रविवार, 28 जून 2020

ग़ज़ल


◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
✍ शब्दकार©
🙊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
अपनों   को   देते  गलहार।
गैरों    को   देते    दुतकार।।

तेरे      मेरे     का     है खेल,
अपनों  की   खेते   पतवार।।

गर्द  सियासत   की  भरपूर,
सिर गर्दन    रेते    तलवार।।

जातिवाद    का    देखा  रंग,
दुनिया  के    जेते   अख़बार। 

मुँह    उघाड़ कर   सौंप  रहे, 
बाँट  रहे     केते     उपहार।

न्याय नहीं , चिल्लाते लोग,
नहीं  ध्यान ,लेते दो '-चार।।

दूध    धुले     वे    बने  हुए ,
'शुभम' नहीं    चेते संसार।।

💐 शुभमस्तु!

27.06.2020 ◆11.15पूर्वाह्न

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...