बुधवार, 31 दिसंबर 2025

चौदहवीं के चाँद-सी [ दोहा ]

 794/2025


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चौदहवीं   के   चाँद-सी, चौदह कृतियाँ  देख।

'शुभम्'  हृदय हर्षित बड़ा,काव्य रूप संलेख।।

'शुभम्  शब्दरस'  रंजनी ,'शुभम् सवैया' ग्रंथ।

कुंडलिया  के  कुंज   में, नवगीतों   का पंथ।।


रोचक   'दोहा   भारती' ,  संग 'गीतिकानंद'। 

बालगीत     रचनावली,  गाती   गीत अमंद।।

'शुभम्' कहे साँची सदा,व्यंग्य चलाकर तेज।

पर  मुझको  रुकना नहीं,बिछा गुदगुदी सेज।।


शहर गया जब गाँव को, चहका 'श्वान पुराण'।

लोकतंत्र   झुरमुट  छिपा,बचा स्वयं के प्राण।।

'सभी  सुखी हों' कामना,करता कवि अतुकांत।

'सर्वे भवंतु सुखिनः'   कहे,  धरे हृदय  में शांत।।


दोहा     कुंडलिया  सजी,चमके  व्यंग्य सुधार।

काव्य लिखे  अतुकांत  भी, उर में भाव उदार।।

श्वान  व्यथाएँ  जानकर, कवि उर गया पसीज।

गीत   लिखे  नवगीत  भी,देखी  चौथ न तीज।।


चौपाई     की    चाँदनी,  बालपने   के  गीत।

पढ़ -पढ़ बालक  गा   रहे,बने  काव्य के मीत।।

बहुल विधा वाणी सजी, माँ का कृपा विधान।

वरना क्या  सामर्थ्य थी, 'शुभम्'  करे गुणगान।।


दो   हजार  पच्चीस का,शुभ दिन है बुधवार।

कल   होगा  छब्बीस  का,गुरुवर का उपहार।।


शुभमस्तु !


31.12.2025● 10.15आ०मा०

                   ●●●

नाम [ व्यंग्य ]

 793/2025 


 ©व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 'नाम' बड़े काम का है।नाम न हो तो पहचान कैसे हो!वह नाम ही है जो दुनिया में नाच नचाए फिरता है। व्यक्ति या वस्तु के बाद वह नाम ही है,जो बचता है। कुछ लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है। मान्यवर! नाम में तो बहुत कुछ रखा है, वह नाम ही तो है जिसके लिए लोग मर मिटते हैं। नाम के लिए तो वे न जाने क्या-क्या करते हैं! राम के नाम से पापी भी तरते हैं।अंत काल में मुँह से राम का नाम आ जाए इसके लिए कपड़े भी रँगते हैं। कोई कोई तो राम के नाम से बने रह जाते सिर्फ मँगते हैं।कोई राम नाम लेकर किसी का माल किसी की नारी तकते हैं। 'राम नाम जपना,पराया माल अपना ', और 'मुँह में राम बगल में छुरी' जैसी कहावतें बन गईं। 

 प्रत्येक माँ बाप अपनी संतान का नाम सोच समझकर रखते हैं। कोई कोई तो अत्यंत लाड़ में ऐसा भी नाम रखते हैं कि बड़े होने पर नामधारी को अपना नाम बताने में भी शर्म आती है। जैसे एक नाम है घमंडी लाल । श्रीमान घमंडी लाल यादव जी अपना नाम जी.एल.यादव बताया या लिखा करते थे। वे न शर्माते थे और न ही डरते थे। नाम का भी एक अर्थ होता है,जिसका बिम्ब उच्चारण कर्ता के मन पर असर करता है। यदि किसी का नाम पकौड़ी लाल रख दिया जाए तो आदमी से पहले तेल में तली हुई गर्मागर्म पकौड़ी का बिम्ब सामने प्रत्यक्ष होता है। यही कारण है कि एक से एक छाँट कर नाम रखे जाने का चलन है। 

 कहते हैं कि व्यक्ति पर उसके नाम का प्रभाव कुछ न कुछ अंश में अवश्य पड़ता है। यदि गरीबदास आजीवन गरीब रह जाए तो उसका क्या दोष ! यह तो उसके माँ बाप ही जानें कि उन्होंने क्या सोच समझकर अपने बेटे का नाम रखा। कुछ नाम बड़े ही अतिशयोक्ति पूर्ण रख दिए जाते हैं ,जैसे अमर सिंह। रख लो नाम अमर सिंह,किन्तु वह अमर तो नहीं होगा। लक्ष्मी को भीख माँगते हुए देखा गया है। गेंदा लाल में धतूरे की भी गंध नहीं है। गुलाब सिंह में कहीं कोई गुलाब तत्त्व नहीं है। तो राम सिंह में यदि रामत्व न हो तो आश्चर्य मत कीजिएगा। लखन लाल और भरत लाल अपने से बड़े राम को जमीन का एक इंच टुकड़ा भी नहीं देना चाहते और दुर्योधन की सर्वांश भूमिका का निर्वाह करते हैं।

 हमारे अतीत में ऐसे भी कुछ नाम हो चुके हैं,जिन पर कोई भी अपनी संतान का नाम नहीं रखना चाहता।जैसे रावण,कुम्भकर्ण,विभीषण, कंस, सूर्पणखा, पूतना, धृतराष्ट्र आदि। तभी तो कहा गया है कि बद अच्छा बदनाम बुरा। नाम अच्छा ही रहे। वैसे आदमी शक्ल से चाहे उलटा तवा हो ,किंतु नाम गोरे लाल ही जमता है।एक बार के लिए श्याम सिंह श्याम हो जाएँ तो कोई बात नहीं। कांति देवी क्रांति की देवी नहीं होनी चाहिए। 

 अब नए फैशन के अनुसार अत्याधुनिकता ने भी नामों के घर में पाँव पसार लिए हैं। बच्चे के गर्भ में आते ही पूर्व नामांकन हो जाता है। लड़का हुआ तो ये और लड़की हुई तो ये। यह आधुनिकों का जमाना है, कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता।ऐसे-ऐसे नाम रखे जाते हैं जिनका मतलब शब्दकोश में तो क्या गूगल बाबा और ए आई भी नहीं जानते। नाम के भाव और अर्थ के नाम पर वे भी दाँतों तले अँगुली दबा लेते हैं।कुछ लोग अपना मज़हब और धर्म छिपाने के लिए ऐसे नाम रखते हैं ,जिनसे यह पता नहीं लगता कि वह कौन है। एक व्यक्ति ने अपने लड़के का नाम प्रिंस रख लिया ,अब आप इससे उस लड़के के धर्म और मजहब का पता नहीं लगा सकते।

 जमाने ने नाम रखने के ट्रेंड को भी बदल दिया है। उकाव लुकाव सुरखाब जैसे नाम भी नामावली में शोभायमान हैं। जहाँ पहले लड़कों के नाम देवताओं और ईश्वर परक हुआ करते थे और लड़कियों के नाम देवियों और नदियों आदि के आधार पर रखे जाते थे। अब वह पिछले नहीं पिछड़ेपन की निशानी हो गए हैं। जब तक नाम लेने में जीभ लभेड़े न खा जाए ,तो वह नाम ही क्या! नामों की अनन्त कहानी है। यहाँ भाषा की बात करना बेमानी है। बोलने के लिए ईरानी तूरानी कुछ भी रखा जा सकता है। एक समय था जब पत्नियाँ अपने पति का नाम नहीं लेती थीं। ऐसी ही कुछ मान्यता थी कि पति का नाम लेने से पति की उम्र कम हो जाती है। किंतु अब ?अब क्या ? अब तो सब बदल गया है,जिस जमाने में पत्नी ही पति को काटकर ड्रम में पैक कर डालती है, उसे पति की उम्र की क्या चिंता ! कल मरे तो अभी मर जाए !उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए प्यार के नाम पर वह उसे बाबू जानू जैसे संबोधनों से बहकाती है और करती वही है,जो उसे करना होता है।अब तो पत्नी के द्वारा पति का नाम लेने का भी फैशन है।वह पुरानी बातों को दकियानूसी मानती है। उसकी दृष्टि में उससे अधिक अक्लमंद कोई नहीं। पता ही नहीं लगता कि वे पति- पत्नी हैं या पुरुष- स्त्री मित्र अथवा भाई- बहन ? नाम के नाम पर सारी अभेद्य दीवारें टूट गई हैं। किसी अन्य से बात करते समय उसके पति 'वे' हुआ करते थे ,आज वे सर्वनाम से संज्ञा बन चुके हैं। नाम की तो धज्जियाँ ही उड़ा दी गई हैं। नाम के नाम पर एक मखौल सा शेष रह गया है। नाम ही नहीं रहा तो व्यक्ति का अस्तित्व स्वतः ही प्रश्नवाचक चिह्न बन गया। 

 शुभमस्तु ! 

 30.12.2025● 1.30 प०मा० 

 ●●●

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

एक कविता ऐसी भी! [ संस्मरण ]

 792/2025 


 

 ©लेखक

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 रात के सघन अंधकार में रेलगाड़ी अपनी तीव्र गति से दौड़ी चली जा रही थी।मेरे पास के अधिकांश यात्री सो रहे थे। रात के दो बजे के बाद का समय रहा होगा। पर शुभम् के कवि मन को चैन कहाँ ?मैं सो नहीं रहा था।मेरे चेतन और अवचेतन मन दोनों ही जाग रहे थे।उस ट्रेन के उस डिब्बे में कोई बत्ती भी नहीं जल रही थी। जितना गहरा अँधेरा मेरे चारों ओर था,उतना ही उजाला मेरे अंदर से प्रस्फुटित हो रहा था।उस समय मेरे पास लिखने के लिए न प्रकाश था और न अन्य साधन ही।तभी मुझे ध्यान आया कि मेरी शर्ट की जेब में एक पैन और बैग की जेब में एक छोटी सी डायरी है,जिसे मैं यात्रा के समय सदा अपने साथ रखता हूँ।उस अँधेरे में विचारों और भावों का प्रवाह भी ट्रेन की रफ़्तार से कम तेज नहीं दौड़ रहा था। मेरे मन में कविता लिखने की सूझी। 

  यह बात उस समय की है ,जब मैं वर्ष 2006 में चौधरी चरण सिंह राजकीय महाविद्यालय छपरौली (बागपत)में हिंदी विषय का प्रोफ़ेसर था। कई बार बीच- बीच में घर परिवार की कुशलता के हाल चाल जानने के लिए ट्रेन से शिकोहाबाद से मेरठ की यात्रा करता था। यह यात्रा रात में ही होती थी,क्योंकि संगम एक्सप्रेस रात्रि में अपनी यात्रा करते हुए सुबह सात बजे मेरठ पहुँचाती थी। 

 मेरे मन में एक नया विषय उत्पन्न हुआ और उस घने अंधकार में ही डायरी के पृष्ठों पर लेखनी चलने लगी। रचना का विषय था : 'अंधकार'। रात के उस अंधकार में ,जिसमें हाथ को हाथ भी नहीं सूझ रहा था,एक कवि कविता कर रहा था। अनुमान मात्र से ही अक्षर शब्द और भाव डायरी के छोटे छोटे पृष्ठों पर साकार होते जा रहे थे। इधर गाड़ी के झटके और भावों के लटके एक नया वातावरण सृजित कर रहे थे।टेढ़े मेढ़े अक्षरों में कविता का लेखन चल रहा था।कभी अक्षर के ऊपर अक्षर लिख जाते और कभी उनमें अंतराल भी हो जाता। पर दिन के उजाले में रचना पढ़ी और समझी जा सकती थी। अँधेरे में अँधेरे पर ही कविता लिखना एक नवीन प्रयोग था,मौलिक उद्भावना थी।जिसमें छिपी हुई कुछ संभावना थी।वातावरण में परम शांति थी। कहीं कोई नहीं भ्रांति थी।गाड़ी झकोरे ले रही थी,और नई कविता भी नए रंग उकेर रही थी। कैसा ही अद्भुत समा था!,कवि अपने लेखन कर्म में रमा था। एक आध घण्टे तक बराबर लिखता रहा और मन के उजले भावों को काले अँधेरे के पन्नों पर उकेरता रहा। 

 अंधकार पर कविता करते हुए कितना समय निकल गया,कुछ भी पता न लगा।रचना पूर्ण हुई और डायरी और पैंन जेबगत हुए।गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी। अभी सुबह होने में देर थी। पर मन के किसी कोने में बड़ी संतुष्टि थी। अपने ही लेखन पर रीझे जाने की पुष्टि थी। मानो रस वर्षा की वृष्टि थी। भाग चुकी तन-मन की सुस्ती थी। यात्री सो रहे थे और कवि के भाव उसे भिगो रहे थे। 

 छपरौली वाले कमरे पर पहुँच कर निराकार के साकार ने फाइनल डायरी में यथासमय आकार लिया। अपनी रचना के लिए अंधकार का आधार लिया,इसलिए उसके लिए पुनः पुनः आभार किया। जिन क्षणों में काव्य शब्दों ने अवतार लिया, कवि ने पुनः- पुनः वाचन किया , एक उपहार लिया। आज भी जब उन सुमधुर पलों की याद आती है, अंधकार में भी भावों की बिजली कौंध - कौंध जाती है। पढ़ने वाला भी कहेगा कि ऐसा भी कभी होता है, कि कोई कवि अंधकार में सृजन के बीज बोता है। भावों और विचारों के आगमन का कोई निर्धारित क्षण नहीं होता है, कवि का मन सम्भवतः कभी नहीं सोता है।वह एक छोटे-से क्षण को भी महान बनाता है।शब्दाक्षरों से अपनी वीणा के साज सजाता है। यही तो सब माता सरस्वती का शुभ आशीष है। विघ्न विनाशक गणेश भगवान का संदेश है। 

 शुभमस्तु !

