मंगलवार, 12 जुलाई 2022

देह को न रंग मीत 🍑 [ छंद :चंचला ]


छंद विधान:

1.रगण जगण रगण जगण

212    121   212  121

रगण  +लघु 

212     1  = 16 वर्ण

2.चार चरण समतुकांत।

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

देश प्रेम को जगा न जाति भेद  में मलीन।

रंच मात्र राग द्वेष के न हो कभी  अधीन।।

पेट  पालते  हुए  बनें न ढोर कीर     मीन।

जाग! जाग!!जीव मूढ़ चेत हो बनें प्रवीन।।


                         -2-

देह को न रंग मीत रंग चित्त का   सु- गेह।

गेह हाड़ माँस में न लीन हो बने    विदेह।।

शेष  कर्म के  सभी अधीन त्याग रे  सनेह।

योनि एक ही नहीं मिले सदा न   देह  खेह।।


                         -3-

आज, आज भी नहीं रहा न देख मीत मीन।

एक-एक से मिला बना सकाम तीन-तीन।।

भूलना  न देश  धर्म  भूलना  न  हो मलीन।

कौन जो मरा न हो सदंभ प्राण से न हीन।।


                         -4-

जानता न  कौन है सुकर्म का जले  सुदीप।

स्वाति बूँद जो गिरे सजे सु रासना सुसीप।

पुण्य  के  प्रताप  से बने हुए यहाँ   महीप।

आज के बिना अतीत है हुआ सदा प्रतीप।।


                         -5-

रीति नीति  प्रीति  का प्रभाव है  बड़ा महीन।

योनि-योनि जीव में भरे सु अंश  छीन पीन।।

काल  से बचे  नहीं महीप, वीर,  दीन- हीन।

फूल  के  स्वरूप के  सुगंध, रंग, रूप  तीन।।


🪴शुभमस्तु !


१२.०७.२०२२◆ ७.३० पतनम मार्तण्डस्य।

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