बुधवार, 29 जनवरी 2025

देखता हूँ मैं विडंबन [ नवगीत ]

 047/2025

               


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखता हूँ मैं विडंबन

ही  विडंबन का नजारा।


आज कोई भी पड़ौसी

मेल से रहते नहीं हैं

बाँटते हैं दुख हजारों

हर्ष  निज कहते नहीं हैं

बंद हैं अपने घरों में

कोई नहीं अपना हमारा।


आग जब लगती घरों में

कौन आता है बुझाने

वीडियो  लगते बनाने

ज्ञान भी लगते सुझाने

खाक होती निर्धनों की

झोंपड़ी, मरता बिचारा।


होलिका की आग जलती

स्वार्थ की पिचकारियाँ हैं

वैमनस्यों की शिखाएँ

पंक दूषित नालियाँ है

ढोल डफ कैसे  सुहाएँ

बिखरती जब रंग-धारा।


शुभमस्तु !


028.01.2025● 12.30प०मा०

                    ●●●

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...