शनिवार, 31 जनवरी 2026

उल्लू बनाम अनुल्लू! [ अतुकांतिका ]

 059/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अनुल्लूओं की सरकार

कुछ उल्लूओं के 

कंधों पर चलती है,

उल्लूओं को सीधा 

करना पड़ता है, 

अन्यथा एक उल्लू ही

गले के नीचे

नहीं सरकता है।


सभी उल्लू टेढ़े ही क्यों ?

यदि उल्लू टेढ़े न हों

तो जलेबी समझकर

सब कोई निगल जाए,

अंततः उल्लू का भी

मान है, 

उसका भी स्वाभिमान है।


उल्लू  जब चाहे 

लड़ बैठते हैं,

कारण अकारण 

यों ही ऐंठते हैं,

उनसे चाहे

 बाँस बल्लियाँ गड़वा लो

अथवा नारे लगवा लो

जरूरत पड़े तो

कहीं भी आग जलवा लो।


 ये  उल्लू बहुमुखी

प्रतिभासंपन्न हैं

ये भी इसी देश की

माँओं से उत्पन्न हैं,

इन उल्लूओं से ही 

सियासत धन्य है।


कभी सोचना भी मत

कि देश उल्लू विहीन हो,

देश का उल्लू

देश की माटी में विलीन हो,

उल्लू वही सर्वश्रेष्ठ

जो जितना बड़ा कमीन हो।


शाखें  हैं  तो उल्लू भी हैं

और हर शाख पर

उल्लू विराजमान है,

आखिर उल्लू भी तो

इंसान है,

वही तो उनका

चुनाव चिह्न है

उल्लूओं से यह देश

बना हुआ महान है।


उल्लू जिंदाबाद के

नारे लग रहे हैं,

अनुल्लू पर्दे में

मजे कर रहे हैं,

देखते हैं उल्लू

 किस करवट बैठता है,

हर उल्लू दूसरे पर

अनायास ऐंठता है।


शुभमस्तु ,


30.01.2026◆ 6.00आ०मा०

                 ◆◆◆

उल्लू सदैव टेढ़ा क्यों? [ व्यंग्य ]

 058/2026

 

          

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

विचारणीय प्रश्न यह है कि उल्लू सदैव टेढ़ा ही क्यों होता है,जिसे सीधा करने की आवश्यकता पड़ जाती है ? इसके उत्तर में इतना कहा जा सकता है कि कुछ चीजें जन्मजात टेढ़ी ही बनाई जाती हैं।जिन्हें आवश्यकतानुसार सीधा करना पड़ जाता है। अब हर उल्लू जलेबी तो नहीं हो सकता ,जिसे ऐसे ही उदरस्थ कर लिया जाए।उल्लू के हाथ पैर पंख अस्थियाँ आदि सभी टेढ़े होते होंगे इसलिए उसे सीधा करना पड़ता है। एक बात यह भी है कि उल्लूओं के बिना आदमी का काम भी नहीं चलता। सभी अक्लमंदों की सरकार कुछ उल्लूओं के आसरे चलती है। यदि दुनिया में उल्लू न हो तो कितनी बड़ी समस्या पैदा हो जाए!उल्लू व्यक्ति ,समाज और देश की अनिवार्य आवश्यकता हैं। ये कुछ प्रतिशत उल्लू ही हैं ,जिनके सिर पीठ और हाथों में हम सबके भविष्य का दारोमदार है। यदि परिवार समाज और देश में सभी अनुल्लू पैदा होने लगें तो कौन किसकी बात मानेगा ! वह तो बेचारा उल्लू ही है कि उसे थोड़ा सा अपनी ओर सीधा कर लो और अपना काम निकाल लो।यह अलग बात है कि काम निकल जाने के बाद उल्लू को दूध की मक्खी की तरह बाहर निकालकर फेंक दो।उल्लू कोई घी की मटकी में गिरी हुई मक्खी तो है नहीं कि घी छानकर या अँगुली की नोंक पर रखकर बाहर फेंक  दिया जाए और घी को पुनः इस्तेमाल में ले लिया जाए !

दिन के साथ रात का होना अनिवार्य है। अन्यथा दिन को कोई क्या समझेगा ! इसी प्रकार देश और समाज को चलाने के लिए उल्लुओं की परम आवश्यकता है। प्रयोगकर्ता को उल्लू सीधा करने की कला का विशेषज्ञ होना चाहिए। हर आदमी भी यह काम बखूबी नहीं कर सकता। उसे इसका हुनर जानना और सीखना पड़ता है। 'करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान' के अनुसार जब उल्लूओं से पाला पड़ता है तो हुनर भी आ ही जाता है।

उल्लू देश और समाज के व्यक्तित्व की रीढ़ हैं। ये वही हैं जिन्हें नेताओं ने झंडे- बैनर लगाने ,मंच सजाने,कुर्सियाँ लगाने,नारों को ऊँची से ऊँची आवाज में बुलंद करने,गड्ढे खोदने, टेंट तंबू में बम्बू गाड़ने, रातों रात पेंफलेट चस्पा करने आदि महत कार्यों में लगा दिया जाता है और वे  मद्यपान की एक बोतल में ही खुश ही नहीं होते ,उसके टैंक में आकंठ डूब-डूब जाते हैं।एक बार डूबे कि बस ,फिर उन्हें कुछ कहने और बताने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। वे अपना काम अच्छी तरह सँभाल लिए जाते हैं। इतना अवश्य है कि कोई उल्लू बस एक बार सीधा करना पड़ता है,उसे बार बार सीधा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अरे भाई !उल्लू तो बहुत ही संतोषी प्राणी है, बस एक बार उसकी समझ में उसका काम आ जाए ,फिर तो वह जिस समर्पण भाव से कार्य करता है,उतना तो कोई भक्त भी भगवान के साथ समर्पित नहीं होता।

देश के उल्लू समाज के कंधों पर देश का बहुत बड़ा भार है। जब कहीं कोई लड़ाई ,आगजनी,तोड़ फोड़,विद्रोह आदि की बात आती है तो देश के ये उल्लू ही सेना की हरावल बन कर आगे आते हैं। और उल्लूओं की फौज से जा जूझते हैं। और उधर उनका नायक गुप्त निर्देश देता हुआ मूँछों पर ताव देता हुआ श्रेय से बचता या श्रेय को ओढ़ता बिछाता दिखाई देता है। बुद्धिमान या अनुल्लू तभी प्रकाश में आते हैं,जब उनके गलों में  भारी भरकम माला पहनाई जाती हो। अन्यथा वे अपना चेहरा छिपाए हुए मुक्तहस्त मुस्कराते रहते हैं।  ऐसा कोई युग नहीं रहा,जब देश और समाज में उल्लू पैदा न हुए हों। गेहूँ के साथ भले ही घुन पिस जाता हो ,परंतु उल्लू इतने उल्लू भी नहीं होते कि सहजता से पिस जाएँ।उन्हें अपने मालिकों के लिए कितने बड़े-बड़े काम जो करने हैं। उल्लू ही इस देश का भविष्य हैं। उनका अपना एक सुनियोजित और सुनिश्चित एजेंडा है,जिसके तहत उन्हें सक्रिय रहना है।

उल्लूओं के सम्बंध में एक विशेष और महत्वपूर्ण बात यह भी है किजो  'महान'  स्त्री-पुरुष  उल्लू पालते हैं, वे भी किसी अन्य के उल्लू हो सकते हैं। भले ही उल्लू होना गौरव की बात न मानी जाती हो ,किन्तु हर उल्लू को अपने उल्लूत्व के गौरव का अभिमान होता है। कोई उल्लू अपने को उल्लू कहलवाना अथवा कहना कदापि पसंद नहीं करता। वह तो बस होता है। यह एक अंडरस्टूड तथ्य है। इन उल्लूओं की आंखें सामान्य उल्लूओं की तरह रात में भी नहीं खुलतीं। वे रात- दिन और बारहों मास बन्द ही रहती हैं। वे इन उल्लूओं के भी बाप के बाप हैं।उल्लू के सम्बंध में यह तथ्य भी ज्ञातव्य है कि उल्लू अपने को छोड़ सबको उल्लू समझता है।वह इसी भ्रम में जीवन बिता देता है कि मैंने सबको खूब उल्लू बनाया।

शुभमस्तु !

30.01.2026◆5.15आ०मा०

                   ◆◆◆

अभिमान [ कुंडलिया ]

 057/2026


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करता नर अभिमान जो,झुकता उसका शीश।

रहता  नहीं  विवेक  भी, करे  अन्य   से रीश।।

करे  अन्य  से  रीश,किसी  का   मान न जाने।

कहता  वही  अहीश,   खींचकर    लंबी ताने।।

'शुभम्'   निरंकुश मूढ़,  वनैला पशु ज्यों चरता।

अभिमानी नर   क्रूर, नहीं   हित   कोई करता।।


                         -2-

मानव  जो अभिमान में, हुआ मगन मदहोश।

नहीं मानता अन्य को, भरा  हुआ नित जोश।।

भरा हुआ  नित  जोश, बड़ों  को मान न देता।

रिक्त   विवेकी   कोष, स्वार्थ  हित  अंडे सेता।।

'शुभम्'  कर्म   से  हीन, बना  कर्मों  से दानव।

मिली मनुज  की  देह, कौन कहता है मानव।।


                         -3-

मानव जो गुणहीन हो,फिर भी हो अभिमान।

सभी   जानते    हैं   उसे, वह अज्ञान वितान।।

वह    अज्ञान   वितान , हठी अविवेकी होता।

प्रेम  दया   से  हीन,   धर्म    का  सूखा सोता।।

'शुभम्'अशुभ का रूप,शून्य कर्मों का अनुभव।

धर्म   पड़ा  भव  कूप, नाम का  है वह मानव।।


                         -4-

करता  जो संगति  कभी, अभिमानी के साथ।

डूबे  वह  अभिमान    में, पकड़ आपका हाथ।।

पकड़  आपका  हाथ, पतन  का कारण होगा।

कभी   न    देता    साथ, बदलता केवल चोगा।।

'शुभम्'  सुलगती आग,आप  मरता  ही मरता।

उस नर   का   दुर्भाग, साथ उसका जो करता।।


                         -5-

रहता  नहीं    विवेक का,  जिस नर को संज्ञान।

भरा   हुआ उसमें   रहे, नित अकूत अभिमान।।

नित  अकूत  अभिमान, न जाने  ममता क्रोधी।

धर्म  कर्म  या  दान, मान  का  ज्ञान   न बोधी।।

'शुभम्' पिता की बात,कभी पल भर भी सहता।

करता   वह   आघात,   नहीं   सीमा   में रहता।।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆9.30प०मा०

                 ◆◆◆

दूरदर्शिता की बात [ अतुकांतिका ]

 056/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अपना उल्लू 

सीधा करने के लिए

कुछ उल्लुओं को

 लड़वाना भी

एक हुनर है,

राजनीति है,

यह बात 

सभी नहीं जानते

दूरदर्शिता की बात है।


कभी-कभी गलतियाँ

होतीं नहीं

की जाती हैं,

सबके दिमाग में

यह बात नहीं आती

ये वही समझते हैं

जो खुराफ़ाती हैं।


जमालो आग लगाकर

दूर खड़ी 

तमाशा देखती है,

जलती हुई आग पर

अपने हाथ सेंकती है,

इसे मूर्ख कैसे समझें !