 29.12.2025●10.30 आ०मा० 

 ●●●

उषा जगी प्राची में भोली [ गीतिका ]

 791/2025





©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उषा     जगी     प्राची   में    भोली।

लगा   भाल  पर  अरुणिम   रोली।।


भानु   जगाया   उठो    चलो   अब,

जाग  उठे     खगदल    हमजोली।


चह- चह  कर   खग   चहक   रहे  हैं,

सुना - सुना   कर   मधुरिम  बोली।


गोला  लाल    उठा    जब    ऊपर,

लगा   खेलता      अंबर      होली।


कुकड़ -  कुकड़   कूँ   करते   मुर्गे,

निकल  पड़ी  बतखों  की    टोली।


उधर  गली  के उस   नुक्कड़   पर,

बालक  खेल    रहे     हैं      गोली।


'शुभम्'  सुबह  का  दृश्य    मनोहर,

जग कर्ता  ने    निधियाँ      खोली।


शुभमस्तु !


29.12.2025 ● 5.15 आ०मा०

                      ●●●

जाग उठे खगदल हमजोली [सजल ]

 790/2025



समांत          : ओली

पदांत           : अपदांत

मात्राभार       : 16

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उषा     जगी     प्राची   में    भोली।

लगा   भाल  पर  अरुणिम   रोली।।


भानु   जगाया   उठो    चलो   अब।

जाग  उठे     खगदल    हमजोली।।


चह- चह  कर    खग   चहक   रहे  हैं।

सुना - सुना   कर   मधुरिम  बोली।।


गोला  लाल    उठा    जब    ऊपर।

लगा   खेलता      अंबर      होली।।


कुकड़ -  कुकड़   कूँ    करते   मुर्गे।

निकल  पड़ी  बतखों  की    टोली।।


उधर  गली  के उस   नुक्कड़   पर।

बालक  खेल    रहे     हैं      गोली।।


'शुभम्'  सुबह  का  दृश्य    मनोहर।

जग कर्ता  ने    निधियाँ      खोली।।


शुभमस्तु !


29.12.2025 ● 5.15 आ०मा०

                      ●●●

जीवन के साथ भी और उसके बाद भी [ आलेख ]

 789/2025 


 

 ©लेखक 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 दुनिया शुभ- लाभ के चक्कर में उमड़-घुमड़ रही है। सब यही चाहते हैं कि उसको लाभ ही लाभ हो।वह लाभ की सुलभता चाहे जैसे भी हो,पर हो अवश्य। इसी एक मूल सूत्र पर सभी चकरघिन्नी बने हुए हैं। अपना शुभत्व पाने के चक्कर में स्त्री -पुरुषों ने अपनी नैतिकता और चरित्र को भी तिलांजलि दे दी है।स्वलाभत्व के लिए चाहे जितना भी नीचे गिरना पड़े अथवा चाहे जितना ऊपर उठना पड़े;उसे कोई आपत्ति नहीं , कोई शंका नहीं। वह डंके की चोट पर मात्र अपना ही लाभ चाहता/चाहती है। इसके लिए भले ही किसी को राह चलते हुए गिराना पड़े,उसमें टंगड़ी मारनी पड़े, उसे कोई आपत्ति नहीं;बस उसका अपना लाभ होना चाहिए और प्रत्येक स्तर पर होना चाहिए। जब कि वह भी जानता है कि यह लाभ उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज है। 'हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ।'जब सब कुछ विधि के हाथों का किया कराया फल है ,तो निश्चिंत होकर क्यों नहीं रहता। प्रत्येक आदमी और स्त्री अपने उसी लाभ के हितार्थ सही गलत करने में नहीं चूकता। इस लाभत्व प्राप्ति के झूठ,चोरी,गबन, मिलावट, घटतोली,कमनापी,बेईमानी,छल, छद्म,सत्यासत्य : सभी कुछ का आश्रय लेता है।अपने चरित्र से नीचे पतित भी होता है। 

 जीवन के साथ और जीवन के बाद भी मन और आत्मा के जिस आंतरिक भाव की मानव मात्र को सबसे अधिक और सबसे वृहद मात्रा में आवश्यकता है वह लाभ नहीं। हर आदमी अपने चरित्र और कर्म से बनिया बन गया है। बस शुभ लाभ ही उसे चाहिए,चाहे उसे सारी रात बिस्तर में पड़े -पड़े करवटें बदलते हुए ही क्यों न काटनी पड़ें। इसके लिए वह सहर्ष तैयार है,किन्तु मानव जीवन का वह भाव जो उसके लिए सदैव अनिवार्य है;उसके विषय में सोचने के लिए उसको अवकाश ही नहीं। वह आंतरिक भाव एक ऐसी स्थिति है, जिसकी चाहना प्रत्येक व्यक्ति दूसरे/दूसरों के लिए तो करता है,किन्तु अपने लिए नहीं। इसीलिए किसी के इस नश्वर शरीर को छोड़ने के बाद यही कामना की जाती है कि परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करे। आदमी यह भी अच्छी तरह से जानता है कि जिस तरह से उसे अब तक शांति नहीं मिली,उसे भी कहाँ मिली होगी ; वह भी उसी की तरह तीन दो पाँच करते हुए नौ दो ग्यारह हो लिया। जब वही शांत नहीं ,तो जाने वाला भी क्यों शांति को प्राप्त कर पाया होगा ! 

 यह शांति ही जीवन का वह आंतरिक आत्मिक भाव है,जिसकी उसे परम आवश्यकता है ,परम आवश्यकता थी और रहेगी भी। जब कहीं घर या बाहर झगड़ा या विवाद हो जाता है तो सब लोग उन्हें शांत रहने और झगड़े को शांत करने का सुझाव देते हैं। कोई यह नहीं कहता अथवा चाहता कि लड़ते रहो। यह शांति ही अंतिम तत्त्व है,जिसकी परम आवश्यकता है।इसलिए ॐ शांति कहकर या लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। अब यह अलग बात है कि जाने वाले को यह शांति मिलती या नहीं, यह तो उसके विगत जीवन के कृत कर्मों की फलश्रुति पर ही निर्भर करता है ।इसके मूल में यह भाव भी छिपा हुआ है कि हमारी तरह उसे जीवन भर शांति नहीं मिली,हे भगवान अब तो उसे शांति मिल जाए। यह केवल एक कामना मात्र है। यदि हमारे चाहने से ही सबको शांति मिल जाए तो रूस और यूक्रेन कब के शांति लाभ ले लेते ! उन्हें लड़ना है ,तो वे लड़ेंगे ही। आप और हम कितना ही चाह लें ,पर वह हमारी वह चाहना कितनी कारगर होगी ,कहा नहीं जा सकता। हमारी चाहना में यदि इतना ही वजन होता तो दुनिया के अंर्तराष्ट्रीय मसले हल करने के लिए हमें ही बुलाया जाता और कहा जाता कि चलो भाई थोड़ा चाह लो कि लड़ाई शांत हो जाए। पर हमारे चाहने से कभी कुछ हुआ है और न होने वाला है। चाह लो, चाहने से भला किसने रोका है। चाहना में कुछ खर्चा भी नहीं होता। यदि घर की हर्रा फिटकरी भी लगानी पड़ती तो इस चाहना की कीमत मालूम हो जाती है। यह चाहना तो फ्री की है,निःशुल्क है, निर्मूल्य है,बिना पैसे की है,इसलिए चाहे जितनी लुटा लो। कभी-कभी इसका उलटा भी होता है। वह यही कि बाहर से तो आदमी कहता है कि लड़ाई लड़ाई बन्द करो, और अंदर से सोचता है नहीं मानते तो लड़ मरो। हमारा क्या !हमें क्या।हमें तो कहना था,सो कह दिया। अब चाहे एक दूसरे को खोद कर गाड़ भी दो तो हमें क्या ! बस इस द्विविधा पूर्ण भाव से ही लड़ाई शांत नहीं होती। क्योंकि हम ही जब सच्चे मन और अंतरात्मा से नहीं चाहते,तो हमारा मनचाहा हो भी कैसे सकता है। 

 'शांति' का विलोम भाव 'अशांति' है।इसी अशांति का ही सर्वत्र साम्राज्य है। पत्नी पति से संतुष्ट नहीं , पति पत्नी से संतुष्ट नहीं,इसलिए शांति कायम होगी भी तो कैसे ! पड़ौसी अपने पड़ोसी से असंतुष्ट है तो शांति का काम ही क्या रहा ! बॉस कर्मचारी परस्पर असंतुष्ट हैं ,तो शांति हो भी क्यों कर भला ! जनता नेता से प्रसन्न नहीं ,तो क्या देश में शांति कायम हो सकती है ? विद्यार्थी अपने विद्यालय के तंत्र और उनके शिक्षण से संतुष्ट नहीं, तब तो अशांति बने रहना एक अनिवार्य सत्य है। मजदूर अपने मालिक या ठेकेदार से खुश नहीं ,तो अशांति कायम रहना अनिवार्य ही है। पाकिस्तान भारत से,ट्रम्प पूरी दुनिया से, रूस यूक्रेन से संतुष्ट क्यों होने लगे ;तब तो अशान्ति का झंडा फहराना भी जरूरी हो ही जाता है। 

 कुल मिलाकर पूरी दुनिया को ॐ शांति का अनिवार्य सत्य मिलना ही चाहिए। सब अपना- अपना कर और खा रहे हैं,फिर भी अशान्त हैं। तो कोई कर भी क्या सकता है। मैं तो कहता हूँ कि कोई किसी के चाहने मात्र से शांति ग्रहण नहीं कर सकता। यह शांति तो दोनों पक्षों अथवा हमारे अपने अंतर्मन से ही मिलने वाली है। यह कोई बाहरी और कृत्रिम वस्तु नहीं जो भावना मात्र में भरी हुई हो कि इसने चाहा और उसे मिल गई। न पहाड़ शांत है और न नदी या सिंधु ही, फिर इस आदमी से ही शांति की उम्मीद क्यों की जाए ? उसके अंदर तो कितनी नदियां बाँधों को तोड़ रही हैं,कितने महासागर उमड़ रहे हैं,कितने पर्वत मचल रहे हैं,कितने प्रभंजन गरज रहे हैं,किंतने ज्वालामुखी धधक रहे हैं।वहाँ यह शांति नाम की चिड़िया पर भी कैसे मार सकती है। उसे तो अशांत ही रहना है। अब उसके विदा होने के बाद करते रहिए कामना ,चाहना ,भावना कि परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करे। अब वह करे या न करे ;यह बात तो परमात्मा ही जाने कि वह क्यों प्रदान नहीं कर रहा है अथवा वह आत्मा ही अशांत रहने से मुक्ति की आकांक्षी नहीं है। शांति भी कर्मधारित है। जैसा कर्म वैसी शांति ,अन्यथा भ्रांति ही भ्रांति! क्लांति ही क्लांति ! म्लानता ही म्लानता ! कहाँ है शांतता ! 

 शांति की तलाश में लोग घर बार छोड़ते हैं। सन्यासी बनते हैं। गेरुआ पहनते हैं। नागा बाबा बनते हैं। श्मशान के अघोरी बनते हैं ;किन्तु क्या कोई बता सकता है कि उन्हें 'शांति ' मिली ?जिसकी तलाश में उन्होंने एक सहज और स्वाभाविक जीवन पथ छोड़ कर बनावटी जीवन पथ को अंगीकार किया! यह कोई नहीं बता सकता। वह शांति न तो महलों में है और न कुटिया में है। वह तो मन के उस एकांत कोने में है, जो सबको सुलभ है। पर आदमी उसे धन,दौलत, घर,मकान,कार,बंगला, कोठी,कनक ,व्यवसाय,कामिनी और काम में तलाशता फिरता है। इनमें से वह कहीं भी नहीं है। त्याग और तपस्या में भी वह सहज सुलभ नहीं है। और यदि है तो नमक प्याज के साथ सूखी रोटी में भी है और यदि नहीं है तो सोने का निवाला खाने वाले के कनक थाल में भी नहीं है। 

 शुभमस्तु ! 

