शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

महिमा [ कुण्डलिया ]

 450/2025


                


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

महिमा    होती    कर्म   की, करे कर्म जो   व्यक्ति।

ज्योति  न  छिपती भानु की,प्रसरित जग में शक्ति।।

प्रसरित  जग  में शक्ति, तमस मिट जाए    सारा।

रहें      न   शेष   उलूक, न  जुगनू चमके    तारा।।

'शुभम्'   सिद्धियाँ  आठ, मिलेंगी अणिमा गरिमा।

मिले    सभी   का   साथ, बढ़ेगी जग  में महिमा।।


                         -2-

महिमा      भारतवर्ष    की, फैली  है  चहुँ   ओर।

गुरु   है   सारे   विश्व  का,  सुखद सुहाना  भोर।।

सुखद   सुहाना  भोर, कनक की चिड़िया  जैसा।

समझ    नहीं   कमजोर, नहीं कुछ ऐसा    वैसा।।

'शुभम्' राम - आदर्श, श्याम की श्यामल प्रतिमा।

बढ़ा    रही   उत्कर्ष, देश   की उज्ज्वल  महिमा।।


                           -3-

महिमा   कम  करना नहीं, मात-पिता  की  लेश।

धर्म  कर्म  में    श्रेष्ठ    हो, करना  ज्ञान   निवेश।।

करना   ज्ञान  निवेश,  उच्च  शिक्षा कर   धारण।

पाप  नहीं   हों  शेष,  करें  अघ ओघ   निवारण।।

'शुभम्' उच्च रख नाक,सबल संतति की तनिमा।

बना   रहे   विश्वास, अमर  माँ पितु की महिमा।।


                         -4-

महिमा    पाँचों  तत्त्व  की, जगती  में   विख्यात।

शुल्क   बिना  मिलते  सभी,अनल वायु  हे तात।।

अनल वायु  हे  तात, धरणि  जल  ये  नभ नीला।

करें     नहीं   बरबाद,  आप  या   गेह   क़बीला।।

'शुभम्'   सदा   उपयोग,घटे  क्यों इनकी   गरिमा।

सकल   सृष्टि  का  मूल, पंच तत्त्वों की  महिमा।।


                         -5-

महिमा   शिक्षा  ज्ञान  की, सदा  रही  अव्यक्त।

जिसने  जाना  प्रगति का, ये सोपान   सशक्त।।

ये      सोपान   सशक्त,  बने  वे  महा    धुरंधर।

पाया    आसन    उच्च,  शोभते  बनें     पुरंदर।।

'शुभम्' न  करना  नष्ट, बनाए रखना     गरिमा।

शिक्षा   करे  विकास,  बढ़ाए जन की   महिमा।।


शुभमस्तु !


21.08.2025 ● 8.45प०मा०

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