सियासत सबके 

वश की बात नहीं मित्रो!


खुराफातियों को

देश में शांति नहीं भाती,

उठती हुई

आग की लपटें ही

उन्हें खूब ही सुहाती ,

नए के नाम पर

कुछ ऐसा करवा देना है

जिसे निज हित में

अपने अंडे ही सेना है,

समझदार के लिए

इशारा ही

बहुत होता है,

मालिक लिए है

हाथ में बड़ा-सा डंडा

भारी भरकम बोझ तो

ढोता ही  सदा खोता है।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆ 8.15 प०मा०

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आया है मधुमास [ सोरठा ]

 055/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आया  है मधुमास, कुहू-कुहू  कोयल    करे।

 कंदर्पी    अनुप्रास,    आम्रकुंज    में  गूँजते।।

  नर   कोयल     के  बोल, अमराई गुंजारती।

मादक मधुरस घोल,सजग  करें परिवेश को।।


नर  ही   करे जगार,  मादा  कोयल मौन है।

नर  से  सुंदर नार,इस   भ्रम  में  रहना नहीं।।

भ्रमर  उड़ें चहुँ  ओर,सरसों  फूली  खेत में।

नाच  रहे  वन मोर, कोयल    कूके  बाग में।।


नर मनमोहक   जान,  कोयल मानव  मोर  में। 

प्रभु का यही विधान, मेढक   भी नर ही फबे।।

पर वाणी   रसदार,   कोयल   काला रंग का।

करना प्रथम   विचार,  नहीं   रूप पर मोहिए।।


ठगे गए हैं काग, समझें  कोयल - कपट  को।

लिखा   यही    दुर्भाग,  सेते   अंडे   छद्म से।।

कोयल धरती मौन,  ऋतु   वसंत   आई नहीं।

वचन समझता कौन,असमय उचित न बोलना।।


रंग न जानें लोग,  अशुभ  सदा   काला नहीं।

मसधुरस भरे प्रयोग,कोयल  की  वाणी सुनें।।

नहीं देख रँग -रूप,प्रथम   आचरण जानिए।

है   माधुर्य  अनूप,कोयल  ज्यों  काली भले।।


भले एक   ही   रंग,  कोयल   कागा एक-से।

सुनते ही सब दंग,जब   खोलें   रसनांग को।।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆8.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

कुहू-कुहू कोयल करे [ दोहा ]

 054/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कुहू-कुहू   कोयल   करे,आया  है मधुमास।

आम्रकुंज   में    गूँजते,    कंदर्पी  अनुप्रास।।

अमराई  गुंजारती,   नर  कोयल   के बोल।

सजग करें परिवेश को,मादक मधुरस घोल।।


मादा   कोयल  मौन है,नर  ही   करे जगार।

इस भ्रम  में  रहना  नहीं, नर  से  सुंदर नार।।

सरसों  फूली खेत  में, भ्रमर  उड़ें चहुँ ओर।

कोयल   कूके  बाग  में, नाच  रहे  वन मोर।।


कोयल  मानव  मोर में,नर मनमोहक जान।

मेढक भी नर ही फबे,प्रभु का यही विधान।।

कोयल  काला  रंग का,  पर  वाणी रसदार।

नहीं रूप  पर  मोहिए,करना  प्रथम विचार।।


 समझें  कोयल-कपट को,ठगे गए हैं काग।

सेते  अंडे   छद्म  से,  लिखा   यही दुर्भाग।।

ऋतु वसंत  आई  नहीं,   कोयल   धरती मौन।

असमय उचित न बोलना,वचन समझता कौन।।


अशुभ सदा काला  नहीं,रंग  न जानें लोग।

कोयल की वाणी सुनें,  मधुरस  भरे प्रयोग।।

प्रथम  आचरण जानिए, नहीं  देख रँग-रूप।

कोयल   ज्यों  काली  भले,है   माधुर्य अनूप।।


कोयल  कागा  एक-से, भले  एक ही   रंग।

जब खोलें  रसनांग  को, सुनते  ही सब दंग।।


शुभमस्तु !


29.01.2026◆8.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

बचपन मेरे अभी न जाओ [ बालगीत ]

 053/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बचपन   मेरे  अभी    न  जाओ।

कुछ  दिन  मेरे  साथ   बिताओ।।


पुनः  नहीं       आवर्तन      होना।

मुझे    पड़ेगा     तुमको    खोना।। 

 आओ  सँग-सँग   खेलो    खाओ।

बचपन   मेरे   अभी   न    जाओ।।


कंचे      और     कबड्डी     खेलें।

चलो  उधर    हम   दंडें     पेलें।।

अपनी   धूनी    यहीं      रमाओ।

बचपन  मेरे  अभी  न    जाओ।।


वर्षा  हुई      भींग     लें   थोड़ा।

मस्त  घूम    लें     मोड़ी -मोड़ा।।

दूर  नहीं  तुम    हमसे    आओ।

बचपन  मेरे  अभी  न   जाओ।।


कागज   की हम    नाव   चलाएं।

जुगनू  पकड़ें    उन्हें     खिलाएं।।

छोड़  गज़ब हम   पर  मत ढाओ।

बचपन  मेरे   अभी    न   जाओ।।


बड़े  नहीं      है   हमको     होना।

नहीं   चाहते     तुमको     खोना।।

झंडा  ऊँचा    मिलकर      गाओ।

बचपन  मेरे   अभी   न    जाओ।।


शुभमस्तु ,


27.01.2026◆11.15 आ०मा०

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हम सबने झंडा फहराया [बालगीत]

 052/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संविधान    का  दिन   है   आया।

हम    सबने     झंडा   फहराया।।


तीन    रंग     का    झंडा   अपना।

पूरा   करता      हैं    हर    सपना।।

लहर - लहर    कर  वह  लहराया ।

हम   सबने     झंडा      फहराया।।


केसरिया    बलिदान       सिखाए।

श्वेत बीच       में    शांति   कराए।।

हरा      रंग     हरियाली      लाया।

हम     सबने     झंडा    फहराया।।


वीरों  ने      बलिदान    किया   है।

तब स्वतंत्र यह    हुआ   हिया  है।।

राष्ट्रगान मिलजुल    कर    गाया।।

हम    सबने       झंडा  फहराया।।


ध्वज   की    शान न    जाने    देंगे।

यद्यपि    हम    बलिदान    करेंगे।।

मिले  आम्र   तरुवर     की  छाया।

हम      सबने      झंडा  फहराया।।


आओ         भारतवासी     आओ।

देशभक्ति     के    गीत    सुनाओ।।

शुभ  स्वतंत्रता    का  दिन    पाया।

हम      सबने     झंडा    फहराया।।


शुभमस्तु,


27.01.2026🇮🇳 6.45 आ०मा०

भारत भाग्य तिरंगा [ गीत ]


051/2026


            

© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लाल किले पर

फर-फर फहरे

भारत भाग्य तिरंगा।


मान हमारा

शान देश की

हम सब पहरेदार

नहीं झुकेगा

कभी तिरंगा

हमको इससे प्यार

यमुना

 ब्रहपुत्र कावेरी

बहें नर्मदा गंगा।


है गणतंत्र

दिवस भारत का

संविधान का दिवस महान

अनुशासन में

बँधे  हुए हम

अपना  यही अनूप वितान

अन्न दूध

जल से पोषित जन

रहे न कोई नंगा।


केसरिया

बलिदान सिखाए

श्वेत शांति का वाहक

हरियाली 

नित ही बिखेरता

हरा धान्य धन ग्राहक

चक्र जागरण

करे अहर्निश

सदा रहे मन चंगा।


शुभमस्तु ,


27.01.2026🇮🇳6.15 आ०मा०

                  ◆◆◆

[6:48 am, 27/1/2026] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

गरिमामय गणतंत्र हमारा [ गीतिका ]

 050/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गरिमामय          गणतंत्र    हमारा।

बहती     यमुना-सुरसरि      धारा।।


फहराता   है        तरुण     तिरंगा,

सत्यमेव     का      गूँजे       नारा।


हिंदी         हिंदुस्तान         हमारे,

सूत्र      एकता    का   है    प्यारा।


षड्  ऋतुओं    के   रंग     बिखरते,

सूरज     सोम     करें    उजियारा।


डरे      नहीं     हम    संघर्षों     से,

नील    गगन    में   चमके    तारा।


बरसाते   मीठा     जल      बादल,

यद्यपि  जल सागर     का   खारा।


'शुभम्'  कभी   हम   धर्म न त्यागें,

सबने  मिल कर     देश    सँवारा।


शुभमस्तु ,

26.01.2026 ◆4.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

हिंदी हिंदुस्तान हमारे [ सजल ]

 049/2026


     

समांत          : आरा

पदांत           : अपदांत

मात्राभार       :16.