 28.12.2025●8.00आ०मा०

 ●●●

नमस्ते [ आलेख ]

 788/2025

         

                    

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

नमस्ते और चाहे कुछ भी हो,किंतु मेरी अपनी सोच के अनुसार वह एक भाव है,सहृदयता है, विनम्रता है,उदात्त चेतना है,और भी बहुत कुछ है। वे कौन-कौन सी स्थितियाँ परिस्थितियाँ हैं;जब एक व्यक्ति दूसरे को नमस्ते करता है। मानवीय संवाद के श्रीगणेश और मन के सद्भाव का एक ऐसा प्रतीक ,जो मन की गूढ़ ग्रंथियाँ खोल देता है।हमारे आपके परस्पर नमस्ते करने के भी कुछ कारण होते हैं,हो सकते हैं। प्रायः हम अपने परिचितों को नमस्ते करके उनके प्रति हार्दिक विनम्रता और अपनी सहृदयता प्रस्तुत करते हैं। नमस्ते सकारण भी है और अकारण भी है। वह एक औपचारिकता भी है और शिष्टाचार भी। 

एक लघुकाय शब्द : 'नमस्ते', कितना सार्थक और भेदपूर्ण।शब्द एक  और अर्थ अनेक, भाव अनेक।सर्वथा नेक ही नेक। चाहे छोटा बराबर वाले से करे या बड़े से, सर्वोपयोगी है।एक बार किसी सरल व्यक्तित्व को नहीं भी करे,किंतु टेढ़े और जो किसी रूप में हमारे लिए हानिप्रद हो सकता है,उसे तो नमस्ते न करना अथवा उसकी उपेक्षा करना खतरे से खाली नहीं है।ऐसा कौन शख़्स है जो शनिदेव के स्वभाव और गति से परिचित नहीं है।व्यक्ति उनसे प्रेम या भक्तिवश नमन नहीं करता ;  भयवश करता है।जिसकी दृष्टि ;वह भी वक्र दृष्टि भी मारक और संहारक हो ,भला उससे कौन नहीं डरेगा ! उनसे तो डरते- डरते भी नमस्ते ही निकलता है।यों तो राह चलते ,उठते -बैठते,आते- जाते :नमस्ते एक सार्वजनीन शब्द है,किंतु परिस्थिति विशेष में उसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

प्रत्येक भाषा और देश में 'नमस्ते' के अलग -अलग रूप हो सकते हैं। किंतु उनका कार्य एक ही है।कभी आगमन का स्वागत तो कभी विदाई का अनागत ;सब जगह यह  नमस्ते ही बहुउद्देशीय एक शब्द।परिचय या संवाद ;सबका श्रीगणेश 'नमस्ते' से। 'नमः' में विनम्रता का एक ऐसा सद्भाव है,जो हृदय को द्रवित करता है। नमस्ते न करना भी अखरता है।किसी की नमस्ते का उत्तर नमस्ते से न देना ,जाने क्या- क्या व्यक्त कर जाता है। नमस्ते का प्रत्युत्तर न देना वाचक के प्रति उपेक्षा और अपमान के भाव को भी व्यक्त करता है। और साथ ही जवाब न देने वाले के अहंकारी चरित्र का दर्पण भी बन जाता है। वह उपेक्षा करने वाले के चेहरे को दिखा देता है।कुछ लोग इतने धीमे से नमस्ते का उच्चारण करते हैं,कि

प्रापक के पास  पहुँच ही नहीं पाता। कुछ लोगों के हाथ के संकेत, करबद्धता या मस्तक पर नमन का भाव भी प्रकारांतर से 'नमस्ते'  ही है। इस प्रकार नमस्ते के विविध रूप हो सकते हैं, शैलियाँ हो सकती हैं। तरह -तरह के लोगों से संपर्क और व्यवहार यह सब कुछ सिखा देता है। व्यक्ति की मुख -मुद्रा भी नमस्ते की संगिनी है, यदि होठों पर मुस्कान नहीं आई ,तो वहाँ औपचारिकता भर हो सकती है। हाथ जोड़ते हुए सिर झुका लेना भी नमस्ते के अंग और उपांग हैं। व्यक्ति के  सामाजिक व्यवहार में पारंगत होने पर सब आ जाते हैं।

इस प्रकार नमस्ते एक मानवीय संस्कार है। कुछ ऐसे भी 'महापुरुष' हैं ,जिन्हें किसी को नमस्ते करने में ही अपनी तौहीन महसूस होती है। उन्हें लगता है कि यदि उन्होंने किसी को नमस्ते कर ली ,तो उनकी पगड़ी ही उतर गई। इसलिए वे तने रहते हैं,सूखे पेड़ की तरह। कहीं कोई नम्यता नहीं, कोई द्रव्यता नहीं, बस तन्यता ही तन्यता।इसे हम उनकी वन्यता भी कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। परंतु वे मानवीय उदात्त  मनोभावों  की धन्यता से वंचित तो हो ही जाते हैं।

आइए !देखिए !! पहचानिए!!!वर्ष 2025 हम सबको नमस्ते कर रहा है। हम भी उसे सद्भावपूर्वक विदाई की नमस्ते करें और उसके उपकारों के प्रति कृतज्ञता का भाव दर्शाएँ।उधर वर्ष 2026 के शुभागमन का स्वागत करें,उसे करबद्ध नमस्ते करें और परम पिता परमात्मा से प्रार्थना करें कि देश, दुनिया, समाज और परिवार पर उनकी महती कृपा की बरसात होती रहे।

सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःखभाक् भवेत्।

शुभस्तु !

27.12.2025 ●1.15प०मा०

                   ●●●

पटका को झटका [ अतुकान्तिका ]

 787/2025


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पहले माला थी

फूल थे पुष्पगुच्छ थे

साथ में शॉल या दुशाला

अब आ गया है पटका

सम्मान को कहाँ से

कहाँ ला पटका !


आगे पटका को भी

लगने वाला है झटका

अब तक बहुत

कुछ ज्यादा ही मटका।


 ये पटका भी 

कब सटक जाए

कुछ पता नहीं,

मुझे पता है 

इसका भविष्य,

अब गले में 

ओढ़ाया जाएगा 

लाल पीला 

रँगा कलावा,

जो गोले में  से

एक दर्जन गलों की

शोभा बढ़ाएगा,

पटका को झटका

लगाएगा।


आवश्यकता 

आविष्कार की जननी है

कवियों के सम्मान पर

 रार  ठननी ही ठननी है,

सम्मान का नया अवतार

कलावा होगा,

उसके बाद कुछ

नया आविष्कार भी होगा।


जमाना बदल रहा है

सब कुछ बदल रहा है

आदमी रँग बदल रहा है

शॉल माला से आगे

बढ़ी है यात्रा अभी

पटका की पताका बनी है,

अब कलावे की बारी है, 

आगे- आगे देखते जाइए

क्या- क्या तैयारी है !


शुभमस्तु !

26.12.2025 ● 7.45प०मा०

                    ●●●

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

यदि आपसे पूछा जाए! [ व्यंग्य ]



786/2025 

 

 © व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 आप एक आम आदमी हैं,आम स्त्री हैं।इनमें न तो कोई नेता है,न उनका गुर्गा या चमचा है और न राजनीति से कोई संबंध रखता है। वह एक विशुद्ध आदमी या स्त्री है।राजनीति या राजनेता या उसके पिछलग्गू की हवा आपको दूर-दूर तक छू भी नहीं गई। ऐसे ही एक हजार जन एक बड़े से हॉल में एकत्रित हैं। आप भी उस जनसमूह में विद्यमान हैं। आप और उन सबसे एक प्रश्न पूछा गया कि 'इस पूरे देश की जनतांत्रिक व्यवस्था को सँभालने के लिए क्या सब कुछ इन नेताओं पर छोड़ देना उचित है?' 

 देश के समस्त राजनेताओं के चाल और चरित्र का हाल सबको पता है। जो किसी से छिपा नहीं है।वे जो कुछ कर रहे हैं उनमें से मात्र दशलव एक प्रतिशत को छोड़कर ऐसे कितने राजनेता हैं, जो देशभक्त हैं,राष्ट्रभक्त हैं? देश को समर्पित हैं ? क्या उनके कारनामों से जन हित हो सकता है ?क्या इनके हाथों में देश का भविष्य सुरक्षित है? इस सम्बंध में आपको दिए प्रश्न के उत्तर में क्या कहेंगे? बिना किसी भय और लाग लपेट के आप क्या इस व्यवस्था का समर्थन करेंगे अथवा व्यवस्था को बदले जाने के विकल्प पर चिंतन करने का सुझाव देंगे ? 

 इसके उत्तर में कुछ लोग तो यही कहेंगे कि जैसे चल रहा है ,ठीक ही है, हम भला क्या कर सकते हैं। जब सब कुछ वोट से ही तय होना है तो जैसे नागनाथ वैसे ही साँपनाथ। क्या फर्क पड़ता है?हम क्या करें ?जैसा है ,वैसा झेल रहे हैं,भले ही वे आम जन को पेल रहे हैं।आम आदमी के जज्बातों से खेल रहे हैं। जो प्रबुद्ध वर्ग होगा वह इस बात पर जोर देगा कि व्यवस्था को बदले जाना चाहिए ,और इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कुछ 'खास' के हाथों हर आम का शोषण नहीं होना चाहिए।एक कंगाल विधायक मंत्री बनते ही करोड़ों में खेलता है।वह जितनी बार विधायक या मंत्री बनता है,उतनी पेंशन लेता है। हर बार की अलग अलग लेता है और दूसरी ओर एक कर्मचारी या अधिकारी 30 वर्षों तक देश की सेवा करता है, उसकी पेंशन खत्म कराने के लिए हाथ खड़े करता है। कुल मिलाकर इस व्यवस्था के सम्बंध में यदि गुप्त मतदान किया जाए तो शायद एक भी वोट इस व्यवस्था के समर्थन के सम्बन्ध में नहीं पड़ेगा। जब जनमत ही इसके विरुद्ध है,तो व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं किया जाता ! अब विचार की बात आती है तो कौन विचार करे ? वह सब भी इन्हीं राजनेताओं के जिम्मे! भला ऐसा कौन होगा जो अपनी जड़ें काटने के लिए विचार करेगा ! अपना अन्धानुशासन चलता रहे और अंधेर नगरी का जलवा कायम रहे। कोई नई व्यवस्था क्यों आए ? चोर से मोर मरवाने का काम जैसा हो सकता है, वही है वर्तमान प्रजातंत्र ,जहाँ निरक्षरों ,अनपढ़ों, पढ़े लिखे अज्ञानियों के वोटों द्वारा लोकतन्त्र का मंत्र पढा जाता है।और 'आ बैल मुझे मार' की कहावत को अपने ऊपर लागू किया जाता है। इनका विश्वास है कि रिश्वत दो और उनका है कि रिश्वत लो और सबका विश्वास है कि पकड़े जाओ तो रिश्वत देकर छूट जाओ।यही लोकतंत्र है।देने वाला खुश तो लेने वाला महाखुश।

 अब इस विचार के दूसरे पहलू पर विचार करते हैं। यदि देश के सर्वदलीय राजनेताओं से यही बात रखी जाए तो व्यवस्था के समर्थन में यदि एक हजार में आठ सौ वोटर नेता उपस्थित हों तो भी मत गणना के बात मत परिणाम एक हजार एक सौ से ऊपर ही रहेगा। इनमें अनुपस्थित दो सौ और एक सौ अतिरिक्त वोट पड़ जाएँगे। यही इस लोकतंत्र में हो रहा है। कितना ईमानदार है इस देश का कर्णधार ! दम्भ दारु बेड़ा पार! पीछे खड़ा हुआ बोलेगा मेरा कटोरा तेरे से भी अगार(आगे)। 

 यहाँ जो चल रहा है;वह सब ठीक ही है। कहीं कोई आपत्ति नहीं ,कोई विरोध नहीं।चुसने वाला धैर्य के साथ चुस रहा है और चूसने वाले को चूसना ही है ;वह निरंतर चूसे जा रहा है।यह भी लोकतंत्र का एक अहम पहलू है। यहाँ कुछ भी हो,कोई विरोध नहीं, कोई हलचल नहीं,सब स्वीकार,सब हज़म।थोड़े से दिन टीवी अखबारों और सोशल मीडिया पर पत्ते खड़के,बाद में वह भी शांत।यहाँ गलत और सही सबका साधारणीकरण हो गया है।यह भी इस लोकतंत्र का एक अहम बिंदु है। सबको कुर्सी चाहिए,अब चाहे वह नेता हो या कर्मचारी या अधिकारी।नर अथवा नारी ,एक से एक अगाड़ी। चरित्र गया तेल लेने। इसकी किसी को कोई चिंता नहीं, चरित्र का प्रमाणपत्र भी उन लेखनियों से जिनका अपना कोई चरित्र नहीं।वही मान्य है,सर्वमान्य है। सब जगह बाईस पंसेरी धान हैं। पूरे देश पर तना हुआ एक ही वितान है। सब जनगण उसी के नीचे का मेहमान हैं।जो दे नहीं सकते ,उनसे टेक्स लिया जाता है और राजनेताओं को यों ही आगे बढ़ने दिया जाता है। वे टेक्स फ्री,टॉल फ्री, पानी फ्री, यात्रा फ्री, मोबाइल फ्री, बंगला फ्री, समस्त सुविधाएँ फ्री। अगर किरकिरी है तो बस आम आदमी की ही।जो वर्दी में आ गया ,वह सुविधा लाभ वर्दी से पा गया। अंततः नेता सबके ऊपर तंबू बना छा गया। 

 देश की इस व्यवस्था के प्रति किसी के कान पर कोई जूं भी नहीं रेंगती।सब कुछ सर्व स्वीकृत है। अंगीकृत है। तमस से आवृत है। राजनीति को घृत ही घृत है।जो जितना उनके सम्पर्क में है,उतना ही प्रसन्न। भले ही निर्धन को मयस्सर न हो दो वक्त का अन्न । नेताजी टनाटन और आम जन में दनादन। किसने कहा नेता आदमी या औरत नहीं होता।वह बस नेता होता है, थर्ड जेंडर से भी आगे फोर्थ जेंडर।आम आदमी तो दीवाल पर टंगा हुआ कैलेंडर, जिसे वहीं टंगे-टंगे नेता को बदलना है।पाँच साल में देश की चाल को बदलना है। मत का विलोम -अनुलोम चल रहा है।आम आदमी समझता है सरकार उसकी है और नेता पुत्र कहता है कि उसकी है; निर्णय आपको करना है।आप निर्णय क्या करोगे ,आपने तो यह अधिकार वोट के बदले उन्हीं को बेच दिया है। आप तो खाली लिफ़ाफे हो, कोई कुछ भी भर ले। 

 शुभमस्तु ! 

