मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

गली - गली मतमंगे आए 😷 [ गीत ]

 

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 शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गली -  गली   मतमंगे   आए।

गाँव - गाँव  में     दंगे   लाए।।


माया  जाल   जमा  दारू का।

खुला खजाना अब कारू का।

घर -घर जाकर लोग  लुभाए।

गली - गली   मतमंगे   आए।।


बोतल , थैली    बाँट   रहे  हैं।

अनगिन   मुर्गे  काट  रहे  हैं।।

मुफ्तखोर    देखो    ललचाए।

गली -  गली   मतमंगे  आए।।


कोरे  नोट     गिनाता    कोई।

उतर   गई  आँखों  की लोई।।

जाति, वर्ण तज पद छू आए।

गली  -  गली  मतमंगे  आए।।


खूँटी   पर  इज्ज़त   लटकाई।

खुश  हैं  सारे लोग -  लुगाई।।

सबसे  ही  'हाँ- हाँ'   करवाए।

गली -  गली   मतमंगे  आए।।


दावत  रोज़   गाँव   में  होती।

बीज अदावत के नित बोती।।

नाच  रहे   कालीन    बिछाए।

गली -  गली   मतमंगे  आए।।


लालच  में देखो   मत बिकते।

इसका खाते  उसके  दिखते।।

भेद   खुला  वे  जन  मरवाए।

गली -   गली  मतमंगे  आए।।


दलबंदी   की  जंग सियासत।

मिली प्रधानी बनी रियासत।।

मुखिया वे  उसके   कहलाए।

गली -  गली मतमंगे   आए।।


🪴 शुभमस्तु !

०६.०४.२०२१ ◆१०.४५ आरोहणम मार्तण्डस्य।

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