मात्रा पतन     :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गरिमामय          गणतंत्र    हमारा।

बहती     यमुना-सुरसरि      धारा।।


फहराता   है        तरुण     तिरंगा।

सत्यमेव     का      गूँजे       नारा।।


हिंदी         हिंदुस्तान         हमारे।

सूत्र      एकता    का   है    प्यारा।।


षड्  ऋतुओं    के   रंग     बिखरते।

सूरज     सोम     करें    उजियारा।।


डरे      नहीं     हम    संघर्षों     से।

नील    गगन    में   चमके    तारा।।


बरसाते   मीठा     जल      बादल।

यद्यपि  जल सागर     का   खारा।।


'शुभम्'  कभी   हम   धर्म न त्यागें।

सबने  मिल कर     देश    सँवारा।।


शुभमस्तु ,

26.01.2026 ◆4.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

शनिवार, 24 जनवरी 2026

सुख की खेती [ आलेख ]

 048/2026

               

©लेखक

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

यहाँ प्रत्येक नर -नारी सुख की खेती कर रहा है। सुख की फसलें उगा रहा है।उन फसलों पर सुख के फूल और फलों का लाभ उठाता हुआ आनंदित भी हो  रहा है।परंतु न जाने इन सुख की फसलों के बीच दुःखों के झाड़ -झंखाड़  कहाँ से और कैसे उग ही आते हैं। इसका पता उसे तब लगता है जब वे उसे कष्ट देने लगते हैं और सुख की फसलों के लिए बाधा बन जाते हैं। यदि इसके मूल में जाकर देखा जाए तो पता लगता है कि बिना बोए हुए झाड़-झंखाड़ों के ये बिरवे कहाँ से पनप गए। जिस प्रकार किसान के द्वारा बीज बोते समय कुछ ऐसे बीज उसकी दृष्टि को नजरंदाज करते हुए आ ही जाते हैं,जिनकी छँटनी बारीकी से नहीं की गई होती है।परिणाम यह होता है कि वे फसल के साथ ही उगते और पनपते रहते हैं ।यदि समय रहते उन्हें काटकर विनष्ट नहीं किया जाता तो वे किसान और मूल फसल के लिए भी घातक बन जाते हैं।स्वामी की लापरवाही और दूरदृष्टि का अभाव उसकी फसल को चौपट करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ता।

ऐसी स्थिति में क्या करणीय है?यह एक जटिल प्रश्न बनकर उभरता है। इसके समाधान के लिए प्रथमतः तो यह आवश्यक है कि स्वामी में पूर्व नियोजन की क्षमता होनी चाहिए। उसमें दूरदर्शिता होनी चाहिए। पूर्व नियोजन और उसकी दूरदर्शिता का अभाव उसकी फसल को चौपट कर देता है। केवल पैसा ही सब कुछ नहीं है। जहाँ पैसा काम नहीं आता,वहाँ उसका मष्तिकीय नियोजन अधिक उपयोगी सिद्ध होता है।एक अनुभवी कृषक या स्वामी इस प्रकार की असावधानियाँ  नहीं करता। और उसकी फसल में कम से कम झाड़- झंखाड़ उगते हैं,जिनके विनष्टीकरण का उपाय भी वह सहज ही कर सकता है।

मानव जीवन में सुख के साथ दुःख भी अनिवार्य हैं। इन दोनों का समन्वित नाम ही जीवन है। अब बात मात्र इतनी है कि इन दुःख के काँटों का निराकरण कौन किस प्रकार करता है।प्रत्येक व्यक्ति की जीवन जीने और कार्य करने की शैली अलग-अलग प्रकार की होती है। इस शैली की नकल नहीं की जा सकती। प्रत्येक व्यक्ति की स्थितियाँ और परिस्थितियां अलग- अलग होती हैं।ऐसी स्थिति में सबका जीवन भी अलग -अलग प्रकार से चलता है। यह अनुकरणीय नहीं है।इसमें उसकी परिवारिक आर्थिक सामाजिक भौगोलिक और पारिस्थितिक स्थितियाँ बदलती रहती हैं,जो उसकी सुख की खेती को प्रभावित करती हैं। बिना किसी पूर्व योजना और दूरंदेशी के सब काम खराब हो जाता है। लोग समझते हैं कि उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है, इसलिए उनका कुछ भी अशुभ नहीं हो सकता। यह उनके चिंतन की एक बहुत बड़ी भूल है।पैसा एक साधन हो सकता है,भगवान नहीं हो सकता। किसी कार्य की सफलता के लिए बुद्धि चातुर्य भी अनिवार्य है।जो सबके पास नहीं होता। प्रायः धनिक लोग समझते हैं कि वे बुद्धि के भगवान हैं,उन्हें कहीं कोई रुकावट नहीं आ सकती। यह उनकी सबसे बड़ी भूल है।

आदमी जल्दी से जल्दी धनी बनना चाहता है। और इस प्रयास में वह अपने चारों ओर मकड़ी का ऐसा जाल बना लेता है,जिसमें वह स्वयं ही उलटा टंग जाता है।कार्याधिक्य भी फसल में झंखाड़ों को उगने के लिए आमंत्रण है। इसके लिए व्यवस्थित प्रबंधन का होना अति अनिवार्य है। यदि समुचित प्रबंधन नहीं तो किसी छोटे से छोटे कार्य में सफलता मिलना भी संदिग्ध है।

पशु हो या पक्षी, कीट पतंगा हो या मनुष्य :सभी सुखाकांक्षी हैं।सबके सुख अलग- अलग प्रकार के हैं।अपनी ही सीमा का अतिक्रमण भी दुःखों को आहूत करने के समान है। 'जब आवे संतोष धन ,सब धन धूरि समान ' -कथन के अनुसार किसी सुख की कोई सीमा नहीं है। जब फसल उगेगी तो खर पतवार उगना भी अनिवार्य है। बस उनका निस्तारण कैसे करना है;यह सीखना भी जरूरी है।अगर यह नहीं आया तो एक दिन पूरे खेत में खर पतवार और झाड़ -झंखाड़ ही

खड़े मिलेंगे,फसल तो उजड़ ही जाएगी। वनैले जानवरों और चिड़ियों से सुरक्षा भी खेत स्वामी का दायित्व है।इसको  नजरंदाज नहीं किया जा सकता।खूब सुख की फसल लगाइए ,किन्तु उसका समुचित नियोजन और श्रेष्ठ प्रबंधन भी उसकी सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। बया पक्षी अपने श्रेष्ठ प्रबंधन और श्रम से अपने सुंदर और सुडौल नीड़ में निवास करता है और कौवा इतना कुशल प्रबंधन अनिभिज्ञ है कि सही घोंसला भी नहीं बना पाता ,तो उस प्रकार से सूखी जीवन जिएगा भी तो कैसे !आदमी को भी बया पक्षी की तरह नियोजक और कुशल प्रबंधक होना चाहिए । फिर देखिए उसकी खेती में झाड़ -झंखाड़ कैसे फसल को बरबाद करते हैं ?

शुभमस्तु ,

24.01.2026◆12.00 मध्याह्न

                ◆◆◆

जीवन है अनमोल [ कुंडलिया ]

 047/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

मानव  तन अनमोल  है,रखना  इसका ध्यान।

पुष्ट  रखें हर   अंग  को,चंद्रहास   ज्यों म्यान।।

चंद्रहास   ज्यों    म्यान,देह   के  अंग सँजोएँ।

ऑंख नाक  मुख दंत,नित्य सद जल से धोएँ।।

'शुभम्'  करें मत पान,सुरा का बनकर दानव।

तन   जीवन   की  खान,सहेजे ही  हर मानव।।


                         -2-

मानव जीवन  धन्य  है,मिला  तुम्हें नर गात।

सदा समझ अनमोल ये, तुच्छ नहीं ये बात।।

तुच्छ नहीं  ये बात, इतर  पशु खग से न्यारा।

नहीं कीट या भेक, नहीं  सरिता की   धारा।।

'शुभम्' लगा  ले बाँध,नहीं  रहना बन दानव।

प्रतिपल    इसे  सँवार, बने  रहना है मानव।।


                         -3-

अपना  चरित   सँवारिये,चरित बड़ा  अनमोल।

बद  करनी   इस  देह   की,देती  है  विष घोल।।

देती    है  विष    घोल,  दाग  जीवन  में लगता।

मिले  जहाँ  भी  पोल,  वहाँ सद्गुण कब उगता।।

'शुभम्' चरित ही सत्य, न  समझें इसको सपना।

समझ  मूढ़ नर तथ्य,कनक -सा जीवन अपना।।


                         -4-

मानव  जीवन   के लिए,ज्ञान   बड़ा अनमोल।

सभी  बड़ों  से   लीजिए,मिले जहाँ अनतोल।।

मिले   जहाँ  अनतोल,  विश्व शिक्षालय सारा।

पंच  तत्त्व  खग   वृक्ष,सभी   ने   ज्ञान सँवारा।

'शुभम्'  बने  सत पात्र,  नहीं करना कोरा रव।

मौन गगन   के  सूर्य,  चाँद   से  सीखे मानव।।


                         -5-

पानी    व्यर्थ  न   कीजिए, पानी  है अनमोल।

कम से कम  में काम   ले,बहा   नहीं अनतोल।।

बहा नहीं  अनतोल,  एक  दिन  प्यासा मरना।

नहीं   रहे  कुछ  हाथ,पड़े जब तुझे बिफरना।।

'शुभम्'   न   उगना  अन्न,  मरेगी   तेरी नानी।

बूँद - बूँद  अनमोल,अमिय  यह निर्मल पानी।।


शुभमस्तु !


23.01.2026◆9.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

जिह्वाएँ नर-मादा होतीं! [ नवगीत ]

 046/2026


          

 ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिह्वाएँ 

नर-मादा होतीं

यह इतिहासी तथ्य नहीं है।


घर के अंदर

बाहर देखो

अद्भुत दिखें नमूने हैं

जीभ नहीं

रुकती नारी की

उठते बड़े   बगूले  हैं

अवसर पाकर

पुरुष बोलता

बात सत्य यह सभी कहीं है।


गतिरोधक 

मादा जिह्वा का

भूल गया नारी निर्माता

नॉन स्टॉप ही

चलना उसको

बता गए हैं विश्व विधाता

रोना-गाना

मिला साथ में

युद्धों की पटभूमि यहीं है।


स्वतः चलित

चुम्बक फिट मुख में

ब्रेक नहीं गतिरोध नहीं

कितना कुछ भी

कहे जीभ से

बदकथनी  का बोध नहीं

आँसू का हथियार 

न रुकता

पुरुषों के मुख जमा दही है।


शुभमस्तु !


22.01.2026◆3.00प०मा०

                 ◆◆◆

उत्तरी ध्रुव दक्षिणी ध्रुव [ अतुकांतिका ]

 045/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्


उनकी जुबान में

कोई और ही

मशीन लगी है, 

चलते -चलते

थकती ही नहीं है,

कभी भी 

दो महिलाएँ

चुप नहीं बैठ सकतीं,

यह प्राकृतिक चमत्कार है

बिना रेगुलेटर के

पंखे की तरह स्वतंत्र।


कितना स्वार्थी है

ये 'पुरुष'  नामक जीव

बिना मतलब के

नहीं बोलता,

चार आदमी

अपरिचित बैठे हों

उनकी जीभ का

कोना भी नहीं हिलता,

पता नहीं 

इस अनायास

 मौन धारण में

उन्हें क्या मिलता,

सही कहा है:

सदैव सदा 

'सद्गुण' का फूल

सर्वत्र नहीं खिलता,

बिना ऑन ऑफ का

टीवी सबको नहीं मिलता।


और कुछ नहीं तो

चुगलियाँ ही सही,

सास ने दूसरी सास से

बहू ने मोहल्ले की

दूसरी बहू से कही,

सबसे रसदार है 

ये  चुगली-चर्चा

दो कौड़ी का भी

इसमें लगता नहीं खर्चा,

रस ही रस है यहाँ

किसी को 

लगती नहीं मिर्चा।


कुदरत ने 

दो विरोधाभासों को

मिलाया है,

पहले तो थे वे दोनों दोपाये

अब चौपाया बनाया है।


इतिहास गवाह है कि

आज तक किसी को

अच्छी बहू नहीं मिली,

और किसी भी बहू को

सास भली नहीं मिली,

और ये पुरुष भी

अजीब है कि

कभी सास बहुओं की

चर्चा तक नहीं करता,

बुराई तो क्या 

खाकर करेगा !