 26.12.2025●4.00 प०मा० 

 ●●●


अच्छा तो अब तुम जा रहे हो ! [ आलेख ]

 785/2025 

 

 

 ©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 अच्छा तो अब तुम जा रहे हो दो हजार पच्चीस ! कोई बात नहीं। एक न एक दिन तो सबको ही जाना है।जो आया है ,वह जाएगा भी ; यह नियति का अनिवार्य सत्य है। जब तक एक जाएगा नहीं,तब तक अगला आएगा भी नहीं। नियति को इस विषय में किसी से कोई लगाव भी नहीं। लगाव रखे भी कैसे, वह स्वेच्छा से किसी को एक पल के लिए भी विलंबित नहीं कर सकती। यह उसका निर्मोह भी नहीं, नियम है ;जिसका अनुपालन उसे अनिवार्य रूप से करना ही है। 

  जाने वाले तेरी शुभ विदाई और आने वाले का स्वागत है,वंदन है,अभिनंदन है। तुम जा तो रहे हो; पर सँभल कर जाना।जाते-जाते कुछ ऐसा मत दिखाना कि तुम्हें सदियां कोसती रहें।कहते हैं कि जिसका अंत भला हो उसको भला ही भला कहा जाता है। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी भलाई में कुछ भी अनभलाई हो। 

 अब तुम्हारी उलटी गिनती शुरू हो गई है। पाँच ,चार ,तीन, दो , एक और बस विदाई नेक।और इकतीस दिसम्बर का अंतिम दिन।देख रही दुनिया हर आदमी गिन- गिन।जाते जाते अच्छी नहीं लगती कुछ किन-मिन,भिन-भिन। जैसे रहे वर्ष भर घुलमिल ,वैसे ही अब भी रहना है हिल मिल।व्यतीत हो ही रहा समय तिल - तिल।इसलिए हँसते मुस्कराते रहो खिल -खिल। 

 तुम तो  जानते हो कि शुभम् शब्दों का एक अदना-सा खिलाड़ी है।वैसे वह अपने क्षेत्र में स्वयं को समझता अनाड़ी है।भले ही उसके परित: रचनाओं की बड़ी झाड़ी है,झाड़ है कि झंखाड़ है, यह तो तुम ही जानो।अपने पिछले इस तिरेसठ वर्ष के साहित्यिक यात्रा अंतराल में बहुत कुछ देखा है,पाया है ।जो भी मुझे भाया है ,तुम्हारे साथ रहने तक यात्रा के 45 पत्थर पार कर आया है। तुम्हारे विदाई लेने तक वह अपने जीवन के 74 वर्ष भी पूरे करने की सोचता है। एक ही वर्ष में 15 पुस्तकों का प्रकाशित होना तुम्हारी बड़ी उपलब्धि है।भविष्य तो समय के हाथों में है कि कितनी दूर तक जाना है ,भला कौन जाने। कुल मिलाकर तुम्हारा शुभम् अति प्रसन्न है और माँ सरस्वती के काव्य रूपी वरदान पर गदगद है। कितने पुण्य करने पर मानव जन्म मिलता है और उसमें भी कवि होना तो कितने अश्वमेघ यज्ञों का सुफल है;कहा नहीं जा सकता। आज यह अकिंचन शुभम् इसी चिंतन में लीन है कि वह भी अथाह साहित्य- सागर की एक नन्हीं सी मीन है।

 मैं नहीं जानता कि जो कुछ भी लिखा है या प्रकाशित हुआ है ,वह साहित्य की कसौटी पर किंतने कैरेट का शुद्ध सोना है। पर इतना तो देखा है कि सोने को परखने की कसौटी सबकी समान नहीं होती। कुछ ऐसे भी पारखी हैं,जो केवल कचरा ही ढूंढते हैं,और शुद्धता को पीछे छोड़ते हैं। कुछ बिना कसौटी पर कसे हुए वाह! वाह !! करते हैं और कोई बुराई न मिले इससे डरते हैं।एक अच्छे सहित्यविद् के लिए ये सबसे बड़ा खतरा हैं ,क्योंकि अंधकार में ही इन्होंने साहित्य को दिया छितरा है।साहित्य का सही रूप तो उसी कसौटी पर निखरा है, जो शूल को शूल और फूल को फूल बताने पर उतरा है। 

 कल के बाद अगले 28 दिसम्बर को ही तुम्हारे साथ जीवन का चौहत्तरवां शरद कहूँ या वसंत ; मुझे अमृत वर्ष में ले जाएगा और 2026 के नए शब्द-सुमन सजाएगा। मैं आभारी हूँ तुम दोनों का और उन अतीत व्यतीत का सबका जो पीछे नींव के पत्थर बन गए। 'निज कवित्त केहि लाग न नीका' की बात ध्यान में रखी जाए तो मुझे भी अपना सम्पूर्ण साहित्य चाहे वह काव्य हो,कहानी,नाटक, व्यंग्य या आलेख ;सब कुछ नीका लगता है। अब वह पाठकों की दृष्टि में सरस हो या फीका। कुल मिलाकर शुभम् एक छोटा सा साहित्याक्षर है, डुगडुगी बजाकर मेले या झमेले में हँसाने वाला जोकर नहीं । जो कहता है वह सच ही कहता है, चाहे वह व्यंग्य हो या कविता।सबकी खबर लेता है और सबको खबर देता है।पर सच कहने से नहीं चूकता। जिसे पढ़कर तिलमिलाने वाला तिलमिलायेगा और अन्य पाठक हँसें या न हँसें, शुभम् इसकी परवाह नहीं करता।सत्य ही उसकी कसौटी है,इसे तो तुम अच्छी तरह से जानते हो दो हजार पच्चीस। अब आगे आने वाले दो हजार छब्बीस को भी उसका परिचय देते जाना। शेष शुभम् स्वयं सँभाल लेगा। 

 शुभमस्तु ! 

 26.12.2025 ●11.15 आ०मा०

 ●●●

फोर्थ जेंडर! [ अतुकान्तिका ]

 784/2025


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सुना है

राजनीति से आदमी

ऊपर उठ जाता है,

पर मुझे लगता है

जितना ऊपर उठता है

उतना आदमीपन से

नीचे गड़ जाता है।


यदि विश्वास न हो

तो नेताओं की ओर

नज़र उठाकर देख लो

कि उनमें कितने

आदमी बचे हैं।


आप स्वयं ही

तय कर लें कि

आपको आदमी बने रहना है

या बन जाना है नेता,

यदि एक बार नेता बन गए

तो आदमी बन पाना

सम्भव ही नहीं।


आप कहेंगे कि

क्या नेता आदमी नहीं होता?

पूरे देश के नेताओं पर

नज़र घुमा कर देख लीजिए 

कि उनमें आदमीपन 

कितना शेष है,

क्योंकि वह समझता है

कि हर आदमी उसके पीछे

चलने वाला मेष है।


नेता बनने के बाद

उसकी सोच

 बदल जाती है,

स्त्री रह जाता है

न पुरुष 

बस नेता कहा जाता है,

यह थर्ड जेंडर से अलग

फोर्थ जेंडर बन जाता है।


शुभमस्तु !


26.12.2025●6.30आ०मा०

                 ●●●

उपलब्धि [ अतुकान्तिका ]

 783/2025


                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उपलब्धि का बिरवा

कभी निर्मूल नहीं होता

अनायास ही उस पर

दल फूल फल नहीं आते

उसकी भी अपनी

जीवंत कहानी है।


कभी न कभी

किसी न किसी तरह

हुआ होगा 

एक नन्हे बीज का अंकुरण

तभी वह आज 

एक सघन विटप है।


कुछ ही पलों में 

या दो एक दिन में

इतिहास नहीं बनते

इसकी भी एक

 समृद्ध शृंखला है।


आइए हम

बोएँ कर्मों के कुछ बीज

ताकि कल लहलहाए

वह महान बिरवा।


नहीं देता

 ईंट का पत्थर दिखाई

बस शीश का कलश 

दिखाई देता है

दबा रहता है वह

नींव में 

धरती के गर्भ में गहरा।


शुभमस्तु !


26.12.2025● 5.45 आ०मा०

अनुरोध [ सोरठा ]

 782/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सुनिए  कृपानिधान, करते  हैं अनुरोध हम।

हमें मूढ़ मति  जान,सबका दुख हर लीजिए।।1

पड़े मनुज  पर नेक,असर बड़ा अनुरोध का।

मति में भरे विवेक, सुनता  भाव विनम्र तो।।2


याचक बन कर दीन,काम किसी से चाहते।

लेश न मेख न मीन,करें सदा अनुरोध ही।।3

लगे उग्र  या  क्रोध,कर मत ऐसा आचरण।

जगा  हृदय में  बोध,सदा करें अनुरोध ही।।4


हो अनुरोध   विनम्र,हृदय द्रवित होता सदा।

यद्यपि कोई  उम्र  ,कटुक  शब्द  बोलें नहीं।।5

करके   पूर्ण  विचार, अनुरोधी की बात पर। 

बदलें निज व्यवहार,मनन करें अनुरोध का।।6


जब विनम्र अनुरोध,किया  राम ने सिंधु  से।

दया भाव  का  बोध, दिया पंथ तब सिंधु  ने।।7

सदाचरण  अनुरोध,  धृष्ट कभी करता नहीं।

देख लिया  कर शोध, रहे अहं में मग्न वह।।8


करे   सूक्ष्म अनुरोध,  बिल्ली  चूहे  से नहीं।

दिखलाती बस क्रोध,समझे मुँह का ग्रास ही।।9

अति विनम्र अनुरोध, शत्रु शत्रु से क्यों करे।

बने उग्र कर  क्रोध,जान  रहा  कमजोर है।।10


मानव बने महान,महत भाव अनुरोध का।

जाने सकल जहान,मैल धुले मन का सभी।।11


शुभमस्तु !


24.12.2025●8.00प०मा०

                 ●●●

हो विनम्र अनुरोध [ दोहा ]

 781/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करते   हैं  अनुरोध  हम,सुनिए कृपानिधान।

सबका  दुख हर लीजिए,हमें मूढ़ मति जान।।1

असर बड़ा अनुरोध का,पड़े मनुज जो नेक।

सुनता भाव विनम्र तो,मति में भरे विवेक।।2


काम किसी से चाहते,याचक बन कर दीन।

करें सदा अनुरोध ही,लेश न मेख न मीन।।3

कर मत ऐसा आचरण, लगे उग्र या क्रोध।

सदा करें अनुरोध ही,जगा हृदय में बोध।।4


हृदय द्रवित होता सदा,हो अनुरोध विनम्र।

कटुक  शब्द बोलें  नहीं, यद्यपि कोई  उम्र ।5

अनुरोधी की बात पर,करके पूर्ण विचार।

मनन करें अनुरोध का,बदलें निज व्यवहार।।6


किया राम ने सिंधु से,जब विनम्र अनुरोध।

दिया पंथ तब सिंधु ने,दया भाव का बोध।।7

धृष्ट कभी  करता  नहीं, सदाचरण अनुरोध।

रहे अहं में मग्न वह,देख लिया कर शोध।।8


बिल्ली  चूहे  से  नहीं, करे  सूक्ष्म अनुरोध।

समझे मुँह का ग्रास ही,दिखलाती बस क्रोध।।9

शत्रु शत्रु से क्यों करे, अति विनम्र अनुरोध।

जान रहा कमजोर है,बने उग्र कर क्रोध।।10


महत भाव अनुरोध का,मानव बने महान।

मैल धुले मन का सभी,जाने सकल जहान।।11


शुभमस्तु !


