शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

विचलित [ कुंडलिया ]

 371/2025

      

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करना मत विचलित कभी,मन को धरना धीर।

कहलाता    है  आँधियाँ, चलता  तेज  समीर।।

चलता   तेज   समीर, लुप्त  प्रियता हो  जाती।

क्षुब्ध   बने  सरि  तीर,  सौम्यता  नष्ट  कराती।।

'शुभम्'  धैर्य   की  धार,सदा ही मन  में  भरना।

विचलित मत हो लेश,सोचकर कारज  करना।।


                        -2-

अपना   सुंदर  पथ  कभी, नहीं छोड़ना   मित्र।

उर  विचलित  करना नहीं,रखना उच्च  चरित्र।।

रखना उच्च चरित्र,पतित मत तन- मन करना।

बहा   सुगंधित   इत्र,  सदा खुशबू ही  भरना।।

'शुभम्'  मनुज  की देह,क्षीण होती ज्यों सपना।

बना  प्रेम  का  गेह, नहीं कुछ जग में  अपना।।


                           -3-

जपना  माला   प्रेम  की, सोच जगत- कल्याण।

विचलित मन करना नहीं,यथाशक्य कर  त्राण।।

यथाशक्य  कर  त्राण, धर्म से विमुख  न  होना।

करें    न  ऐसा   काम, बाद  में  पड़ता   रोना।।

'शुभम्'   कमाएँ   नाम, आग में यद्यपि   तपना।

करना  पर  उपकार,  प्रेम  की माला    जपना।।


                         -4-

मानव योनि अमूल्य  है, मत विचलित कर पाथ।

मन   है  एकल  सारथी,  दस  घोड़ों का   साथ।।

दस   घोड़ों   का   साथ,   बाग को थामे   रखना।

 चले  न  पंथ  कुपंथ, स्वाद  मत सबके चखना।।

लेकर    कभी   अभक्ष्य,  उदर में भरता   दानव।

'शुभम्'   बना   निज लक्ष्य,बने रहना ही  मानव।।


                          -5-

वन   में  घर  में  कुंज  में, या  कानन  के   बीच।

विचलित मन करना नहीं,कमल खिलें या कीच।।

कमल  खिलें  या  कीच, मोहिनी  हो   मधुबाला।

वृथा  मोह    मधु प्रीत,  बड़ा है धोखा   आला।।

'शुभम्' न पथ  को भूल, छद्मता है कन - कन में।

विचलित मत कर मीत,सुदृढ़ता रख घर वन में।। 


शुभमस्तु !


25.07.2025●8.45आ०मा०

                 ●●●

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...