गुरुवार, 24 जुलाई 2025

चक्कर 'का चक्कर [ व्यंग्य ]

 370/2025


         

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

'चक्कर' का एक अन्य अर्थ चक्र भले ही हो ,किंतु वह 'चक्कर' की टक्कर में कहीं नहीं ठहरता। चक्र सुदर्शन चक्र तो हो सकता है,किंतु 'चक्कर' के समक्ष नहीं रुक पाता।इस 'चक्कर' ने बड़े -बड़े चक्कर खाए हैं, तब 'चक्कर' की उपाधि से सम्मानित किया जा सका है।प्यार के 'चक्कर' से राजनीति का 'चक्कर' सर्वथा अलग होता है। 'चक्कर' के चक्करों में जो पड़ा ,वह चक्करघिन्नी हो गया। ये 'चक्कर' जाने कहाँ - कहाँ के चक्कर कटवा दे ,कुछ भी कहा नहीं जा सकता।इसलिए मित्रो ! इस 'चक्कर' के चक्कर से सदा बचे रहना।

कोई किसी से कहता है :"किस चक्कर में पड़ गए। इससे तो कुँवारे ही भले थे।" यहाँ चक्कर किसी मुसीबत के अर्थ में आया है। 'इस काम में बड़ा चक्कर है,कहने से शब्द दुरूहता अथवा जटिलता  का भाव व्यंजित करता है।विवाह की सप्तपदी भी 'चक्कर' ही है। वह भी अकेली नहीं,एक साथ सात है।किसी प्रदक्षिणा ,परिक्रमा या भ्रमण को भी 'चक्कर' ही  कहेंगे।

जीव के लिए चौरासी लाख योनियों का चक्र भी किसी चक्र या फेरे से कम नहीं है। कुल मिलाकर 'चक्कर' बड़ा ही चक्कर वाला है।जैसे सीधा -सादा चक्कर न हुआ कोई भूल -भुलैया हो गया ! किसी शुभचिंतक ने अपने किसी शुभेच्छु से कहा इस लड़के के 'चक्कर' में मत पड़ना ,यह बहुत ही चालू चांडाल है।यहाँ  'चक्कर' ने  फिर अपना मुखौटा बदल लिया। ये 'चक्कर ' ही वस्तुतः बहुरूपिया है। 'चक्कर'  का पहिया घूमा नहीं कि अच्छे- अच्छे चक्कर खाकर गिर जाएँ। किसी आपन्नसत्वा को गर्भधारण के कारण अथवा किसी को परीक्षा में कठिन प्रश्न पत्र देखकर  'चक्कर' आ जाते हैं। कोई कमजोरी में 'चक्करों'  का शिकार हो जाता है। 'चक्करों' का रूप  भी बड़ा मायावी है। पात्र -पात्र में रूप बदलता है।

इस धराधाम में भला ऐसा कौन है,जो 'चक्कर' ने  चक्करघिन्नी नहीं बनाया ? कोई प्रेम के चक्कर में,कोई गृहस्थी के चक्कर में, कोई नौकरी न मिलने के चक्कर में, कोई नौकरी मिल जाने पर उसका निर्वाह करने  या न कर पाने के चक्कर में, कोई राजनीति के चक्कर में,कोई धर्म के चक्कर में,कोई गबन ,चोरी ,मिलावट,

अपहरण,राहजनी के चक्कर में चकराया हुआ है  तो कोई किसी के घर के चक्कर लगाने के चक्कर में छक कर सो भी नहीं पाता। जितने लोग उतने चक्कर के नमूने। एक समय का चक्र ही ऐसा चक्र है,जो निरन्तर घूम रहा है।उसके चक्कर में भला कौन नहीं फंस रहा है।बस, ट्रेन ,ट्रक, ट्रैक्टर,कार के चक्रों को कौन गिने। वे तो दृश्य हैं, किन्तु अदृष्ट चक्करों की कोई सीमा नहीं है। हर व्यक्ति अनेक चक्करों में चक्करायमान है।

आइए ! अब दुनिया और जन्म के चक्कर में आ ही गए हैं तो सँभल कर चक्कर लगाएँ । बेहिसाब चक्कर न खाएँ। क्योंकि जब तक जीवन है,ये चक्कर रुकने और थमने वाले नहीं हैं।एक से निकले तो दूसरा तैयार है। कोई चक्कर न किसी का शत्रु है न यार है। ये आदमी तो चक्करों से लाचार है। कोई किसी के चक्कर में न पड़ें ,सब अपने-अपने चक्कर गिनें। ये सीलिंग फेन या कूलर के चक्कर नहीँ कि हमेशा ठंडी - ठंडी हवा देंगे। कभी भाड़ या भट्टी की ज्वाला में भी तपना होगा ,कभी काम बनेगा तो कभी सपना होगा। पर यह मत सोचें कि 'चक्कर' का  चक्कर कभी बन्द होगा !

शुभमस्तु !

24.07.2025●3.30प०मा०

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