24.12.2025●8.00प०मा०

                  ●●●

बुधवार, 24 दिसंबर 2025

अन्य से उम्मीद क्यों हो! [ नवगीत ]

 780/2025


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दे नहीं सकते

किसी को

अन्य से उम्मीद क्यों हो!


भानु शशि धरती

 नदी सब

दे रहे हैं,ले रहे तुम

नीर पावक

सिंधु अंबर

क्या न देते,जी रहे तुम

स्वार्थ से

ऊपर उठो तो

पर्जन्य से उम्मीद क्यों हो!


काष्ठ ईंधन

फूल फल सब

जंगलों ने दे दिए हैं

काटते हो

रात -दिन तुम

नाश का प्याला पिए हो

मेघ भी 

देंगे न पानी

वन्य से उम्मीद क्यों हो !


इस हाथ दे

उस हाथ लेना

है नियम ऐसा सदा से

भूमि में 

जब बीज बोते

फूटते अंकुर वहाँ से

जब क्षमा

करने न आए

क्षम्य से उम्मीद क्यों हो !


शुभमस्तु !


24.12.2025 ●3.45 प०मा०

                   ●●●

समझौता आओ देखें [ नवगीत ]


779/2025


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



गरम चाय का

दाल मंगौड़े से

समझौता आओ देखें।


किट- किट करके

दाँत बज रहे

पूस माघ के

चादर एक

सफेद ओढ़कर

पास आग के

शीत आग का

शुष्क काठ से

समझौता आओ देखें।


गाजर के

हलवे के सँग में

 हैं लड्डू तिल के

गरम पकौड़ी

बेसन की

पालक से मिल के

स्वाद शीत का

परम प्रीत का

समझौता आओ देखें।


शकरकंद भी

भून अलावों में

महकी हैं

गज़क रेवड़ी

मूँगफली

चटकी चहकी हैं

कंबल और रजाई

स्वेटर शॉल भरकते

समझौता आओ देखें।


शुभमस्तु !


24.12.2025●3.00प०मा०

                  ●●●

[3:38 pm, 24/12/2025] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

साधक की एकबिन्दुता [ नवगीत ]

 778/2025


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


केंद्र, साधना का

साधक की

एकबिन्दुता।


बिंदु मात्र विस्तार

सिंधु की

अगम  गहनता

अणु हो

परम सुसूक्ष्म

बिंदु की अटल सफलता

उतरो

उतरो और वही है

एकसिंधुता।


मछली

केवल एक

ताल को गदला करती

कवि की

केवल पंक्ति

नई परिभाषा गढ़ती

चिंतक 

मुक्ता खोज

सीप में दे सुंदरता।



मन की टोह

गगन से ऊँची

माप नहीं है

रवि मंडल से

ऊपर जा

कुछ और कहीं है !

बनी रहे बस

 मन की केवल

तारतम्यता।


शुभमस्तु !


24.12.2025●2.15प० मा०

                   ●●●

रूठता भी वही [ नवगीत ]

 777/2025


          


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप  'शुभम्'


रूठता भी वही

जिसका

मनावनहार हो।


जंगलों में 

रह रहा जो

रूठता किससे भला

आप ही है

कर्म कर्ता

क्या करेगा मनचला

आप ही है

पाल्य पालक 

नम्र या अनुदार हो।


कौन किससे

तुष्ट कितना

स्वार्थ का संघात है

कौन किससे

रुष्ट कितना

आपसी संवाद है

टूटता

बंधन वहीं जब

दो दिलों में प्यार हो।


जगत के

बंधन गठीले

कब तलक किसको पता

एक पल में

टूट जाएँ 

वक्त   देता   है   जता

फूटता 

साझा घड़ा तब

टूटे दिलों में  रार हो


शुभमस्तु !


24.12.2025● 1.30प०मा०

                   ●●●

शॉल बुनने में लगी है [ नवगीत ]

 776/2025


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शॉल 

बुनने में लगी है

उषा गुडहल-सा खिला।


देर से 

सोकर उठा है

पूस का सूरज सजल

पढ़ रही

पूरब दिशा अब

प्यार की कल की ग़ज़ल

दो कदम

दिखता न पथ में

खो गया कैसे किला।


कोहरे की

ओढ़ चादर

भोर आया सामने

मुँह ढँका

ओढ़ी रजाई 

पैर लगते तानने

चल रहा है

शीत लहरी का

हहरता सिलसिला।


सृजन गर्मी का

किसी विधि

हो यही बस कामना

चाय की

चुस्की भपीली

आग का हो तापना

झाँकता

सूरज उजेला

मध्याह्न का ये चिलचिला।


शुभमस्तु !


24.12.2025●1.00प०मा०

                  ●●●

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

चाहते हो गाँव को यों [ नवगीत ]

 775/2025


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चाहते हो गाँव को

यों शहर में

झटपट बदलना।


बाप हैं यदि गाँव 

तो बेटे हुए 

बिगड़ैल भारी

चमक ही

इनको लुभाती

और भी इनको बिमारी

इधर खाते

उधर पीते

फिर पड़े इनको पलटना।


पेड़ बेलें

नदी पर्वत

खेत भी मिटने लगे हैं

कंकरीटी 

भवन ऊँचे

गाँव में बनने लगे हैं

नीम की 

छतनार छाँहें

है न छप्पर का टपकना।


गाँव गलियों में 

न ऊँची

बाँग मुर्गे की जगाती

गाड़ियों के

हॉर्न बजते

ओस मुड़गेरी भिजाती

कोहरे की

शॉल ओढ़े

देखा नहीं पाला बरसना।


शुभमस्तु !


23.12.2025●4.00प०मा०

                ●●●

वर्ष में बदले कलेंडर [ नवगीत ]

 774/2025


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रोज ही 

तारीख बदले

वर्ष में बदले कलेंडर।


आदमी तो 

आदमी है 

क्या बदलना

एक पत्थर की

शिला का

क्या पिघलना

वक्त उड़ता

जा रहा 

ज्यों हो लवेंडर।


जिंदगी की

हर घड़ी 

जब टिकटिकाए

जिंदगी हो

और छोटी

घटती जाए

क्या पता

कब जग उठे

साँसों का बवंडर।


जनवरी

फिर फरवरी

आती रहेंगीं

मार्च भी

अप्रैल भी

अपनी कहेंगीं

आएगा  नम्बर

दिसम्बर का कभी फिर

रफूचक्कर सिलिण्डर।


शुभमस्तु !


23.12.2025●3.00प०मा०

                     ●●●

रिफाइंड के नाम पर [ नवगीत ]

 773/2025


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रिफाइंड के नाम पर

और जहरीला 

बना दिया गया है तेल।


कुदरती  में

जब 'आदमी' तत्त्व जा  मिला

असली को

नकली करने का ये सिलसिला

शुरू कर ही

देता है 

एक अलग ही घालमेल।


सभी जानते हैं

खाते हैं खिलाते हैं

पानी में

दूध की तरह मिलाते हैं

पकड़े भी जाएँ

तो क्या है

चले जाते हैं जेल।


बड़ा ही सहनशील है

जिसे कहा जाता है आदमी

ये तो रिफाइंड तेल है

पचा जाता है अखाद्य खाद भी

आत्महत्या के लिए तो

हो रहे हैं

आदमी के हाथ बड़े -बड़े खेल।


शुभमस्तु !


23. 12.2025●12.45प०मा०

                    ●●●

ले जा रही है जिंदगी [ नवगीत ]

 772/2025


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबको  अलग ही

रास्तों  पर 

 ले जा रही  है जिंदगी।


हाथ में

अपने नहीं कुछ

भेजा गया करना वही

चाहता 

निर्धन बने क्यों

दूध या मिलना  दही

रजत चम्मच

ले के आया

सबला रही है जिंदगी।


नियति का

नटवर नचाता

बंदर- बंदरिया सा तुझे

दौड़ता

संकेत पर तू

कहता नहीं करना मुझे

कब मोड़ दे

तेरी दिशा को

बतला रही है जिंदगी।


कठपुतलियों के

खेल का

तू पात्र ही है आदमी

नाचना 

ही नाचना

तक़दीर में जो लाज़मी

श्वास का 

कर खेल पूरा

समझा रही है जिंदगी।


शुभमस्तु !


23.12.2025● 12.00मध्याह्न

                  ●●●

साँझ से ही रात भर [ नवगीत ]

 771/2025


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूस

होली खेलता है

साँझ से ही रात भर।


आकाश से

पिचकारियाँ

चलतीं विरल-सी ओस की

कोटरों में

 गिलहरियाँ

सोने   लगीं    संतोष    की

ओढ़ चादर

कोहरे की

साँझ से ही रात भर।


घोसले में

दुबक 

पंखों में छिपी जा फ़ाख्ता

जा रहा है

गैल में जो

दिखता नहीं कुछ  रास्ता

पेड़ के नीचे

टपाटप

साँझ से ही रात भर।


बाजरे के

बूलरे पर

श्वेत पाला जा जमा

भूनता है

शकरकंदी

आग में  रोजी  कमा

देखो अलावों  में

न अग्नि

साँझ से ही रात भर।


शुभमस्तु !


23.12.2025●11.15आ०मा०

                 ●●●

दयनीय क्यों हो वृद्धता! [ गीत ]

 770/2025


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दयनीय क्यों हो

वृद्धता 

जो हाथ दो जोड़े खड़ी।


दीनता में

हीनता के

बोध का   संचार क्यों

जब देह हो

कमजोर तो

जननी बने बेजार यों

देह पर कपड़े

कुरुचि के

आपदा में ज्यों बड़ी।


हालात से

मजबूर हैं सब

बदलना संभव नहीं

वक्त के ही

सामने

घुटने टिकाए सब यहीं

जिंदगी

लेती परीक्षा

व्यक्ति की कैसी कड़ी।


प्रभु उन्हें

सामर्थ्य दे

जो व्यक्ति यों मजबूर हो

पास में

अपने सदा हों

हो सगा  क्यों   दूर हो

बुद्धि तन-बल भी

सदा हो

हो न यों  जन की घड़ी।


शुभमस्तु !


23.12.2025●2.15आ०मा०

                 ●●●

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

तुम जाड़े की धूप सरिस [ नवगीत ]

 769/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तुम जाड़े की

धूप सरिस

तन-मन गरमाती हो।


गमन तुम्हारा

नव तुषार-सा

शीतल करता देह

लगता

सन्नाटा पसरा हो

बिना तुम्हारे गेह

गरम चाय की

प्याली-सी 

अधरों को भाती हो।


पायल चूड़ी

रुनझुन खनखन

की मध्यम-सी गूँज

व्यापित है

कोने- कोने में

कोकिल जैसी कूँज

कभी-कभी

अपनी बातों में

उलझा जाती हो।


दो पल को भी

विलग हुई तो

मन घबराता है

किसी और को

कैसे पूछूँ

अति शरमाता है

घर भर की

चिंता है तुमको

नित चमकाती हो।


शुभमस्तु !


22.12.2025● 2.15 प०मा०

                    ●●●

कलयुग में उम्मीद! [ नवगीत ]

 768/2025



           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कलयुग में

उम्मीद 

भरत लछमन की कैसी !


भूल गए

त्रेता में

जीवन मूल्य अलग थे !

राम लखन

शत्रुघ्न भरत

के प्राण सुभग थे

जिस दिन

चूल्हे चार जले

फिर समता कैसी!


अपना 

तेरा मेरा दिखता

आज सभी को

नहीं देखता

एक बंधु

दृग जमी नमी को

सबका

उसको मिले भाग

 फिर द्रवता कैसी !


भाग्य एक का

नहीं एक को

कभी सुहाता

सोच रहा है

निंद्य

काश भाई मर जाता

साढू से

है प्रीति

भ्रात से रमता कैसी!


शुभमस्तु !


22.12.2025● 1.30प०मा०

                   ●●●

पूस-माघ में रूप बदलती [ नवगीत ]

 767/2025



    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूस - माघ में

रूप बदलती

कैसे-कैसे धूप।


चैत्र जेठ

वैशाख मास में

अलग धूप के तेवर

सावन भादों में

मँडराते

जब मेघों के घेवर

कई -कई दिन

तरसा जाती

वह बरसाती धूप।


फागुन में

जब होली खेली

धूप बरसती ऐसे

पिचकारी के

रंग फुहारें

छोड़ रहे हों जैसे

तन-मन को

अति नित्य लुभाती

वासंती  नव  धूप।


शरद शिशिर

हेमंत काल में

तरस-तरस हम जाते

पूस माघ में

बैठ खुले में 

इंतजार  कर पाते

थर -थर काँपे

ढोर मनुज खग

शीत काल की धूप।


शुभमस्तु !


