शनिवार, 19 जुलाई 2025

मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना [ व्यंग्य ]

 352/2025



           

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 'मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना' हमारे वायु पुराण की यह सुंदर उक्ति निश्चय ही विचारणीय ,मननीय और माननीय है।इस संसार में जितने मुंड,शुण्ड और तुण्ड बनाए गए हैं,उनकी महिमा भी महनीय है।यहाँ तक कि सृष्टि के सारे चेहरे भी एक दूसरे से नहीं मिलते तो मुंड और उनमें विद्यमान मतियाँ एक समान कैसे हो सकती हैं ? जब मतियाँ एक समान नहीं तो उनकी गतियाँ रतियाँ और स्वस्तियाँ एक सदृश कैसे हो सकती हैं! सृजन कर्ता का सारा सृजन ही सुभिन्न है।कहीं कोई एक रूपता नहीं।हो भी कैसे?हो भी क्यों?फिर इतनी बड़ी और व्यापक सृष्टि का लाभालाभ ही क्या ? सृजन का स्वामी भी विविधता और रंगीनियों से स्नेह करता है ।इसलिए वह सृष्टि में अनेक रंग भरता है।

 'मुंडे -मुंडे मतिर्भिन्ना' के कारण ही कोई नौकर है तो कोई मालिक। कोई चोर है तो कोई शाह। कहीं वाह - वाह है तो कहीं आह ही आह। कोई नेता है तो कोई गुर्गा। कोई अंडाखोर है तो कोई मुर्गा।इधर हाथी शेर है तो उधर मच्छर भुनगा।कोई भिखारी है तो कोई दाता। कोई बीजवपन कर्ता जनक है तो धारक पालक और सुधारक माता।सबकी मति अर्थात विचार यदि एक से होते तो यह रंगीनी और नव्यता कहाँ से आती ! पाँच पंचों की राय भी कभी एक नहीं होती ,क्योंकि मुंडे - मुंडे मतिर्भिन्ना जो है।

 सब आदमी आदमी जैसे लगते हैं,पर एक - से होते नहीं। उनके मुंड की संरचना और उसमें उपजे विचार भिन्न ही होते हैं।प्रकृति की इस प्रवृत्ति की महती सराहना करनी ही चाहिए,क्योंकि यदि सबके मुंड की मति भी एक समान होती तो हर गुर्गा मंत्री और प्रधान मंत्री बनने के लिए रार ठान देता। कोई नौकर चाकर नहीं होता सब मालिक और शाह क्या शहंशाह का सिंहासन हथियाने के लिए महाभारत नहीं तो महापाकिस्तान करते।इतनी मति भिन्नता के बावजूद विश्व में इतनी घोर अशांति है, यदि ऐसा न होता तो अब तक कितनी बार प्रलय हो चुकी होती और कितनी बार ब्रह्मा जी को नई सृष्टि बनाने का दायित्व भार उठाना पड़ता। वैसे भी सृष्टि का निर्माण करते करते उनके बाल श्वेत हो गए हैं ।यदि मतिर्भिन्ना न होता तो उनकी दाढ़ी और सिर पर एक भी बाल नहीं बचा होता। सबके सब ताबीजों के काम आ गए होते। 

  किसी भी प्रवृति के होने या न होने के एक नहीं ,कई आयाम होते हैं। वे सकारत्नक भी हो सकते हैं और नकारात्मक भी। इसी तरह मतिर्भिन्ना के भी सकार और नकार होते।इससे सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि इधर मच्छर खून पीकर ही संतुष्ट है ,उधर आदमी दंशजन्य खुजली को खुजाकर ही शांत है। मच्छर न होता तो मच्छर अगरबत्ती , आल आउट, तेल, कॉइल आदि के बड़े-बड़े कारखाने कैसे खुलते। इस मच्छर जैसे नन्हे संगीतप्रिय जंतु ने इतने बड़े उद्योगधंधों को जन्म दिया है, तो शेर ,चीते, बघर्रे आदि के अस्तित्व और मतिर्भिन्ना ने बड़े- बड़े नगरों,महा नगरों, कस्बों और गाँवों को जन्माया है।अवश्यकता सदा अविष्कार की जननी रही है।ये बहुमंजिला इमारतें, बहु खंडीय गगन चुम्बी भवन सब मतिर्भिन्ना के परिणाम हैं। मानव और सृष्टि का समग्र विकास ही इसी मतिर्भिन्ना ने पैदा किया है। 

 कहा जाता है कि आदमी चौबीसों घण्टे ,सातों दिन और बारहों मास आदमी नहीं रहता। कभी वह आदमी जैसा आदमी है तो कभी देवता तो कभी राक्षस होता है। ये अलग बात है कि वह कब क्या होगा,यह उसकी मतिर्भिन्ना की स्थिति पर निर्भर करता है। उसके मुंड में अवतरित विचार और उनका व्यवहारिक रूप ही उसे आदमी देवता या राक्षस बनाता है।  आदमी के मतिर्भिन्ना ने ही साहित्य में दस रसों को पैदा किया है।प्रिया या पत्नी के साथ शृंगार रत है तो युद्ध में वीरता रत वीर रस, कभी भयानक रस तो कभी क्रोध में रौद्रता का खेल खेलता है। हँसने हँसाने में हास्य का फव्वारा फूटता है तो भक्ति लीन मुंड नयन मूँद शांत रस लीन हो लेता है। यह मतिर्भिन्ना किसी अलौकिक चमत्कार से कम नहीं है। कविता की विधाएँ ,छंद,शैलियाँ,गुण, रीति आदि सब कुछ मतिर्भिन्ना के विविध रंग - रूप हैं। 

 आइए हम सब इस मतिर्भिन्नता का आनंद लें और सृष्टि के विविध राग रंगों में खो जाएं। यहाँ सब कुछ रस मय है। यह तो हमारी और आपकी मतिर्भिन्नता पर निर्भर करता है कि हम उसका रस निर्वेद में ग्रहण करें या संवेद्य में।सब कुछ हमारे अंदर निवेशित है। कब कौन सा रस निसृत होता है ,यही जानना पहचानना है।जब एक ही धरती की विविध मिट्टियों में खोदे गए कुओं के पानी का स्वाद बदल सकता है,तो ये तो आदमी है ।कोई पता नहीं कि उसके मुंड में कब क्या मति हो। उसकी क्या गति हो। सुगति हो या कुगति हो या दुर्गति ही हो !

 शुभमस्तु !

 19.07.2025● 9.15आ०मा०

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