करेगा भी तो 

अपने किए का भरेगा।


इधर उत्तरी ध्रुव है

तो उधर दक्षिणी ध्रुव,

दोनों मिलते हैं

पर अपने ही ढंग से,

बाद में

उत्तर उत्तर 

और दक्षिण दक्षिण

एक उत्तर तो

एक सदा ही प्रश्न,

प्रतिप्रश्न,

पर कीजिए भी क्या

किए हुए हैं

परस्पर संलग्न।


शुभमस्तु !


22.01.2026◆2.15प०मा०

                ◆◆◆

अंबर नीला सागर नीला [ नवगीत ]

 044/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अंबर नीला

सागर नीला

धरा धरातल धूसर-धूसर।


नीले ने

व्यापकता बो दी

सारा जगत समाया है

दृष्टि पड़े जो

दृग अंचल की

तृप्त भाव भर आया है

भू पर 

हरे पेड़ लतिकाएँ

कहीं पड़े हैं सूखे ऊसर।


अंबर मौन

मौन ही सागर

कभी-कभी करता गर्जन

मौन पड़ी

सहती सब धरती

कभी नहीं करती वर्जन

सहनशीलता की

वह शिक्षक

और नहीं ऐसा दूसर।


रंग-रंग के

दृश्य धरा पर

नील गगन में शशि तारे

दिनकर करे

उजाला दिन में

जाग्रति के  गूँजें  नारे

सागर के तल में

मुक्तामणि

चमक बिखेरें निज ऊजर।


शुभमस्तु !


22.01.2026◆11.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

मादक मृदुल बहार [ सोरठा ]

 043/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आने      लगी   बहार,पौष-माघ   जाने   लगे।

 कोमल     रश्मि   उदार,  सूर्यदेव बरसा रहे।।

कोयल के मधु  बोल, खिलतीं  कलियाँ बाग   में।

 रँगरलियां    रस   घोल,   बरसें   नई बहार की।।


  मादक मृदुल बहार, सरसों   फूली  खेत    में।

 सुमन    स्रवित  रसदार,भ्रमरावलि गुंजारती।।

नव    पाटल     के  फूल, क्यारी  में गेंदा खिले।

कलियाँ शाख  बबूल, खिलतीं नवल बहार की।।


 यौवन    एक   बहार,  मानव   जीवन के लिए।

खुलें  प्रगति  के द्वार, उर में  खिलते फूल - से।।

उठता   उर उल्लास, जब   बहार   हैं झूमतीं।

चमके  नवल    उजास,जीवन   में  आंनद  हो।।


ज्यों कोकिल के बोल,  निर्मल  विरुद बहार का।

तन -मन में   रस  घोल,  कुहू - कुहू अंतर करे।।

आती    सघन   बहार,   षोडशियों  की   देह में।

बहे   रसों   की   धार,  अंग- अंग    नित झूमता।।


कलियाँ   करें  पुकार,   आता  है मधुमास जब।

भरती   विमल  बहार,कण- कण में नव   चेतना।

टर्र -टर्र      उच्चार, पावस   ऋतु  जब आ   गई।

छाने लगी बहार,    करते    मेढक   ताल   में।।


वन-वन    फूले   ढाक,  फागुन   की रंगीनियाँ।

भ्रमर   रहे    हैं ताक,  है बहार - गरिमा बड़ी ।।


शुभमस्तु !


21.01.2026◆ 7.15 प०मा०

                   ◆◆◆

आने लगी बहार [ दोहा ]

 042/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पौष-माघ      जाने     लगे, आने  लगी बहार।

सूर्य  देव   बरसा    रहे, कोमल   रश्मि उदार।।

खिलतीं कलियाँ बाग में,कोयल के मधु   बोल।

बरसें   नई  बहार   की, रँगरलियां    रस घोल।।


सरसों   फूली   खेत  में,  मादक   मृदुल बहार।

भ्रमरावलि   गुंजारती,   सुमन    स्रवित रसदार।।

क्यारी   में  गेंदा    खिले, नव  पाटल  के  फूल।

खिलतीं  नवल बहार की,कलियाँ शाख  बबूल।।


मानव   जीवन   के    लिए, यौवन  एक बहार।

उर में  खिलते   फूल-से,खुलें  प्रगति  के  द्वार।।

जब   बहार   हैं   झूमतीं,  उठता  उर उल्लास।

जीवन  में  आनंद   हो, चमके   नवल उजास।।


निर्मल विरुद  बहार का, ज्यों कोकिल  के  बोल।

कुहू-कुहू   अंतर  करे,  तन-मन  में   रस घोल।।

षोडशियों    की   देह में,  आती  सघन बहार।

अंग-अंग    नित  झूमता, बहे  रसों की धार।।


आता   है  मधुमास जब, कलियाँ  करें पुकार।

कण-कण में  नवचेतना,  भरती विमल बहार।।

पावस   ऋतु   जब  आ गई,  टर्र-टर्र  उच्चार।

करते  मेढक   ताल   में,  छाने   लगी बहार।।


फागुन   की  रंगीनियाँ, वन-वन  फूले ढाक।

हैं    बहार-गरिमा  बड़ी, भ्रमर  रहे  हैं ताक।।


शुभमस्तु !


21.01.2026◆7.15प०मा०

                  ◆◆◆

बुधवार, 21 जनवरी 2026

मेरी गुरु:मेरी दस अंगुलियाँ [ लेख ]

 041/2026


        

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

आज मुझे ज्ञात हुआ कि मैं तो दस-दस गुरुओं के पास हूँ। फिर भी ज्ञान का पिपासु हूँ। अंततः मैं क्यों उदास हूँ।देर आयद दुरुस्त आयद; यदि सुबह के भूले को साँझ तक भी अपना घर मिल जाए ,तो वह भूला नहीं कहलाता। वैसी ही दशा कुछ मेरी भी हो रही है।मैं नित्य प्रति देखता हूँ कि मेरे दोनों हाथों में दस अंगुलियाँ हैं। ये अंगुलियाँ ही नहीं ,मेरी शिक्षक हैं, मेरी गुरु हैं । मैं उनका शिष्य हूँ,उनका भक्त हूँ ,उनमें अनुरक्त हूँ। इनके कार्यों और प्रेरणाओं की गहराई में जाता हूँ तो बहुत कुछ सीख पाता हूँ।इनकी सीख से मुझे बहुत बड़ा बल मिला है।परिवार और समाज में कैसे रहना चाहिए ,यह इन्हीं का दिया है।

हाथ की पाँचों अँगुलियों में सबका कद काठी अलग-अलग है। सबके अपने-अपने नाम हैं। नामों के अनुकूल उनके बंटे हुए काम हैं।किसी का किसी के प्रति कोई विरोधाभास नहीं है। जो वे करती हैं ,वह सदा सही है।इतिहास बताता है कि अंगुलियाँ आपस में कभी लड़ी नहीं हैं।सदा एकता और समता के मंत्र  का पाठ पढ़ाया है। उसी एकता के सूत्र में ये गात नहाया है। कहीं कोई छूत नहीं,कोई भेदभाव नहीं। कोई काम इनके लिए छोटा नहीं,बड़ा नहीं। हर समय हर काम करने के लिए सहर्ष तैयार।न कोई आलस्य न खुमार। संगठन हो तो इन अँगुलियों जैसा, जिन्हें नहीं चाहिए काम के बदले पैसा।

इन्हीं की कृपा और श्रम से उदर को भोजन मिलता है,इन्हीं  के संघर्ष से अशुचिता में फूल खिलता है। नित्य शौचालय में अशौच को शुद्ध बनाती हैं। फिर पानी आदि से स्वच्छ होकर उन्हीं हाथों से रुचिपूर्वक भोजन कराती हैं। दोनों परस्पर विरोधी कार्य बिना किसी झिझक के निबटाती हैं। एक कर्तव्य समझकर, एक धर्म समझकर, श्रम का मर्म समझकर। मानव के ऊपर इनका कितना बड़ा अहसान है।अँगुलियों के कर्म का तना कितना बड़ा वितान है।इनके ही हाथ में लेखनी है तो इनके वश में कृपाण हैं।इन्हीं के दोनों हाथ में लड्डू हैं तो इन्हीं में पिसान हैं ।यही कवि हैं,लेखक हैं,जवान हैं,किसान हैं। वास्तव में ये दस अंगुलियाँ कितनी महान हैं।

शीत ऋतु में जमे हुए घी को निकालना हो तो सबसे पहले तर्जनी अँगुली सामने आती है। वही टेड़ी  पड़ती है,तभी घी निकाल पाती हैं।यहाँ ऐसा नहीं है कि तू जा!,तू जा!! की रार ठनेगी ! तर्जनी को बरज छिगुली  की आ बनेगी।या कोई बड़ी से कहेगा कि तू जा ! तू तो बड़ी है। घी निकालने के लिए जैसे तू एक छड़ी है।किंतु नहीं, इस काम के लिए तर्जनी की अहम जरूरत आ पड़ी है ,तो अपना कार्य करने के लिए वही सहर्ष आगे आकर खड़ी है। माथे पर तिलक अँगूठा ही लगाता है,बड़ी से बड़ी अँगुली से यह कार्य नहीं करवाया जाता। भूले-भटके राही को रास्ता अँगूठा या अनामिका नहीं बताती,वहाँ भी सबसे पहले तर्जनी ही सामने आती। पड़ती है जब मुक्के की जरूरत तब सभी पाँचों एक हो जाती हैं और पंजे से घूँसा बन जाती हैं। इसे कहते हैं :संगठन,एकता ,समता और बड़प्पन। पाँच जब मिलती हैं तो हो जाती हैं छप्पन।अलग-अलगउद्भव अलग -अलग अंत, काम करती हैं ऐसे जैसे कोई संत।इनकी महिमा जितनी कही है,है ही वह अनंत।इसीलिए तो बारहों मास रहता है अँगुलियों में वसंत।

दोनों हाथों की ये अंगुलियाँ मेरी ही नहीं ,हर व्यक्ति और मानव मात्र की शिक्षक हैं,गुरु हैं,प्रेरणा हैं,दिग्दर्शक हैं, पथ प्रदर्शक हैं। बात इतनी सी है कि कोई इनके महत्त्व को समझे।इनसे प्रेरणा ग्रहण करे।इन्हीं में राष्ट्रीय एकता का मूल मंत्र छिपा हुआ है। छूत- पाक से इतर इनमें कहीं कोई दुर्भाव नहीं, सद्भाव ही सद्भाव है। मानव जीवन के लिए ये एक मिशाल हैं। यदि इनके पास भी कोई हृदय हो,तो वे हृदय से विशाल हैं।ये निर्विकार हैं,मानव देह का उपहार हैं।

शुभमस्तु !