22.12.2025●12.15प०मा०

                 ●●●

इसलिए पत्थर हुए वे [ नवगीत ]

 766/2025


 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नाम में 

पत्थर जड़े हैं

इसलिए पत्थर हुए वे।


 लाल हीरा

और नीलम

श्वेत मोती की लड़ी है

जड़ित हैं

पुखराज पन्ना

नाम की महिमा बड़ी है

असर कुछ 

ऐसा हुआ है

अनमोल ही पत्थर हुए वे।


काँच की चूड़ी

न रखता 

नाम कोई ,डर बड़ा है

टूट जाए

लगे झटका

पर नगीना तो कड़ा है

मजबूतियां

पहले जरूरी

कनक में पत्थर हुए वे।


सिंह हैं

लाखों हजारों

बैल या गर्दभ नहीं वे

अश्व गीदड़

भी न कोई

भैंस के संदर्भ ही वे

अमर होने की

तमन्ना

आभूषणी पत्थर हुए वे।


शुभमस्तु !


22.12.2025●1.145 आ०मा०

                   ●●●

कर्मशील नर चाहता [दोहा गीतिका]

 765/2025


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कर्मशील नर  चाहता, सदा करे कुछ काम।

कुछ ऐसे  मानव यहाँ,  मात्र   चाहते  नाम।।


नीड़  त्याग बाहर गए,भोर  हुआ  सब कीर,

पल भर भी करते नहीं,सब विहंग आराम।


दिवस बनाया काम  को,सोने को शुभ रात,

भानु  हुए जब अस्त तो,हुई सुबह से शाम।


पौष   मास का शीत है,सघन कुहासा    सेत,

छाया  चारों  ओर   है, दिवस  करे  विश्राम।


तजते  नहीं   लिहाफ को,थर-थर  काँपे देह,

नहीं मिले जब वृद्ध को,दिन को उजली घाम।


लगे   हुए  मजदूर   हैं, श्रमरत व्यस्त अनेक,

उन्हें  चाहिए  काम के, नित्य दिहाड़ी दाम।


'शुभम्' शीत  हेमंत    का,  देता  है   जब कष्ट,

शिशु चिपके जा अंक में,माँ का आँचल थाम।


शुभमस्तु !


22.12.2025●5.15 आ०मा०

                     ●●●

कुछ ऐसे मानव यहाँ [सजल]

 764/2025


       

समांत          : आम

पदांत           : अपदांत

मात्राभार       :24.

मात्रा पतन     :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कर्मशील नर चाहता,सदा करे कुछ काम।

कुछ ऐसे  मानव यहाँ,मात्र  चाहते    नाम।।


नीड़  त्याग बाहर गए,भोर हुआ सब कीर।

पल भर भी करते नहीं,सब विहंग आराम।।


दिवस बनाया काम को,सोने को शुभ रात।

भानु  हुए जब अस्त तो,हुई सुबह से शाम।।


पौष मास का शीत है,सघन कुहासा    सेत।

छाया  चारों  ओर   है, दिवस  करे  विश्राम।।


तजते  नहीं   लिहाफ को, थर-थर काँपे देह।

नहीं मिले जब वृद्ध को,दिन को उजली घाम।।


लगे   हुए  मजदूर   हैं, श्रमरत व्यस्त अनेक।

उन्हें  चाहिए   काम के, नित्य दिहाड़ी दाम।।


'शुभम्'   शीत  हेमंत  का,देता  है   जब कष्ट।

शिशु चिपके जा अंक में,माँ का आँचल थाम।।


शुभमस्तु !


22.12.2025●5.15 आ०मा०

                     ●●●

ज्ञानी [ चौपाई ]

 763/2025

 

            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गली-गली    में   मिलते    ज्ञानी।

किंतु  ज्ञान के   अति   अभिमानी।।

कथनी  में    बल    जिनके   भारी।

करते      नहीं     यही      बीमारी।।


नहीं   ज्ञान की    कुछ     कोताही।

चलें उलट    पथ    जिनके  राही।।

ज्ञानी  का  नित   रौब  दिखाएँ।

बात     पलट वे   पल   में   जाएँ।।


बने  विदुर   नित    नीति   जताएँ।

कहते  किंतु  न     धर्म     निभाएँ।।

ज्ञानी जन     ले     ग्रीवा  पट्टा।

खेल  रहे      मेले       में      सट्टा।।


राम कृष्ण   थे    बढ़-चढ़ ज्ञानी।

महिमा जिनकी     जगत  समानी।।

सन्त      विवेकानंद        अनोखे।

खुले ज्ञान के      अनुपम     मोखे।।


बिना  ज्ञान  धरती    पर    सूखा।

अन्न शोध बिन जन-जन   भूखा।।

किस ज्ञानी ने   अन्न    उगाया।

क्षुधा-शमन    का   पंथ  सुझाया।।


ज्ञानी  जामवंत     थे      भालू।

सोच     लिया  कुछ राह   निकालूँ।।

जो हनुमान     सिंधु     तर    जाएँ।

लंका पहुँच    सिया   सुधि   लाएँ।।


गुरु  होते   हैं    सब    ही  ज्ञानी।

जिनकी बात    शिष्य    ने   मानी।।

गुरु  का ज्ञान  सदा    सुख   दाता।

'शुभम्' शिष्य   नित  मोद  मनाता।।


शुभमस्तु !


21.12.2025● 7.15प०मा०

                  ●●●

कल का पता क्या? [ नवगीत ]

 762/2025   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कल कहाँ था

आज हूँ जिस ठौर

कल का पता क्या ?


पीछे घुमाकर दृष्टि

जब मैं देखता हूँ

दिखता जो बीता

हाथ डाला 

जिस घड़े में

निपट रीता

साथ मैं

जिनके चला

उनका पता क्या ?


आँधियों तूफान ने

सुदृढ़ बनाया

जो खड़ा हूँ

पतन ने

ऊपर चढ़ाया

गिरि पर चढ़ा हूँ

आरोह अवरोहण

लगा रहता नियति में

भविष्यत का पता क्या?


जन्म देकर नाविकों ने

मुझे पाला

जनक - जननी थे हमारे

राह का दीपक दिखाया

ज्योति भर दी

तम रहा तट के  किनारे

क्या पता कब तक चलेगा

कारवाँ ये

उस कारवाँ की नियति का भी पता क्या?


शुभमस्तु !


21.12.2025● 4.45प०मा०

                    ●●●

रास्ते सीधे कभी होते नहीं हैं [ नवगीत ]

 761/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रास्ते

सीधे कभी

होते नहीं हैं।


आज तक

जितना चला

सीधा न कोई

कंकड़ों -

पत्थर भरे

इकसार कोई

मोड़ भी

जितने पड़े

सीधे नहीं हैं।


राह में

अपनी बनानी

राह पड़ती

अवरोधकों 

के बिना 

गाड़ी न बढ़ती

हार के बिन

हम कभी

जीते नहीं हैं।


ये न समझो

ली छलाँगें

और आए

चढ़ लिए

सोपान तब

यह शृंग पाए

उलझनों के

दिन कभी

बीते नहीं हैं।


शुभमस्तु !


21.12.2025●1.45प०मा०

               ●●●

झरबेरियों से बेर तो [ नवगीत ]

 760/2025


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


झरबेरियों से

बेर तो 

तोड़े हैं हमने।


अँगुलियों

कपड़ों में 

जब काँटा चुभा है

स्वाद 

खटमिट्ठा

अभी रसना खुभा है

गुलकांकरी के

लाल फल

छोड़े न हमने।


पाँव नंगे

जंगलों में

गोंद ढूँढ़ा

खोल सरकंडे

उड़ाया है

जमूड़ा

जंगली फल

डाल से 

जोड़े हैं हमने।


झाड़ में

जाकर

करीलों में हमीं ने

टेटियाँ तोड़ीं

भरी 

झोलीं  सभी  ने

बाग में जा

आम्र फल

फोड़े हैं हमने।


शुभमस्तु !


21.12.2025●1.00प०मा०

                 ●●●

घड़ी भर में क्या चरित देखने पाओ [ नवगीत ]



759/2025




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


घण्टा मिनट

घड़ी भर में क्या

चरित देखने पाओ।


चरित नहीं है

इत्र सुगंधित

उड़ता फिरे हवा में

चरित नहीं है

च्यवनप्राश भी

करता काम दवा में

लड़की

चला फिरा कर देखी

चाल चला गुण गाओ।


नारी-पुरुष

चरित के भीतर

नित्य नया रँग बदले

साँस आखिरी भी

चलती हो

साफ़ न हो मन गदले

गोरी चिकनी

खाल देखकर

दुलहिन चुन लें आओ।


अभिनयबाज

नारि-नर दोनों

समझो उभय पहेली

अतिशयोक्तियां

बूझ न पाओ

भूली भुवन  हवेली

चुन लो

या मत चुनो

किंतु आजीवन साथ निभाओ।


शुभमस्तु !


21.12.2025 ●12.15 प०मा०

                  ●●●

[1:05 pm, 21/12/2025] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

स्वाद का रिश्ता पुराना [ नवगीत ]

 758/2025


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संग सेहत के

जुड़ा है

स्वाद का  रिश्ता पुराना।


देह से ही

रंग सारे

हाथ दो जोड़े खड़े हैं

जीभ के

सम्बंध प्यारे

षटरसों से ही जुड़े हैं

देह हो

सुंदर सजीली

चाहती क्या- क्या चुराना।


देख लेतीं

आँख दो-दो

जो न कोई देख पाए

कान भी

सुनते वही सब

जो नहीं संदेश लाए

पाँव जाते हैं

वहीं पर

था पड़ा तब कुनमुनाना।


आँत का सम्बंध

रसना से

जुड़ा,    जुड़ना जरूरी

कुलबुलाती

जोर से तब

जीभ क्यों रहती अधूरी

जो न भाए

देह को जब

देखते ही दुर्दुराना।


शुभमस्तु !


21.12.2025●11.30 आ०मा०

                    ●●●

ठंड पूस की [ नवगीत ]

 757/2025


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ठंड पूस की

गर्म चाय का

अपना अलग रुआब।


सुबह-सुबह

कप भाप छोड़ता

महका भूरी चाय

जलदी मुझे

लगा होठों से

ठंड लग रही हाय

सिप- सिप कर

पी धीरे -धीरे

तनिक नहीं दे ताब।


सँग में यदि हैं

गर्म पकौड़ी

फिर देखो क्या ठाठ

रहें सरकते

मुख ग्रीवा में

चार -चार भी आठ

ऊष्मा का

सर्जन भीतर हो

कोई नहीं लुकाव।


बड़े -बड़े

मसले तय होते

सजी चाय की मेज

खबरी आकर

सुना रहे हैं

खबर सनसनीखेज

जब तक चाय

महकती महफ़िल

चले चाय में नाव।


शुभमस्तु !


21.12.2025● 10.30 आ०मा०

                    ●●●

जब तक शांति न सब्र हो [ दोहा ]

 756/ 2025


 

     [घर,भवन,सदन,धाम,आवास]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में  एक

है  समान   सबकी  यही,एक कहानी जान।

माटी के चूल्हे मिलें, घर-घर  एक समान।।

दाल  बराबर    जानते ,घर  की   मुर्गी मित्र। 

यहाँ   वहाँ   सर्वत्र   ही, मिलते  यही चरित्र।।


भवन बने    बहुमंजिला,  रहते धनिक अनेक।

किंतु   नहीं  अनिवार्य   है,सब में मिले विवेक।।

भवन     बने   रह   जायँगे, जब  छूटेंगें प्राण।

रक्षा कर लो   धर्म   की ,हो सब ही  म्रियमाण।।


देह   सदन  है कर्म का, करें सदा शुभ काज।

एक दिवस उठना यही , सजा  शीश पर ताज।।

बना  सदन दृढ़  ईंट  से,  चमचम चमके   देह।

अमर   नहीं जग में  सदा, करे बिना नव   नेह।।


तीर्थ किए  बहु धाम  के, मिला नरक का धाम।

सत्य   कर्म  क्यों त्याग तू,हुआ जगत से वाम।।

देह - धाम सबसे  बड़ा, दिया  न उस पर ध्यान।

मानव    को   समझा  नहीं, रहा बाँटता ज्ञान।।


रहता   जिस आवास में, उसको सजा सँवार।

मत   औरों   के   गेह पर, कर पाहन की मार।।

वही सुखद आवास है,प्राप्त जहाँ सुख शांति।

रहना  उसमें   है वृथा,जहाँ   मिले नित क्लांति।।


                  एक में सब

सदन धाम आवास घर,भवन सभी बेकार।

जब तक शांति न सब्र हो,नर जीवन निस्सार।।


शुभमस्तु !


