मंगलवार, 7 जून 2022

श्रम -जल-मुक्ता सिक्त ललाट 🌾 [ नवगीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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श्रम -साधिका 

शीश धर ऐंडुर

अधरों में मुस्कान,

श्रम-जल-मुक्ता सिक्त ललाट।


सिर पर घर का

बोझ उठाए,

करने में श्रम

क्यों शरमाए!

गाती  घर  लोरी,

आँचल में छोरी,

लचपच हिलती है खाट।


चेहरा भर -भर 

चू   रहा   पसीना, 

घर के दुख - दर्द 

नित्य    ही  पीना,

जीने  की इच्छा,

ले रही   परीक्षा,

ईंट- भट्ठे में  घर -  घाट।


मन स्वच्छ देह

नित ही श्रम से चूर,

थकती न कभी

मन में प्रसन्न भरपूर,

जाने न ऊब,

ज्यों हरी दूब,

देखी पानी - पूरी कब चाट?


लवणीय स्वेद से

होता    तन - स्नान,

तजकर चलती गेह

देखती बाहर भव्य विहान!

सदा उर में उत्साह,

न    भरती    आह,

स्वेद  ही  निर्धनता  की काट।


🪴 शुभमस्तु !


०७ जून २०२२◆८.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


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