21.01.2026◆1.30प०मा०

                  ◆●●

पाँच अंगुलियाँ हाथ-हाथ में [ नवगीत ]

 040/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पाँच अंगुलियाँ

हाथ-हाथ में

फिर भी मिलकर एक सभी।


अगर निकलना घृत

अँगुली से

जमा हुआ आसानी से

टेढ़ी पड़ती

सदा तर्जनी

नहीं कहें वे   कानी  से

मुक्के की

यदि पड़े जरूरत

मिल सब होतीं एक तभी।


यद्यपि सबके

काम बंटे हैं

फिर भी रहें अहं से दूर

समता नहीं

एकता छोड़ें

हेलमेल से हैं भरपूर

कोई आलस नहीं

एक पल

कहती हैं तैयार अभी।


माथे तिलक

अँगूठा करता

बड़ी बीच में खड़ी हुई

जकड़ पकड़

मजबूत पाँच की

निष्ठा से वे अड़ी हुई

असहयोग का

भाव न आता

पीछे मुड़तीं नहीं कभी।


शुभमस्तु !


21.01.2026◆10.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

नहा त्रिवेणी मैं आया [ गीत ]

 039/2025


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


माघ मास

शुभ कल्पवास में

नहा त्रिवेणी मैं  आया।


गंगाजल का 

वाष्प सुपावन

छाया  ऊपर अंबर में

धुँधलापन

नभ में छाया है

नहीं किया आडंबर मैं

जैसे ही

मैं दिनकर ऊपर

अपने को चढ़ता पाया।


धनु से 

मकर राशि में मेरा

हुआ संक्रमण जिस दिन से

संक्रांति कहलाती 

शुभता भरी हुई है छिन-छिन से

शीत और

कमतर अब होगा

मेरा धूपित रूप लुभाया।


सहन नहीं 

कर पाए धरती

रूप तेज से भरा हुआ

इसीलिए मैं

भानु दूध की 

चादर ओढ़े खड़ा हुआ

देखो कैसा

खग वृन्दों ने

स्वागत में नवगीत सुनाया।


शुभमस्तु !


20.01.2026◆ 7.45 आ०मा०

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सोमवार, 19 जनवरी 2026

मंचीय कवियों का स्विच [ व्यंग्य ]

 038/2026


      

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


'तो मेरे प्यारे श्रोताओ! जरा इतना तो बताओ कि आपको कौन सी रचना मैं सुनाऊँ और हँसते -हँसाते लोटम पोट कराऊँ ! श्रोताओं में से पीछे से एक आवाज आई : 'वही सुनाओ लहँगे वाली' तभी एक अन्य आवाज उभरी : 'नहीं ,पाजामे वाली सुनाओ।' अब श्रोताओं में लहंगे और पाजामे में जंग छिड़ गई और पाजामा हार गया और लहँगे की जीत हो गई।अब हँसोड़ कवि महाराज लहँगा सुना रहे हैं। पहले थोड़ा गुनगुना रहे हैं और अब तरन्नुम में आ रहे हैं। सभी श्रोता तालियाँ बजा रहे हैं।

ये हैं आजकल के  'अखिल भारतीय मंचीय कवि सम्मेलन' बनाम  'अखिल भारतीय लतीफा झेलन'। जैसे श्रोता वैसे ही कवि, तदनुसार बनी है उनकी छवि।जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे लहँगा का कवि। कवि अपने में शून्य है ,जीरो है;श्रोता जनता ही वास्तविक हीरो है। कवि का ओंन ऑफ का स्विच जनता के हाथों में है, वह जैसा चलाए, वैसे ही उसे चलना है, एक इंच भी इधर से उधर नहीं फिसलना है।कवि तो एक प्री एडिटेड टेप रिकॉर्डर है,बस उसे ऑन भर करना है और मन मर्जी का लतीफा सुनना है।यही तो उसकी कविता है।बीच बीच में कुछ रटे रटाये जुमलों से गुजरना है। 'इस शहर के श्रोता बहुत अच्छे हैं। ' 'आप बहुत अच्छा सुन रहे हैं।' 'आप बड़े ही अनुशासित हैं।' 'सभ्यता और संस्कृति के वाहक हैं।' 'मेरे जैसे अच्छे कवियों के गाहक हैं।'

किसी मंचीय कवि का स्विच कवि के पास नहीं है। वह श्रोताओं के पास है। वह जो कहेगा ,वही कविता मंच पर लहलहायेगी।कवि में तो कुछ खास- खास भरा हुआ है' ,जो  मंचआगमन के साथ हरा हुआ है। यह तो मंच आयोजक की 'हुआ' 'हुआ'  है कि आज वह यहाँ सबकी बड़ी बुआ है। बस दो चार  कवितानुमा चुटकुले उसकी जुबाँ पर जमे हैं,उन्हीं की डिमांड है, उसी से लिफाफे कमे हैं।तालियों के बिना उनकी जीभ लड़खड़ाती है ,इसलिए बीच बीच में तालियों की याद दिलाना भूल नहीं पाते हैं। तालियों से ही तो उनकी रगों में कविता दौड़ पाती है ,जो श्रोताओं की श्रवणेच्छा जगाती है।

मंचीय कवि को कविता लिखना और पढ़ना बहुत ज़्यादा नहीं सीखना। यह तो एक हुनर है,कला है, विशेष शैली है ;फिर तो सम्मेलनों में थैली ही थैली है। मंचीय कवि कोई लिक्खाड़ कवि नहीं है, वह जो कह दे ,वही कविता की कड़ी है। इससे वह जिसकों भी पीट दे, ऐसी वह कलात्मक छड़ी है।अब वहाँ पुलिस हो ,मंत्री या बड़ा नेता;  वह सबकी  खाट खड़ी कर देता।वहाँ न कोई एक्ट है न कोई धारा है,पुलिस हो या नेता,  बेचारा है।जो वह सुनाए ,सब सुनना ही सुनना है। कानून के धरातल पर कुछ नहीं बुनना है।इधर से सुना उधर निकल जाना है, कवि को गरियाने में कदापि नहीं लजाना है।

यही तो इन कवियों का अपना जमाना है। उसकी नब्ज जनता के हाथ है। जनता ही भगवान ,उसको  नमन माथ है। वैसे इन कवियों की इतनी ही औकात है।सब कुछ खुली किताब है।जितना चाहें रायता फैलाएं, खाएँ न खाएँ या जितना गिराएँ।यहीं पर अटकी हैं,इनकी सफलताएँ। अपने लतीफों में सबको उलझाएं। भला इनसे बड़ा वीआई पी कौन है, यदि कोई सोफे पर विराजमान है ,तो वह भी पड़ा मौन है।अपनी सचाई सुन-सुन के कोई बेहोश तो कोई बेचैन है !

यहाँ नए के नाम पर सब कुछ पुराना है। अपना ही लतीफा बार- बार सुना आना है।यही 'वर्तमान  मंचीय हास्य कपि सम्मेलन' है,जनता की माँग है तो जनता को ही झेलन है। लिफाफे भरे जा रहे हैं। कवियों की औकात को मापे जा रहे हैं। अपना न हो तो स्वचोरित भी चलता है। चोर-चोर मौसेरे भाई हों तो कहो कौन किसे  छलता है। जिसने स्विच ऑन किया वही हाथ मलता है।तालियाँ बजाता हुआ हॉल से बाहर निकलता है : 'अरे यह तो वही सुनाया जो पिछले साल होली पर सुना था। क्या इनके पास नया कुछ भी नहीं है?'

शुभमस्तु !

19.01.2026◆4.30 प०मा०

                ◆◆◆

लोग [ चौपाई ]

 037/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लोग  करें    सब  अपनी    बातें।

कहें    दिवस  को      काली   रातें।।

जिसके  मन    में    जो  भी  आए।

अपने  मन     से     बात     बनाए।।


लोग  करें  सब   बात  न  नीकी।

यद्यपि     चुपड़ी  हों  ज्यों   घी की।।

बँधे  स्वार्थ    में    लोग    यहाँ   के।

उन्हें  न    भावें  लोग     जहाँ    के।।


लोग   विषमता  के    सब  रोगी।

विषम सोच के    हैं   जन    भोगी।।

सोच  समझ   कर    निर्णय   लेना।

मन  की बात  न    इनको     देना।।


भले  प्राण भी    दे    दो      इनको।

लोग कहें निज    स्वारथ इसको।।

कितने  लोग  जगत    हित   सोचें।

सदा  अन्य     के     कपड़े    नोचें।।


जनहित  का   है   बहुत     दिखावा।

यद्यपि  मन में     कुटिल     दुरावा।।

छद्म   एकता   लोग       दिखाते।

बँटे  खण्ड   में     नित   बिखराते।।


लोग  जगत   के  भले   नहीं   हैं।

पर    लाखों    में   चार   कहीं   हैं।।

मुख   में  राम  बगल    में    छुरियाँ।

नित्य   बदलते   अपनी      दुनिया।।


'शुभम्'    सहारा      इनका    लेना।

पाँव  कुल्हाड़ी    में    खुद     देना।।

लोग  अपावन    मन    से  भारी।

कैसे  खिले   जगत    की   क्यारी।।


शुभमस्तु !


19.01.2026◆7.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

पौष -माघ में शीत ऋतु [ दोहा गीतिका ]

 036/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पौष-माघ में ऋतु शिशिर ,जीव जंतु भयभीत।

ठिठुरन बढ़ती  नित्य ही, समय  बड़ा विपरीत।।


दंत-पंक्ति  किट-किट  बजे,थर-थर काँपे   देह, 

दिन में चैन  न  रात  को, सर- सर सरके शीत।


कल्पवास  जो   कर  रहे,भरे  भक्ति  के भाव,

भजन   करें   गोता  लगा, मिला न कोई मीत।


धर्म  भाव  यदि  हो नहीं,फिर लगता सब ढोंग,

पर  उपदेशी    लोग   ये,  सुना    रहे   हैं गीत।


जो आता जिस  काज  से,करे  इतर  क्यों काम,

परधन   कोई  लूटता,   समझ  रहा  यह जीत।


मस्तक   लगा  त्रिपुंड जो,भरें ओघ अघ नित्य,

नर-नारी   उनको   लगें,  बेशक   भूत पलीत।


'शुभम्'  मनुज   पहचानना,अति दुष्कर है राज,

भीतर   से   कुछ  और  है,  बाहर   संत प्रतीत।


शुभमस्तु !


