645/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दलहनों के
खेत में
आलू खड़ा है।
खिलखिलाती
पीत सरसों
अब नहीं है
झूमते गोधूम
मकई
भी कहीं हैं?
प्लेट में
भल्ला सजा
ना दधिबड़ा है।
गनगनाती
गाजरें
मूली न शलजम
नाचते
वे चणक
या मटरें
न हरदम
जिधर देखो
आलुओं का
ध्वज गड़ा है।
नाचती
अरहर न रहरह
खेत में अब
बाजरे की
कलगियाँ
करतीं न करतब
सघन
छाई धुंध में
आलू पड़ा है।
शुभमस्तु !
26.10.2025●2.45प०मा०
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