सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

दलहनों के खेत में आलू [ नवगीत ]

 645/2025


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दलहनों के

खेत में

आलू खड़ा है।


खिलखिलाती

पीत सरसों

अब नहीं है

झूमते गोधूम

मकई

भी कहीं हैं?

प्लेट में

भल्ला सजा

ना दधिबड़ा है।


गनगनाती

गाजरें 

मूली न शलजम

नाचते

वे चणक

या मटरें

न हरदम

जिधर देखो

आलुओं का

ध्वज गड़ा है।


नाचती 

अरहर  न रहरह

खेत में अब

बाजरे की

कलगियाँ

करतीं न करतब

सघन 

छाई धुंध में

आलू  पड़ा है।


शुभमस्तु !


26.10.2025●2.45प०मा०

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...