19.01.2026◆1.30आ०मा०(रात्रि)

                    ◆◆◆

सर-सर सरके शीत [ सजल ]

 035/2026


           035/2026


          

समांत          : ईत

पदांत           : अपदान्त

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पौष-माघ में ऋतु  शिशिर,जीव जंतु भयभीत।

ठिठुरन बढ़ती  नित्य ही, समय  बड़ा विपरीत।।


दंत-पंक्ति  किट-किट  बजे,थर-थर काँपे देह ।

दिन में चैन  न  रात  को, सर- सर सरके शीत।।


कल्पवास  जो   कर  रहे,भरे  भक्ति  के भाव।

भजन   करें   गोता  लगा, मिला न कोई मीत।।


धर्म  भाव  यदि  हो नहीं,फिर लगता सब ढोंग।

पर  उपदेशी    लोग   ये,  सुना    रहे   हैं गीत।।


जो आता जिस  काज  से,करे  इतर  क्यों काम।

परधन   कोई  लूटता,   समझ  रहा  यह जीत।।


मस्तक   लगा  त्रिपुंड जो,भरें ओघ अघ नित्य।

नर-नारी   उनको   लगें,  बेशक   भूत पलीत।।


'शुभम्'  मनुज   पहचानना,अति दुष्कर है राज।

भीतर   से   कुछ  और  है,  बाहर   संत प्रतीत।।


शुभमस्तु !


19.01.2026◆1.30आ०मा०(रात्रि)

                    ◆◆◆

समांत          : ईत

पदांत           : अपदान्त

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पौष-माघ में ऋतु  शिशिर,जीव जंतु भयभीत।

ठिठुरन बढ़ती  नित्य ही, समय  बड़ा विपरीत।।


दंत-पंक्ति  किट-किट  बजे,थर-थर काँपे देह ।

दिन में चैन  न  रात  को, सर- सर सरके शीत।।


कल्पवास  जो   कर  रहे,भरे  भक्ति  के भाव।

भजन   करें   गोता  लगा, मिला न कोई मीत।।


धर्म  भाव  यदि  हो नहीं,फिर लगता सब ढोंग।

पर  उपदेशी    लोग   ये,  सुना    रहे   हैं गीत।।


जो आता जिस  काज  से,करे  इतर  क्यों काम।

परधन   कोई  लूटता,   समझ  रहा  यह जीत।।


मस्तक   लगा  त्रिपुंड जो,भरें ओघ अघ नित्य।

नर-नारी   उनको   लगें,  बेशक   भूत पलीत।।


'शुभम्'  मनुज   पहचानना,अति दुष्कर है राज।

भीतर   से   कुछ  और  है,  बाहर   संत प्रतीत।।


शुभमस्तु !


19.01.2026◆1.30आ०मा०(रात्रि)

                    ◆◆◆

अनुभव [ कुंडलिया ]

 034/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करता है जो  कर्म  को,वह  अनुभव का कोष।

पाता  है   समृद्धि   भी,  सदा   हृदय  में तोष।।

सदा हृदय में   तोष,  अन्य  को ज्ञान सिखाए।

पथ से    जाते  चूक,  उन्हें  सतपथ दिखलाए।।

'शुभम्'  वही  गुणवान,  मुकुट  माथे पर धरता।

चमके   सूर्य   समान, वही कुछ अद्भुत करता।।


                         -2-

अनुभव  होता    है  जिसे,  देता   है नित  काम।

जिनको   है    अनुभव  नहीं, करते   हैं आराम।।

करते    हैं    आराम,  समय   पर  धोखा खाएँ।

कर लेते  यदि   काम,  सोच   मन   में पछताएं।।

'शुभम्'  कर्म  का  कोष,समय पर बनता अजगव।

कर्मशील    संतोष   ,  सदा     देता     है अनुभव।।


                         -3-

कोरा  ज्ञान न  काम  का,जो   अनुभव  से हीन।

मुख   चमके   उनका   नहीं, रहता  सदा मलीन।।

रहता   सदा   मलीन,  कर्म   की  महिमा भारी।

आजीवन    दे    काम,  करे   नर    जो तैयारी।।

'शुभम्'   वृथा   आराम,   पड़ा  ज्यों कोई  बोरा।

तन मन   हो  बेकाम, बिना   अनुभव  के कोरा।।


                         -4-

चलते    हैं     जो   राह   में,  पाते   हैं गंतव्य।

लक्ष्यसिद्धि  उनको  मिले, करें  पूर्ण कर्तव्य।।

करें  पूर्ण   कर्तव्य, शीश   पर   मुकुट विराजे।

अनुभव  पाते  दिव्य, उन्हीं   के   बजते बाजे।।

'शुभम्' नहीं जो लोग,कभी मानव को छलते।

वही चमकते भानु,सदृश निज पथ पर चलते।।


                          -5-

करता    है  कर्तव्य  जो, अनुभव मिलें अनेक।

करते-करते   काम   को,   जाग्रत रहे विवेक।।

जाग्रत   रहे   विवेक, ज्ञान   का  कोष बढ़ाए।

अवसर पा  अनुभूत, व्यक्ति   उलझी सुलझाए।।

'शुभम्'  बिना  ही काम, ढोर-सा रहा  विचरता।

अनुभव  से  रह  शून्य,काम  पशुओं के करता।।

16.01.2026◆7.00आ०मा०

                    ◆◆◆

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

जाति का घण्टा [ नवगीत ]

 033/2026


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाति का घण्टा

बजाते 

फिर रहे हैं।


भाल पर

बैनर लिखा

देखा न कोई

उच्चता

या निम्नता 

का रंग कोई

भंगता की

भंगिमा में 

घिर रहे हैं।


हर कर्म में

सब लिप्त हैं

फिर जाति कैसी

दुर धर्म में

संल्पित हैं

है जाति वैसी

जन्मना 

क्यों उच्च वे

जो गिर रहे हैं।


नग्न आया

नग्न जाए

एक ही पथ

द्वार सबका

एक ही है

एक ही रथ

मुड़फुटौवल में

मनुज क्यों

चिर रहे हैं।


शुभमस्तु !


15.01.2026◆ 2.30प०मा०

हर अक्षर की एक संगिनी [ नवगीत ]

 032/2026


 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हर अक्षर की

एक संगिनी

आजीवन साथ निभाए।


अक्षर अक्षर

भाषा बनती

मात्रा का ले साथ

दक्षिण कभी

वाम होती है

कभी सुशोभित माथ

पड़े ज़रूरत

यदि अक्षर को

तो पाँवों तर  जाए।


अक्षर शब्द

व्यवस्थित क्रम में

बड़े वाक्य बन जाते

मिले वाक्य से

वाक्य निरंतर

कवि सौंदर्य सजाते

बन्ध कहें

या परिच्छेद वे

कविता लेख सजाए।


नहीं एक मात्रा से

चलता

मूढ़ जनों का काम

एकाधिक को

संग सुलाते

भले  बनें  बदनाम

अक्षर से ले सीख

अगर नर

एक संतुलन आए।


शुभमस्तु !


15.01.2026◆1.30प०मा०

                   ◆◆◆

पतंग [ सोरठा ]

 031/2026


                  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


थामे   हैं    प्रभु    डोर,  जीवन  एक पतंग है।

निशि-दिन संध्या-भोर,नभ में ऊँची   उड़ रही।।

तन-मन वृहदाकाश,    उड़ते    प्राण पतंग-से।

तब  तक  पूरी आश,जब तक   डोरी हाथ में।


आया है ले  सीख,  पर्व मकर   संक्रांति का।

नहीं किसी पर चीख,अपनी उड़ा   पतंग को।।

खुला   हुआ आकाश,   मानव एक पतंग है।

पर  धरती  पर नाश,जितना   भी   ऊँचा उड़े।।


कहता जगत  पतंग,  उड़ती   है  आकाश में।

 बनना   नहीं   मलंग,सीमा में    अपनी उड़ें।।

समय -पवन के साथ,उड़ता मनुज पतंग -सा।

हैं प्रभु जी ही नाथ,वश  अपना   चलता नहीं।।


परवश सदा  पतंग, पति -पत्नी पतवार सम।

बन मत मनुज मलंग,अंकुश भी अनिवार्य है।।

उड़ें जदपि आकाश,परिजन सभी पतंग -से।

करना नहीं विनाश,डोर   न काटें अन्य की।।


शिक्षा सबक प्रतीक,  गगनांचल में उड़ रही।

चलना नहीं अलीक,जानें 'शुभम्' पतंग  को।।

चलें समय  के संग, रुख  पहचानें वायु का।

पथ   है  वायु -तरंग,  जैसे   एक  पतंग का।।


नभ में   कभी पतंग,बिना डोर उड़ते नहीं।

बिखराते नवरंग,ओझल  हो  मत दृष्टि से।।

 

शुभमस्तु !


15.01.2026◆ 10.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

जीवन एक पतंग है [ दोहा ]

 030/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जीवन    एक      पतंग  है, थामे   हैं  प्रभु डोर।

नभ  में  ऊँची उड़  रही,निशि-दिन संध्या-भोर।।

उड़ते   प्राण    पतंग-से,  तन-मन वृहदाकाश।

जब   तक डोरी हाथ  में,तब  तक  पूरी आश।।


पर्व   मकर   संक्रांति  का, आया है ले  सीख।

अपनी   उड़ा पतंग  को, नहीं किसी पर चीख।।

मानव   एक   पतंग   है,खुला   हुआ आकाश।

जितना  भी  ऊँचा  उड़े,पर  धरती  पर नाश।।


उड़ती    है   आकाश   में, कहता जगत  पतंग।

सीमा  में   अपनी   उड़ें,   बनना   नहीं  मलंग।।

उड़ता  मनुज   पतंग-सा, समय -पवन के साथ।

वश  अपना चलता नहीं,हैं प्रभुजी    ही नाथ।।


पति-पत्नी पतवार सम,  परवश   सदा पतंग।

अंकुश भी अनिवार्य है, बन मत मनुज मलंग।।

परिजन सभी पतंग-से, उड़ें जदपि आकाश।

डोर न  काटें  अन्य   की,करना नहीं विनाश।।


गगनांचल  में उड़  रही,शिक्षा सबक प्रतीक।

जानें 'शुभम्' पतंग को, चलना  नहीं अलीक।।

रुख  पहचानें  वायु   का, चलें  समय के संग।

जैसे  एक   पतंग    का, पथ  है   वायु तरंग।।


बिना  डोर   उड़ती    नहीं, नभ में कभी पतंग।

ओझल   हो   मत   दृष्टि से,  बिखराते नवरंग।।


शुभमस्तु !


