364/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
इन घटाओं से नहीं उम्मीद कोई
झूमकर आता नहीं इनको बरसना।
चहलकदमी-सी करें दिन रात यों ही
नापना आकाश को इनकी शपथ है
चातकों की प्यास भी इनसे न बुझती
मिलना नहीं इनको कभी यश का सुजस है
तालाब के भी भेक सब प्यासे पड़े हैं
जब भरें तालाब तब उनको हरसना।
शुष्क प्यासी मरु धरा बेचारगी-सी
बाँह फैलाए पड़ी दिन - रात ऐसे
विरहिणी हो सेज पर करती प्रतीक्षा
वर्ष से प्रीतम न आए प्रात जैसे
लिख गया है भाग्य में प्यासी मरे वह
बूँद के बिन प्यार में यों ही तरसना।
मौन हैं चारों दिशा जलमुर्गियाँ भी
एक सन्नाटा सिमट दुहरा हुआ है
जुगनुओं की अब नहीं चढ़ती बरातें
रो रहा अंधेर में काला कुँआ है
लाल मखमल-सी नरम वह लाल गुड़िया
आती नहीं नम भूमि से कैसा सरसना।
शुभमस्तु !
23.07.2025● 9.45 आ०मा०
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