20.12.2025●10.15 प०मा०

                     ●●●

उड़न-कैमरा सिर के ऊपर [ नवगीत ]

 755/2025


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उड़न-कैमरा

सिर के ऊपर

सरर-सरर सर्राए।


कौन खा रहा

कितना क्या-क्या

इस पर नजरें डाले

बड़पेटू 

कैसे यों खुलकर

अपनी  प्लेट सजा ले

कहता कुछ भी

नहीं  किसी से

फर-फर-फर मंडराए।


चौकीदारी

करे बुफ़े की

गतिविधियाँ सब पाया

आया कौन

लिफ़ाफ़ा किसने

दिया न चुप्प सिधाया

जासूसी का

नव रूप आज ये

अपना रंग दिखाए।


बना प्रतिष्ठा का

शुभ सिंबल

झालर वन्दनवार तने

गड़बड़ करे

अगर कोई तो

प्रूफ ड्रोन के सेव बने

डिस्प्ले पर भी

दृश्य देख लो

जो मन चाहे खाए।


शुभमस्तु !


20.12.2025● 12.00मध्याह्न

                ●●●

ये बुफ़े की दावतें! [ नवगीत ]

 754/2025




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ये बुफे की

दावतें हैं

 या की अदावत।


भैंस गायों की 

तरह

नादें  भरी हैं

देखते ही

आँख होतीं

सब हरी हैं

आदमी के ही 

लिए या

बैल गायों की हैं बावत।


हो खड़े होकर

हो खाना

या न खाओ

पूछता कोई नहीं

भले

भूखे  विदा हो

कोई हाथी

अश्व हो

या हो महावत।


वक्त कम है

आदमी

जो बैठ जाए

चैन से

ले पालथी

भर पेट खाए

आ गई है

आज तो

 कैसी ये शामत!


दावतों का

दौर है

जिस ओर जाएँ

अच्छे भले हों

वस्त्र

जा भरपेट खाएँ

अनामंत्रित

हो भले

उसको भगा मत।


शुभमस्तु !


20.12.2025●11.15आ०मा०

                   ●●●

बैंड देखो बज रहे हैं! [ नवगीत ]

 753/2025


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पौष में भी

बैंड देखो

बज रहे हैं।


ब्याह पहले

पौष में

होते नहीं थे

शुभ मुहूरत

आज जैसे

तब कहीं थे ?

देख लो

दुलहे बराती

 सज रहे हैं।


आदमी के पास है

अब

अवधि थोड़ी

व्यर्थ में

खाली खड़ी क्यों

आज घोड़ी

इसलिए

मरजाद अपनी 

तज रहे हैं।


पार्लर 

खाली पड़े

कोई न आए

पंडितों से

ब्याह कोई

क्यों कराए

इसलिए

प्रभु नाम वे नित

भज रहे हैं।


शुभमस्तु !


20.12.2025●11.00आ०मा०

                    ●●●

प्रेरणा [ कुंडलिया ]

 752/2025


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

देता   है    जो    प्रेरणा,    सदा   हितैषी  एक।

अंधकार में   जो    रहे,   देता     उसे विवेक।।

देता   उसे    विवेक,  राह  सत की दिखलाए।

चले कुपथ जो व्यक्ति,  उसे  सन्मति  दे जाए।।

'शुभम्'   उसे   सम्मान,  सदा  ही करे प्रणेता।

वही   मित्र   है    इष्ट , प्रेरणा   सत   की देता।।


                           -2-

अपने  गुरु  की    प्रेरणा,  हितकारी  है मित्र।

बिना लोभ लालच करे,सिख का श्वेत चरित्र।।

सिख  का  श्वेत  चरित्र, राह का दीपक प्यारा।

गुरु   ही   होता   एक, जगत  में सबसे न्यारा।।

'शुभम्'  शिष्य   के हेतु,देखता  मनहर सपने।

नहीं अहितकर  केतु, कभी  गुरु  होते अपने।।


                         -3-

सबके    हितकारी  सदा,   मात-पिता   संमित्र।

देते   हैं   शुभ   प्रेरणा, ज्यों  प्रसरित  हो  इत्र।।

ज्यों  प्रसरित  हो इत्र, दूर तक मह- मह न्यारा।

अमर  दिव्य  वह   चित्र,  अन्य  कोई क्या प्यारा।।

'शुभम्'   न बदलें रूप, अटल हैं अपनी छवि के।

आजीवन   प्रभु   मान, पिता-माता   जो सबके।।


                         -4-

होता जिसमें  ज्योति का,उज्ज्वल दिव्य प्रकाश।

भानु    सदृश   देता   वही, प्रेरक    बना सुआश।।

प्रेरक   बना     सुआश,प्रेरणा   जब   रँग लाती।

होता   वहीं  उजास, कली   उर    की मुस्काती।।

'शुभम्'   न   देता   ध्यान,  वही आजीवन रोता।

मिले   जगत    में   मान,  लौह   से कंचन होता।।


                         -5-

 करना      सागर     पार था,  जामवंत के बोल।

बनकर हनुमत   प्रेरणा,   बने  अमिय  रस घोल।।

बने     अमिय   रस   घोल,शीघ्र जा पहुँचे लंका।

पकड़ी   गति     अनतोल,  बजाया   ऐसा डंका।।

'शुभम्'  राम  का  साथ, नहीं क्यों किससे  डरना।

चले   झुका   निज  माथ, पार  सागर था करना।।


शुभमस्तु !


18.12.2025● 8.45प०मा०

                      ●●●

प्रेरणा की ज्योति [ अतुकांतिका ]

 751/2025


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रेरणा की ज्योति ने

सोते हुए से

जब जगाया

संचार हुआ

नव चेतना का।


न कहीं तम रहा

न कोई भ्रम रहा

समय का भी सम रहा

पर सब कुछ हुआ है

अनकहा।


सोकर उठा जो आदमी

संचेतना है  लाज़मी

कल जो हुई थी ,आज भी

देती हुई नव ताजगी।


जीवनदायिनी है प्रेरणा

मिटती हुई हर वेदना

सुनते श्रवण अनुनाद-सा

ज्यों वेद का अनुवाद-सा।


यह प्रेरणा निर्मूल्य है

मिलती किरण अतुल्य है

होना ही हमें कृतज्ञ है

यह मनुज का कर्तव्य है

जीवन तभी तो भव्य है।


शुभमस्तु !


18.12.2025●7.30 प०मा०

                   ●●●

सावधान आदमी हुआ है [ नवगीत ]

 750/2025

 

     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आज आदमी की

चालों से 

सावधान आदमी हुआ है।


जनसेवा के

भगवा रँग के

नीचे कितना काला-काला

पैग लगा करते 

चंदे से

और साथ में गरम मसाला

समझ सको तो

समझो जन को

नारों के तल खुदा कुआ है।


हँसता हुआ

चित्र छप जाए

आने वाले अखबारों में

नाम सुर्खियों में 

हो अपना

सबसे श्रेष्ठ दिखूँ चारों में

दुनिया जाने

इस उत्सव की

बड़ी हमारी यही बुआ है।


नाक रगड़ता 

देवालय में

तिलक त्रिपुंड सजा माथे पर

मंचों पर 

चिंघाड़ रहे कवि

बदल-बदल कर अपने तेवर

माँग रहा

मैं बनूँ चैम्पियन

इष्टदेव से यही दुआ है।


शुभमस्तु !


18.12.2025 ●12.45प०मा०

                     ●●●

मौन हुए हैं घर -घर टीवी [ नवगीत ]

 749/2025


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मोबाइल की

चटुल चाल से

मौन हुए हैं घर-घर टीवी।


घर भर में

आवाज गूँजती

न्यूज़ कभी फिल्मी गानों की

विज्ञापन

साबुन मंजन के

खबरें कभी पुलिस थानों की

अब देखो

सब बिजी हुए हैं

घर के बालक भाभी बीवी।


हाथ-हाथ में 

मोबाइल है

हुआ आदमी हर परजीवी

नहीं उम्र का

बंधन कोई

बाँध न जाने संतति नीवी

हो मजदूर

धनिक या कोई

हिलती हो या धड़ से ग्रीवी।


स्वागत नहीं

अतिथि का होता

नहीं पूछता पीना पानी

अलग -अलग

खोए हैं घर में

बदल गई है सभी कहानी

सब्जी चाय जले

चूल्हे पर

महक रहा है जलता घी भी।


शुभमस्तु !


18.12.2025●11.45 आ०मा०

                    ●●●

भुनी शकरकंदी [ नवगीत ]

 748/2025


            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भुनी शकरकंदी

उपलों में

 महक रही है।


स्वाद अलग ही

शकरकंद का

किसे न भाए

जब नथुनों में

महक घुसे तो

रसना भर आए

घोल दूध में खीर बनाई

तबियत 

लहक रही है।


भुने हुए हैं

आलू ताजी

नमक मिर्च सँग खाए

भाप निकलती

गर्म-गर्म जब

जीभ जले ललचाए

उधर चाय की

भट्टी 

देखो दहक रही है।


नहा ताल में

टेढ़ामेढ़ा

हरा सिंघाड़ा

आलू के संग

ताल मिलाता

झंडा गाड़ा

धनिया 

हरी मिर्च की चटनी

चहक रही है।


शुभमस्तु !


17.12.2025● 4.45प०मा०

                   ●●●

हमें नियम से करना क्या? [ नवगीत ]

 747/2025


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

    


मंत्री जी हैं

पिता हमारे

हमें नियम से करना क्या ?


हम जो कर दें

नियम वही है

चुसने वाले आम नहीं

हम जो कह दें

उसे मानना

मानेंगे ना  उसे   कहीं ?

पुलिस काँपती

अधिकारी भी

हमें नियम से करना क्या?


हम हैं शासक

तुम जनता हो

मात्र पांव की जूती हो

सत्तासन पर

हमीं विराजे

निज ताकत क्या कूती हो

सुविधाएं

सब सरकारी हैं

हमें नियम से करना क्या?


आई ए एस पर

हुक्म हमारा

यों ही सरपट चलता है

इच्छा के

क्या बिना हमारी 

जन का सूरज ढलता है?

इच्छा ही

आदेश हमारा

हमें नियम से करना क्या ?


शुभमस्तु !


17.12.2025●3.00प०मा०

                  ●●●

कंबल ओढ़ाना लाज़मी [ नवगीत ]

 746/2025


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


घाम को

आराम का

कंबल ओढ़ाना लाज़मी।


शॉल लेकर

पौष आया

सिहरता-सा कोहरा

ओढ़ कर 

देखा  जभी मैं

सिहरता तन मोहरा

थरथराई

देह सारी

कंप रहा है आदमी।


ताम्रचूड़ी घोष से

आबाद हैं

गलियाँ कई

दे रहीं

अंडे  सुनहले

पत्नियाँ उनकी नई

आहार में 

जिनको उड़ाता

आदमी ये आलमी।


बाँधकर मफ़लर

उठे हैं

आज सूरज देवता

आदमी जा

घाम में ये

नव ऊष्मा को सेवता

सोचता है

रात में भी

घाम होती दायमी।


शुभमस्तु !


17.12.2025● 2.15 प०मा०

                    ●●●

बिना पढ़े ही [ नवगीत ]

 745/2025



          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बिना पढ़े  ही 

जीव-जंतु का

भर जाता है पेट।


यूनिवर्सिटी में

कब जाता

कोई गर्दभ मेष

डॉक्टरेट 

या मेडीकल की

शिक्षा करे न शेष

फिर भी

मालिक उसे खिलाता

भरे पेट का गेट।


नीयत का है

कुटिल आदमी

उसे चाहिए दाम

सोच रहा 

है शांति दाम में 

मिलना है आराम

एक राह सब

जाते -आते

भिक्षुक या हो सेट।


काम करे कम

दाम अधिक हो

यही मानवी नीति

नेतागीरी 

श्रेष्ठ सभी में

खड़ी 

द्रव्य की भीति

बढ़ी हुई है

इसीलिए तो

कमीशनों की रेट।


शुभमस्तु !


17.12.2025 ●1.00प०मा०

                   ●●●

कार हमारी सरकारी [ नवगीत ]

 744/2025


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चले 

कमीशन के पहियों पर

कार हमारी सरकारी।


पढ़कर 

बनते डिग्रीधारी

कहीं नौकरी करते

अधिकारी की

वैन चलाते

जी भर हुक्का भरते

बिना पढ़े

सब मिला हमें तो

नहीं बनेंगे दरबारी।


मिले काम के बदले

 हमको

दाम नहीं, भर-भर बोरे

सात नहीं

सत्रह पीढ़ी तक

मौज करें छोरी -छोरे

इधर सुना

वह पार उधर से

भले कहो तुम व्यभिचारी।


सच से 

कोसों दूर रहें हम

आसपास क्या कोई काम?

वैसे तो है 

दाम राम ही

फिर भी जपते सौ-सौ राम

नेता हैं तो

कभी विधायक

मंत्री भी बनते भारी।


शुभमस्तु !