15.01.2026◆ 10.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

साथ-साथ अच्छे लगते हैं [ गीत ]

 029/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भले पुराने हों

गाड़ी के दोनों पहिए

साथ -साथ अच्छे लगते हैं।


एक धुरी पर

दोनों चलते

एक साथ चूँ चरर मरर

बिना तेल

घिस-घिस कर रेंगें

अपनी मंजिल नाप डगर

किंचित मन में

द्रोह नहीं है

साथ-साथ अच्छे फबते हैं।


अपनी कहें

सुनें सब उनकी

इसको  कहते प्रेम सभी

वाद विवाद 

न करते पल को

उर न विलग हो रंच कभी

करते याद

अतीत काल की

एक दूसरे को नवते हैं।


कब तक साथ

निभेगा सँग - सँग

कोई नहीं जानता इसको

हँस मुस्काकर

रहें साथ में

वृथा न करते जीवन रस को

खो जाते

अतीत में अपने

सोते कम अति जगते हैं।


शुभमस्तु !


13.01.2026◆5.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

सोमवार, 12 जनवरी 2026

जीवन हो यह कर्म प्रधान [ गीतिका ]

 028/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हे     मानव   तव      मन     उचटे।

रहे       केन्द्र    पर     नित्य    डटे।।


बढ़े    परस्पर         नेह     असीम ,

मेल      एकता    से    न        हटे।


रीति        सनातन   भंग     न   हो,

उचित  नहीं    मनुजात         खटे।


जीवन   हो  यह      कर्म    प्रधान ,

रहें      मनुज  से     मनुज     सटे।


प्रबल   रखें        संकल्प       सभी,

रहें       जगत      में      छटे - छटे।


एक        रहें        कथनी -  करनी,

पल    भर    को  मन    नहीं  घटे।


'शुभम्'  अहं     से    जो     है   दूर,

मानवता        से       नहीं      कटे।


शुभमस्तु !


12.01.2026●10.45आ०मा०

                 ●●●

रहे केन्द्र पर नित्य डटे [ सजल ]

 027/2026


     

समांत        : अटे

पदांत         : अपदांत

मात्राभार     : 14.

मात्रा पतन   :शून्य.


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हे     मानव   तव      मन     उचटे।

रहे       केन्द्र    पर     नित्य    डटे।।


बढ़े    परस्पर         नेह     असीम ।

मेल      एकता    से    न        हटे।।


रीति        सनातन   भंग     न   हो।

उचित  नहीं    मनुजात         खटे।।


जीवन   हो  यह      कर्म    प्रधान ।

रहें      मनुज  से     मनुज     सटे।।


प्रबल   रखें        संकल्प       सभी।

रहें       जगत      में      छटे - छटे।।


एक        रहें        कथनी -  करनी।

पल    भर    को  मन    नहीं  घटे।।


'शुभम्'  अहं     से    जो     है   दूर।

मानवता        से       नहीं      कटे।।


शुभमस्तु !


12.01.2026●10.45आ०मा०

                 ●●●

अतीत का सिंहावलोकन:मेरा लेखन [ आलेख ]

 26/2026 

 

 ©लेखक 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 अपने अतीत के झरोखों में झाँकना और उसकी झाँकी कराना एक रोचक और आनन्ददायक विषय है। जीवन के विस्तार में उसके अनेक आयाम हो सकते हैं। अपने आप ही अपनी समीक्षा करना भी कोई सहज और आसान कार्य नहीं है। इस लेख में मेरा मुख्य पहलू मेरा लेखन कार्य है। यों तो कुछ भी मौलिक और सुचिंतित रूप से लिखना कोई सहज कार्य नहीं है,इसके लिए अनन्त जीवन की साधना के सोपानों पर आरोहण करते हुए व्यक्ति अपने पथ में अग्रसर हो पाता है। इसे मैं माता सरस्वती का एक असीम वरदान और कृपा ही मानता हूँ। 

 उस समय मेरी अवस्था मात्र ग्यारह वर्ष थी और मैं चौथी कक्षा का विद्यार्थी था। चौथी कक्षा के किसी विद्यार्थी से क्या कवि और लेखक होने की अपेक्षा की जा सकती है ?शायद नहीं। किंतु माँ शारदा की कृपा से ऐसा संभव हुआ और मैं कागज पर स्वेच्छया कुछ मौलिक लिख पाने में समर्थ हुआ। अंततः वह ग्यारह वर्ष की अवस्था ही क्यों रही ? यह चिंतन और मनन का विषय हो सकता है। बस इतना कहा जा सकता है कि अनेक सहित्यविदों कवियों और लेखनी के महारथियों को यह ज्ञान ग्यारह वर्ष की आयु में ही प्राप्त हुआ है। सम्भवतः प्रकृति की ऐसी देन है जो इस आयु विशेष में अंकुरित होती है। यह मानवीय बोध का श्रीगणेश है।उस समय वर्ष 1963 का वर्ष चल रहा था और मेरी कोमल हस्तांगुलियों के बीच माँ शारदा वीणापाणि सरस्वती ने लेखनी पकड़ा दी,हे वत्स!अब तुझे जीवन के पथ में अग्रसर होने के लिए काव्य और साहित्य का मौलिक सृजन करना है। तू बढ़ और आगे चल चलता रह चलता रह और कभी मत रुक।आजीवन चलता रह। यही तेरा लक्ष्य है,यही तेरा पथ है और यही तेरा गंतव्य भी है। कोई भी बाधा तुझे अनवरत आगे बढ़ते हुए रोक नहीं सकती। यह मेरा शुभ आशीर्वाद है। और फिर क्या था एक छोटी -सी बीज काव्य रचना कुछ यों प्रस्फुटित हुई:

 'सुख से रहो और प्रेम से बोलो'

 दुःख का नाम कभी मत लो। 

सत्य बोलकर मृषा मिटाओ, 

नाम असत का कभी न लो।' 

 यह पाँच छः बन्ध की अनगढ़ काव्य पंक्तियाँ मेरे लिए बीज मंत्र बन गईं। और आगरा के अपने उस छोटे से गाँव में प्रकृति के खुले दृश्यों से प्रभावित हुआ भगवत स्वरूप माँ शारदा द्वारा प्रशस्त पथ पर आगे बढ़ चला। कभी वर्षा ,गर्मी,जाड़ा , कभी सरसों गेहूँ बाजरा अरहर आदि के लहहलहते खेतों और कभी प्रकृति के विविध दृश्यों से प्रभावित होकर अपनी अनगढ़ भाषा और लिपि में कविताएँ करने लगा। उस समय तक उसे छंद लय लघु गुरु विराम यति गति आदि का कुछ भी बोध नहीं था। सब कुछ प्राकृतिक रूप में चलने लगा और अनवरत चलता रहा। आठवीं कक्षा तक आते आते उसने बहुत कुछ लिख लिया था और अब उसकी गणना आगरा क्षेत्र के बाल कवियों में होने लगी थी।आगरा शहर में होने वाले कवि सम्मेलनों के लिए उसका नाम बाल कवियों की श्रेणी में छपने लगा। उस समय लिखी गई सभी रचनाएँ उसने अपनी नोट बुक्स में लिखकर सुरक्षित कर लीं,जिन्हें वह अपनी चौपाल पर नीम के पेड़ के नीचे बैठकर अपने परिचित मित्रों चाचाओं और भाई बंधुओं को सुनाने लगा। उन सभी श्रोताओं के लिए मेरा काव्य लिखना किसी सातवें आश्चर्य से कम नहीं था। 

 कक्षा आठ उत्तीर्ण करते -करते मैंने अपने चाचाजी की अलमारी में रखीं हुई हिंदी साहित्य की मोटी मोटी पोथियाँ रुचिपूर्वक पढ़ डालीं। जिनमें मुख्यतः प्रिय प्रवास,साकेत,कामायनी, कबीर, सूर सागर, मुंशी प्रेमचंद के गोदान आदि उपन्यास और भी न जाने क्या क्या ,पढ़ डाले थे।उसी समय घर पर आने वाला बहुत सारा साहित्य पत्र पत्रिकाओं के रूप में आता था। पढ़ने के प्रति गहन रुचि होने के कारण कुछ भी अनपढा मेरी दृष्टि से बच नहीं सका। मेरे द्वारा बौद्ध साहित्य का गहन अध्ययन उसी कालावधि में किया गया। जिससे प्रेरित होकर हाई स्कूल के बाद वृहदाकार 'तपस्वी बुद्ध' महाकाव्य का प्रणयन भी हो गया। जो न जाने कितने प्रकार के छंद बहुल रूप में एक लगभग 275 पृष्ठों की कृति के रूप में 2018 में प्रकाशित हुआ। 

 जहाँ तक मेरे लेखन के प्रकाशन की बात है ,राजकीय इंटर कालेज आगरा में विज्ञान वर्ग में अध्ययन करते समय मुझे कालेज पत्रिका में रचना प्रकाशित कराने का प्रथम सुअवसर प्राप्त हुआ और मेरा वैज्ञानिक लेख 'वृत्ताकार या पहिया' प्रकाशित हुआ। उसके बाद तो मैं अनेक पत्र पत्रिकाओं के संपर्क में आया और तत्कालीन समाचार पत्रों 'सैनिक' ,'विकासशील भारत' आदि में मेरे लेख और अन्य रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं। उस समय जीवनी मंडी आगरा से दैनिक 'सैनिक' के संपादक श्री प्रेमदत्त पालीवाल जी के संपादकत्व में प्रकाशित 'युवक' मासिक पत्र में मेरी कविताएँ, कहानियाँ,व्यंग्य लेख, एकांकी और निबंध प्रकाशित होने लगे जो दीर्घ अवधि तक छपते रहे। यह पत्रिका एक 40-50 पृष्ठों की बड़ी पत्रिका होती थी। उसी कालावधि में मेरी काव्य रचनाएँ बीकानेर राजस्थान से प्रकाशित होने वाली स्वास्थ्य पत्रिका 'शुचि' में भी प्रकाशित होने लगीं।

 इस प्रकार मेरा लेखन कार्य गतिमान हुआ और मैं लेखन के क्षेत्र में आगे बढ़ता रहा। आगरा विश्वविद्यालय आगरा से 1973 में बी०एस सी० ; 1975 में एम०ए०(हिंदी ) और 1978 में पी एच०डी० की उपाधियाँ प्राप्त करने के बाद 1980 में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बीसलपुर (पीलीभीत )में हिंदी प्रवक्ता के पद पर नियुक्ति मिली। राजकीय व्यवस्था के क्रम में मेरा स्थान्तरण अक्टूबर 1983 में राजकीय महाविद्यालय जलेसर (एटा) के लिए हुआ। 1990 में पुनः पूर्व महाविद्यालय में बीसलपुर के लिए स्थानांतरण हो गया।जहाँ मुझे रहने लिए माता जी श्यामादेवी जी का वही मकान रहने लिए मिला ,जिसमें मैं 1980 से 1983 तक रहा था। उसी अंतराल में माताजी ने रामचरितमानस का अखंड पाठ का 24 घण्टे का आयोजन किया,जिसमें मानस पाठ करने का सुअवसर मुझे भी प्राप्त हुआ।यह मानस पाठ मेरे मन में कुछ इस तरह रच बस गया कि एक सप्ताह में ही अपना प्रथम हास्य व्यंग्य काव्य 'श्रीलोकचरित मानस' पूरा कर डाला ,जो 1992 में ही बीसलपुर से प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष मेरी पूजनीया माँ का स्वर्गवास हो गया। सूचना मिलने पर गाँव गया तो मुझे माँ के दर्शन नहीं हो सके। उनके उस शोकावेग में मात्र तीन दिन में ही खंडकाव्य 'बोलते आँसू' लिखा गया जो वर्ष 1993 में प्रकाशित हुआ। सात वर्ष तक मेरी कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई। सात वर्ष के बाद वर्ष 2000 में आगरा से मेरी अनगढ़ गजलों की कृति 'स्वाभायनी' प्रकाशित हुई। 

