में  त्यौहार  का, अपना अहं महत्त्व । 

ज्यों  वाहन  में तैल  का, संचारित है  तत्त्व।।

संचारित   है  तत्त्व,   वेग   से चलती  गाड़ी ।

दौड़े  सरपट   तेज, राह  में   रहे   न  ठाड़ी।।

'शुभम्' फ़टी हो जेब,शीघ्र ही सिलते सीवन।

वैसे   हैं  त्यौहार,  सरस  करते  नर जीवन।।


                         -2-

रक्षाबंधन   आ  गया,   भ्रात-भगिनि  त्यौहार।

दर्शन   सोदर  नेह  का, आपस  का व्यौहार।।

आपस  का  व्यौहार, बंधु भगिनी को  लाता।

रक्षा    का   नव  सूत्र,  कलाई  में  बंधवाता।।

'शुभम्' सनातन रीति, प्रीति का शोभित चंदन।

भारत   की   उर-तीत,  आ   गया रक्षाबंधन।।


                         -3-                        

सावन  में  त्यौहार   हैं, एक  नहीं शुचि  पाँच।

हैं    हरियाली   तीज सँग,  नागपंचमी   साँच।

नागपंचमी          साँच,     नेहमय रक्षाबंधन।

पंद्रह   आठ   महान, करें  प्रेमिल अभिनंदन।।

'शुभम्' कृष्ण हरि जन्म, इसी में है मनभावन।

ऋतुरानी   बरसात, मास  लाया शुभ  सावन।।


                         -4-

मानव  सभ्य  समाज   में,  रंग बड़े विपरीत।

भ्रात -भगिनि   त्यौहार  से,लेते हैं उर जीत।

लेते     हैं   उर   जीत,  नहीं   पूजें परनारी।

करते   बहु  दुष्कर्म, चलाते  तन पर  आरी।।

'शुभम्' विडंबन काल,मनुज क्यों ऐसा दानव।

कहता हम  हैं  सभ्य,हीन क्यों इतना मानव।।


                         -5-

आओ   हम  त्यौहार  से,  ले  लें इतनी  सीख।

नहीं   ढोर  खग से  पड़े,  हमें माँगनी   भीख।।

हमें  माँगनी  भीख, सत्त्व गुण हम सब  धारें।

जमा तमस  का  कीट,उसे  मन से धिक्कारें।।

'शुभम्'  नेह   के गीत,परस्पर मिलकर गाओ।

अच्छाबन्धन   भव्य,मनाएँ  मिलकर  आओ।।


शुभमस्तु !


07.08.2025●9.00प०मा०

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