बुधवार, 7 अप्रैल 2021

आज का दम्भी मानव 🍒 [ कुंडलिया ]

 

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✍️ शब्दकार©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                         -1-

बातें जो कहता खरी,काव्य तुला  पर तोल।

सत्य कथ्य जिनमें भरा,बातें सब अनमोल।।

बातें  सब  अनमोल, झूठ ही सबको  भाता।

चिकनी-चुपड़ी बात,घुमाकर जो बहलाता।।

'शुभम'चाहते लोग,आज सब धोखा   घातें।

लगता  सत्य  कुनैन, चाहते झूठी    बातें।।


                         -2-

दोषी  वह  होता  नहीं, जो समर्थ  बलवान।

करता हो अपराध नित,पाता वह सम्मान।।

पाता  वह  सम्मान,काम दानव  के करता।

निशि दिन अत्याचार, प्राण निर्धन के हरता।।

'शुभम' बिगड़ता देश,छा गए कायर   रोषी।

हर हालत में जीत,उसी की जो  है   दोषी।।


                         -3-

साधन को क्या पूछना, विजयश्री का लाभ।

मिलना उनको चाहिए, चमचम करती आभ

चमचम  करती  आभ,न्याय से  दूर पताका।

चमके  सारे  देश, अँधेरा   भले  अमा  का।।

'शुभम' कागज़ी फूल, इत्र से भर   आराधन।

करें  ऊपरी  ढोंग,सत्य  से दूर कु   - साधन।।


                          -4-   

मानव ने दूषित किया,जल भू नभ परिवेश

दोषारोपण और पर,विकृत हैं   जग देश।। 

विकृत  हैं  जग देश, मिली ऐसी आज़ादी।

दूरदर्शिता   शेष, नहीं बेढब का    आदी।।

'शुभम'  धरे  नर देह,बना कर्मों से   दानव।

हाँके  लंबी  डींग,आज का दम्भी  मानव।।


                         -5-

कहता जिसे विकास नर,है वह पतन विनाश

नैतिकता नित मर रही, तम मय है आकाश

तममय  है आकाश, कर्म का उठा  जनाजा।

पापों का तमतोम,बजा सतपथ का बाजा।।

'शुभम' मर रहा धीर,सत्य शुभ ऐसे  दहता।

लगी मनों में आग,झूठ नर मुख से कहता।।


🪴 शुभमस्तु !


०७.०४.२०२१◆३.००पतनम मार्तण्डस्य।


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