 जब मैं एम०ए० (पूर्वार्द्ध) का छात्र था; मैंने 23 सितंबर 1974 की रात को एक स्वप्न देखा जिसमें मेरे गाँव का ही एक व्यक्ति चाँदनी रात में ताजमहल के भवन पर आरोहण कर रहा है ,उसे ऐसा करते देख मैं भी उसका अनुसरण करने लगता हूँ और इसी प्रयास में स्वप्न भंग हो जाता है। सुबह की वेला है और मैं एक कविता शृंगार छंद में लिख देता हूँ,जिसका शीर्षक है 'प्रेम'। इस रचना को लिखने के बाद मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस पर अभी बहुत कुछ लिखा जा सकता है,और फिर क्या मेरी लेखनी पत्र पटल पर चलने लगती है और मात्र तीन दिन में ही एक नवीन खंडकाव्य 'ताजमहल' खड़ा हो जाता है। यह खंडकाव्य वर्ष 2008 में अमृत प्रकाशन शाहदरा दिल्ली से प्रकाशित हुआ। वर्ष 2008 में ही मेरा एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास 'ग़ज़ल' भी उसी प्रकाशन से प्रकाश में आया। यद्यपि मेरा शोध कार्य 1978 में ही मुझे डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान कर चुका था,किंतु उसका प्रकाशन भी 2008 में ही कानपुर से संभव हो सका। 

 मेरा हास्य व्यंग्य काव्य 'सारी तो सारी गई' वर्ष 2009 में और ग़ज़ल संग्रह 'रसराज' 2011 में अमृत प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ। 2016 में मेरे पूज्य पिताजी हमें छोड़कर स्वर्गलोक की लंबी यात्रा पर निकल गए और हम अनाथ हो गए। इसका मुझे माँ से विलग होने के समान ही अत्यधिक दुःख हुआ,जिसे मैंने अपने 'फिर बहे आँसू' खण्डकाव्य में आँसुओं के रूप में बहाया। यह वर्ष 2018 में कानपुर से प्रकाशित हुआ। वर्ष 2018 में ही वर्ष 1974 में लिखा गया महाकाव्य 'तपस्वी बुद्ध' सहित्यपीडिया नोयडा से प्रकाशित हुआ। 

 वर्ष 1998 से मैं सिरसागंज के जिस क्षेत्र में निवास करते हुए राजकीय सेवा कर रहा था, वह एक आलू उत्पादक बहुल है ,जिसके आलू का उत्पादन देश ही नहीं विदेशों में भी विख्यात है। मेरे आगरा स्थित गाँव पुरा लोधी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है,जहाँ 99% प्रतिशत किसान आलू का उत्पादन करते हैं। जब मैं सिरसागंज से गाँव जाता तो जहाँ भी चार आदमियों को बैठा हुआ पाता ,वहाँ आलू- चर्चा की ही प्रमुखता से सुनता। इससे प्रभावित होकर आलू शतक लिखा गया और बहुत सारे बालगीतों के साथ एक वृहदाकार काव्यकृति 'आओ आलू आलू खेलें' 2020 में ही कानपुर से प्रकाशित हुई।

 व्यंग्य लेखन मेरी बचपन से ही आजमाई हुई प्रिय विधा है। जिस पर कभी लेखन कार्य बंद नहीं हुआ। क्या गद्य और क्या पद्य सभी में अनेक व्यंग्य रचना विधान अनवरत जारी रहा। तब वर्ष 2020 में ही मेरी व्यंग्य की प्रथम कृति 'शुभम् व्यंग्य वातातन' आगरा से प्रकाशित हुई। वर्ष 2022 में देव स्तुति काव्य के रूप में 'शुभम् स्तवन मंजरी' लखनऊ से प्रकाशित हुई।

 2022 से प्रकाशन का यह क्रम थमा नहीं ,बल्कि शुभदा प्रकाशन ,जांजगीर (छत्तीसगढ़) में प्रकाशन ने अपना ध्वज फहराया और मेरी चौदहवीं कृति 'विधाता की चिंता' वहाँ से प्रकाशित हुई। इसी वर्ष वहाँ से 'शुभम् गीत गंगा' प्रकाशित हुई। मेरी 16वीं पुस्तक 'शुभम्' कुण्डलियावली' आगरा से प्रकाशित हुई। उसके बाद शुभदा प्रकाशन छत्तीसगढ़ ने शुभम् साहित्य सृजन की शृंखला को अंगीकृत कर लिया कि 2025 तक मेरी 44 साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं ,जिनमें वर्ष 2022 में तीन, 2023 में सात,2024 में सात ,2025 में चौदह कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं। अब तक 2026 में सृजनांक:45, 46,47 और 48 प्रकाशित हो चुकी हैं ;जिनके नाम क्रमशः 'इंद्रधनुष मेरी बाँहों में' , 'इंद्रधनुष के रंग' , 'हम तुम दीप जलाएँ' और नवगीत संग्रह 'अँखुए' हैं। इसके बाद 'वल्लरी' (नवगीत संग्रह), 'पंच विधांगिनी' , और 'शुभम् शब्दोत्सव' (लेख व संस्मरण संग्रह) कुल 51 कृतियों की फरवरी 2026 तक प्रकाशित करने की योजना है। 51 कृतियों का सृजन और प्रकाशन पूर्ण होने के बाद यह सृजन और प्रकाशन का पावन कर्म मुझे किस ओर ले जाए, मैं इससे सर्वथा अनभिज्ञ हूँ। बस परम पिता परमात्मा से यही प्रार्थना है कि जिन्होंने मुझे एक दिशा दी है ,दृष्टि दी है, वह मेरी भावी दिशा और गंतव्य के निर्धारक होंगे। ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है। शुभमस्तु !

 12.01.2026◆9.45 आ०मा०

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'राम तेरी माया' [ अतुकान्तिका ]

 025/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूस-माघ   के  जाड़े में

कुछ गर्मी की बात करें

भुनी हुई  शकरकंदी

गर्मागर्म बेड़ई 

आलू की रसीली सब्जी

उर्द की दाल की 

खस्ता कचौड़ी।


करारी गर्म मूँगफली

तिलकुट्टी गज़क रेवड़ी

नई ब्याई भैंस की पेवसी

कुटे हुए तिल के लड्डू

छोड़ मत देना 

गाजर का गरम हलवा

जलवा ही जलवा।


भूल कैसे गए 

सरसों की भाजी

मूँग की दाल के पकौड़े

हरे धनिए की 

चटनी ताजी

बाजरे की रोटी

चने की पत्ती का साग

मिल गया तो

खुल गए भाग।


सुबह शाम

भपीली गर्म चाय

पालक बेसन के

गर्म-गर्म  पकौड़े

कैसे करें

तुम्हारे साथ

भरे जाड़े में अन्याय

फिर क्या है

जाड़े जी की बाय बाय।


मोटे ऊनी कम्बल

रजाई गद्दे का संबल

ठंड और कोट स्वेटर का

होने लगा दंगल

गर्मी का

 गरम-गरम सृजन।


पिड़कुलिया करे 

नीम के पत्तों में भजन:

'राम तेरी माया'

'राम तेरी माया'

धूप की प्रतीक्षा है

तूने कर दी क्यों

कोहरे की छाया

'राम तेरी माया'।


शुभमस्तु !


08.01.2026◆9.45प०मा०

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ज्ञानी [ कुंडलिया ]

 024/2026


                  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                        -1-

ज्ञानी जन   यदि  ज्ञान  का, करते  हैं अभिमान।

ज्ञान   नष्ट   होता  सभी, रहे   न   शेष निशान।।

रहे   न  शेष  निशान, किसी के काम न  आता।

अलिखित यही विधान,पतित जीवन हो जाता।।

'शुभम्'   करें  उपयोग, समझकर उसका मानी।

रहें     अहं     से   दूर,  बने   रहना   यदि ज्ञानी।।

 

                          -2-

ज्ञानी  नर   गंभीर   हो,   जैसे    सिंधु   अथाह।

छल-छल कल-कल कर रही,सरिता बड़े उछाह।।

सरिता   बड़े   उछाह, तोड़कर सभी किनारे।

बहती    धार   सवेग,  किसी के  खेत उजारे।।

'शुभम्'  ज्ञान  गंभीर,  पुरुष      होते सम्मानी।

रखना   ज्ञान    सँभाल,बने  रहना यदि ज्ञानी।।


                           -3-

अधजल गगरी  देख  लो, छलक रही  मुँहजोर।

छलके   भरी  न  बूँद भी,करे  न किंचित शोर।।

करे   न    किंचित   शोर, वही   है मानो ज्ञानी।

रखती   नीर   सँभाल, उलीचे   लेश   न पानी।।

'शुभम्' ज्ञान का कोष,नहीं जाया कर धल-धल।

खाली  करता  घोष  ,करे  ज्यों  गगरी अधजल।।


                           -4-

ज्ञानी    जन   पाते    सभी, मान  सदा सर्वत्र।

बढ़े    प्रतिष्ठा  विश्व   में,यदि  हो  सुघर चरित्र।।

यदि    हो  सुघर  चरित्र,  महकता  फूलों जैसा।

प्रसरित    होता     इत्र, वायु   में  सुमधुर वैसा।।

'शुभम्' ज्ञान का पात्र, अगर   हो   सच्चा दानी।

करता  जगत   प्रणाम, जदपि नर सच्चा ज्ञानी।।


                         -5-

ज्ञानी   जन  कागा  नहीं, करें   काँव ही  काँव।

अगर   नहीं    विश्वास  हो, देखो  जाकर गाँव।।

देखो   जाकर    गाँव, कोकिला    मीठा  बोले।

जब   आता   मधुमास,  समय पर वाणी खोले।।

'शुभम्'  ज्ञान   की बात, ज्ञान का अर्थ न पानी।

बहा   रहा   क्यों  मूढ़,  नहीं   तू   सच्चा ज्ञानी।।


शुभमस्तु !


08.01.2026◆ 8.45प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...