17.12.2025●12.30 प०मा०

                  ●●●

जिंदगी की दौड़ [ नवगीत ]

 743/2025


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिंदगी की दौड़

इतनी

तेज कब थी ?


गति बढ़ी है

सौ गुनी

पर वक्त कम है

आदमी

इस मामले में

बे-शरम है

बैलगाड़ी ही 

भली थी

एक सम थी।


दृश्यता भी

शून्य है

गहरा कुहासा

दौड़ता है

आदमी 

क्यों बेतहासा

फट रही है

देह जैसे

एक बम थी।


देख सुन

ये हादसे

मन व्यथित भारी

दोष 

औरों पर मढ़ें

बढ़ती बिमारी

ढूंढ़ते हैं

दुर्व्यवस्था

एक खम थी।


शुभमस्तु !


17.12.2025 ●12.00मध्याह्न


                 ●●●

जीवन की कहानी [ नवगीत ]

 742/2025



           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


वासना के

खेल में बरबाद

जीवन की कहानी।


माता-पिता का

पालना पोषण

सभी  को भूल जाना

देह सुख के

लोभ लालच में

किसी में फूल जाना

नष्ट कर

मर्यादता

पल में डुबानी।


नाक भी

अपनी न थी

कैसा बचाना

इश्क के दर स्वांग

शादी का रचाना

बाप की 

थोड़ी बची

वह भी कटानी।


वासना से

प्रेम होता

भिन्न कितना

एक बकरी

ऊँट से है

खिन्न जितना

शेष क्या अब

मूढ़ अन्धो

नव जवानी।


शुभमस्तु !


17.12.2025●11.45 आ०मा०

                  ●●●

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

नेह का संबल सहेजा [ गीत ]

 741/2025

     

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जनक ने

निज अंक में ले

नेह का संबल सहेजा।


आत्मा का

रूप संतति

आत्मवत ही पालना है

चाहता 

जैसा पिता जो

रूप में  वह ढालना है

भाव है 

मन में यही कुछ

सौंप दूँ सुत को कलेजा।


मैं उठाऊँ

कष्ट कितने

पुत्र की रक्षार्थ भारी

हो बड़ा

आगे बढ़े वह

कर्म की करता सवारी

कष्ट हो

मुझको भले ही

पुत्र का छीजे  न रेजा ।


निज पुत्र की

ये मुस्कराहट

शांति देती है हृदय को

बल मुझे 

मिलता अकूता

समझता

भावी उदय को

चाहता है

हर पिता यह

पुत्र सूरज -सा उगे जा।


शुभमस्तु !


16.12.2025● 8.15 आ०मा०

                   ●●●

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

शब्दों के वे बाज़ीगर [ गीत ]

 740/ 2025


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राजीनीति के

अटल  पुरोधा

शब्दों के वे बाजीगर ।


नया एक

अध्याय लिख दिया

सोया देश जगाने को

अटल बिहारी

बाजपेयी ने

सुस्ती सकल भगाने को

वाणी में तव

ओज उमड़ता

दुःखी बड़े बरबादी पर।


देशप्रेम जो

उमड़ा इतना

माना सब को अपना है

नहीं बसाई

निजी गृहस्थी

भारत के हित तपना है

समय नहीं था

समय लगाते

जो अपनी ही शादी पर।


जिसने सुना

एक भी भाषण

अथवा उनकी कविताई

अनुगामी 

हो गया उन्हीं का

जादू की महिमा छाई

रहे सादगी पूर्ण

सदा ही

नेह बरसता खादी पर।


भाव स्वदेशी का

मन में था

भारत हो अपने पर निर्भर

निर्मित करें

देश में अपना

और किसी पर क्यों जाते मर

चिंतित हुए

घटे जनसंख्या

अलख जगा आबादी पर।


शिक्षित हो

घर-घर की नारी

शिक्षित हर परिवार बने

नारी हो

सशक्त भारत की

रहें विश्व में सदा तने

जय जवान

विज्ञान सदा जय

जय किसान उमड़ी घर-घर।


शुभमस्तु !


15.12.2025 ●4.00प०मा०

                 ●●●

नेताहार नहीं है वन में [ गीतिका ]

 739/2025


      



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नेताहार    नहीं     है    वन   में।

सेंधमार   की   जनता-धन   में।।


पकड़   झुनझुना  बैठी   जनता,

छिपा  हुआ क्या   नेता-मन  में!


पौष-माघ की   तुहिन   बरसती,

कान  न सुनते कुछ  सन-सन में।


मिले  कमीशन  हो   विकास तब,

जान  पड़े   तब   ही  इस  तन में।


किरकिट   का   मैदान   देश    ये,

कौन  बढ़े  आगे    नित  रन   में।


नारे    बंद       न     होने     पाएँ,

भरना यही भाव    जन-जन   में।


'शुभम्'  बढ़े  सब नेता सब आगे,

देश  खड़ा    प्रभु    के  वंदन   में।


शुभमस्तु !


15.12.2025●2.00आ०मा०

                    ●●●

पकड़ झुनझुना बैठी जनता [ सजल ]

 738/2025


      

[समांत:अन।पदांत:में। मात्राभार:16. मात्रा पतन:शून्य]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नेताहार    नहीं     है    वन   में।

सेंधमार   की   जनता-धन   में।।


पकड़   झुनझुना  बैठी   जनता।

छिपा  हुआ क्या   नेता-मन  में!!


पौष-माघ की   तुहिन   बरसती।

कान  न सुनते कुछ  सन-सन में।।


मिले  कमीशन  हो   विकास तब।

जान  पड़े   तब   ही  इस  तन में।।


किरकिट   का   मैदान   देश    ये।

कौन  बढ़े  आगे    नित  रन   में।।


नारे    बंद       न     होने     पाएँ।

भरना यही भाव    जन-जन   में।।


'शुभम्'  बढ़े  सब नेता सब आगे।

देश  खड़ा    प्रभु    के  वंदन   में।।


शुभमस्तु !


15.12.2025●2.00आ०मा०

                    ●●●

फल [ चौपाई ]

 737/2025


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



मानव    कौन   मनुज   तन धरता।

फल की नहीं    कामना   करता।।

मन  में  एक   भाव    नित    जागे।

रहे       सुफल    पाने    में   आगे।।


योगीश्वर         श्रीकृष्ण        हमारे।

उपदेशक    गीता     के        न्यारे।।

कर्म   करे फल   तुझे     मिलेगा।

छोड़  कामना     सुमन    खिलेगा।।


जिसने   भू  पर   विटप    लगाया।

बढ़ा  विटप  बहु सुमन  खिलाया।।

परिश्रम का  फल खूब    मिलेगा।

सौरभ   महके    सुमन    खिलेगा।।


चाकू  का  फल   बहु  उपयोगी।

काटे    फल    सब्जी   वह भोगी।।

हिंसक   वार     वही    कर  देता।

प्राण    जीव    के    हर वह लेता।।


मात - पिता     हैं      वृक्ष    हमारे।

जिनके  फल हम   संतति   प्यारे।।

कर्मों  में       अधिकार      तुम्हारा।

वहीं     बहे    गङ्गा      की    धारा।।


पका  हुआ  फल    बीज  बनाता।

पादप    नए  जगत     में    लाता।।

सघन   बाग  फिर     से    लहराए।

महके     कुंज       मधुर  मुस्काए।।


'शुभम्'  कर्म    अधिकार   तुम्हारा।

फल  देते    प्रभु    तुमको   प्यारा।।

फल  से ध्यान   हटा    जो    लेता।

व्यक्ति     वही     है   जग में  चेता।।


शुभमस्तु !


14.12.2025● 8.30 प०मा०

                   ●●●

रविवार, 14 दिसंबर 2025

झुनझुना [ व्यंग्य ]

 736/2025 


 

 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 झुनझुना पकड़ा के,पल्ला झाड़ लेते हैं।

 देश के नेता ज़मीं में गाड़ देते हैं।। 

 आदमी का झुनझुने से परिचय कोई नया नहीं है।शैशवावस्था से ही जब माता -पिता ने झुनझुना पकड़ाया तो उसे जानने पहचानने में कोई भूल नहीं हुई।समझदारी आने पर जब पहली बार हमें झुनझुना पकड़ाया गया, हमें तुरन्त याद आ गया कि मम्मी हमें रोने से चुप कराने के लिए झट से झुनझुना पकड़ा दिया करती थीं। झुनझुना तो हमारा संस्कार है।इससे हमारा पुराना नाता है,बड़ा प्यार है। यह तो हमारा पुराना लँगोटिया यार है।इसको जानने और पहचानने में भला भूल कैसे हो सकती है ! इसीने तो हमें रोते से चुपाया है, कितनी ही बार माँ ने हमें बहकाया है।जरूरत पड़ी तो बजाया है और हमें भी बजा के दिखाया है। इस झुनझुने ने ही हमारा ध्यान डायवर्ट किया है।इसे तो बचपन से ही हमने बड़ी अच्छी तरह जिया है। 

 अब इस समय यह फिर हमारे सामने मुखौटा लगाकर आ गया। हमारी मन और बुद्धि पर छा गया। चलो खैर ,फिर से इसके नए रूप को आजमाते हैं और बहुरूपियों के इस बहुरूपिया को क्यों सुहाते हैं। वस्तुतः यह झुनझुना कम धोखा ज्यादा है।अब बड़े होने पर भी ये हमें समझ रहा नादाँ है।ये समझता है कि इसकी झनझनाहट से हम अपने अस्तित्व और अस्मिता को भूल पाएँगे और अब भी इसकी भूलभुलैया में भूल जाएँगे। 

 झुनझुना पकड़ाने वालों में किस- किस के नाम गिनाएं। और किस -किस से दें इनकी उपमाएँ। इन पर तो लिखी जा सकती हैं,बड़ी -बड़ी कविताएँ।झुनझुना दाताओं में पूरी बारात की बारात है।इन सबकी एक ही मंशा है कि हमारे ऊपर इन्होंने लगाई हुई घात है।अधिकारी अपने कर्मचारी पर, व्यभिचारी किसी नारी पर,बेईमान ग्राहक ,बिचौलिया और कराधिकारी व्यापारी पर झुनझुने की घात लगा रहा है।नेता जनता को आश्वासन का झुनझुना थमा कर वोट बटोर रहा है।दलाल दोनों हाथों से पैसा टटोल रहा है।ये सभी झुनझुनेबाज हैं। झुनझुनों के सरताज हैं।एक दूसरे को बहका रहा है।अपने महलों को महका रहा है। 

 झुनझुना एक छल है,छद्म है।प्रापक के लिए सुमन पद्म है और दाता के लिए एक बलि के शीश पर रखा कदम है। ये मोबाइल कंपनियां कोई कम झुंझुनेबाज नहीं हैं। झुनझुना थमाने में कोई किसी से कम नहीं हैं।एक से एक बड़ी बाजी मार लेना ही इनका मक़सद है। झुनझुने में ही तो एजेंटों की रसद है। उपभोक्ता की किंचित सी मदद है। इसी बात का इनका एलान है अहद है।झुनझुने का एरिया बड़ा ही वृहद है।भले ही उपभोक्ता का नहीं इतना बड़ा कद है।अमीर पर कोई फर्क नहीं पड़ता और झुनझुने के बोझ तले गरीब निपट जाता है।पर इससे उन्हें क्या ? वे झुनझुने बजाकर लुभाए जा रही हैं।अपना -अपना इतिहास बनाये जा रही हैं। 

 आदमी जन्म से झुनाझुना प्रेमी तो था ही, अब उसे झुनझुना जीवी बना दिया गया है।बिना झुनझुना पाए वह बहलता ही नहीं,उसका स्टेटस बदलता ही नहीं। झुनझुना के नाम पर उससे कुछ भी करवा लो, वह अहर्निश तैयार है।झुनझुना उसकी दाढ़ से ही नहीं लगा,उसकी दाढ़ी में भी उलझ गया है।अब झुनझुना आदमी की आवश्यकता ही नहीं,अनिवार्यता है। यह एक जरिया भी उसके सुधार का है।भला कौन है जो सुधरना नहीं चाहता।यदि सुधार इसी से होना हो तो हो ले।फिर क्यों देखेगा वह पैरों में पड़े फफोले।इसके लिए उसे तेज दौड़ना पड़े या चाल रहे हौले -हौले। पर उसे चमकाने हैं विकास के नभ में गोले। टीवी, अखबार ,विज्ञापन, सोशल मीडिया सभी पर झुनझुनों की भरमार है। झुनझुना ही तो आज भगवान का अवतार है। इसीलिए भिखारियों से भी बड़ी लगी झुनाझुनों की कतार है।अब यह अलग बात है कि कोई गाए फाग या सावनी मल्हार है। अब फिर से क्या बताएँ झुनझुने से तो आदमी का बचपन का दुलार है। वह उसका एकमात्र लँगोटिया यार है। 

 शुभमस्तु ! 

 14.12.2025●4.30 प0मा0 

 ●●●

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...