गुरुवार, 31 जुलाई 2025

हम बादल हैं! [ व्यंग्य ]

 383/ 2025 

 

 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 क्या समझा है?आपने क्या समझा है? आपने हमें क्या समझा है? आपने हम बादलों को क्या समझा है? कि हम कहाँ से पानी बरसाते हैं!हमारे पास अपना कुछ भी नहीं है। हमें भी ये पानी! इस बरसात के लिए जल कहीं से लेना पड़ता है। हमारा अपना क्या है! हम भी बड़ी- बड़ी नदियों ,तालाबों,झीलों, और समुद्र से जल भरकर लाते हैं,तब कहीं जाकर दुनिया की प्यास बुझाते हैं। धरती को हरा भरा कर पाते हैं। हम बादल हैं ,कोई सागर नहीं हैं।किसी खाली घड़े की तरह खाली के खाली।हम बरसते हैं तो दुनिया बजाती है ताली! न बरसें तो देती है गाली! जब बरस जाते हैं तो खुश होते हैं जीव जंतु,खेत, बाग, वन ,दरिया,नाले और नाली।नाच उठते हैं पेड़ पौधे और लताएँ । अपनी ही कमियाँ और खूबियाँ कहाँ तक बताएँ! हम बादल हैं।जो कभी अकेले अर्थात बे दल नहीं होते,सदैव बा दल(दल सहित ) होते हैं,इसीलिए हम 'बादल' हैं। 

  हम 'बादल' कभी काले हैं ,कभी गोरे तो कभी धूसर या भूरे हैं।ये तरह -तरह के रंग भी हमारे अपने नहीं हैं। ये भी सूरज दादा की कृपा का फल हैं, वे जैसे- जैसे अपनी किरणें हम पर बरसाते हैं, हम उसी प्रकार के रंग दिखलाते हैं।कभी -कभी हम लाल हरे नीले और पीले भी हो जाते हैं। मानो हमने अपने कपड़े बदल डाले हों। 

 हम 'बादल' हवाओं के रुख से बिना पंखों के यात्रा करते हैं।प्रायः हम यात्रा में ही रहते हैं।हाँ, जब कभी कहीं बरसना होता है तो अपना कार्य निर्वाह के लिए हमें थमना पड़ता है। यदि हम थमें नहीं तो बरसें कैसे ! यदि कहीं पर बरस पड़े,तो फिर हमारा जलवा देखते ही बनता है !

  हम 'बादलों' को अनेक नामों से जाना- समझा जाता है। जैसे मेघ,घन,जलद,नीरद, वारिद,अंबुद, तोयद,धराधर,पयोधर,तोयधर, जलधर,वारिधर,घटा,घनश्याम, गगनगहन,जीमूत आदि। हम गरज- गरज कर बरसते हैं और बरस -बरस कर गरजते हैं। कभी - कभी आकाशीय तड़ित चमकती और तड़तड़ाती है। कभी- कभी तो हमें द्रव से ठोस बन जाना पड़ता है और ओले का रूप धारण कर आना पड़ता है।इससे धन - जन की हानि भी होती है। 

  लोग कहते हैं कि जो गरजते हैं,वे बरसते नहीं। ऐसा कहना सही नहीं है। हम गरजते भी हैं और बरसते भी हैं।मनुष्यों की तरह हमें पक्षपात करना नहीं आता। हाँ,आदमी के कुकृत्यों के कारण कहीं बाढ़ और कहीं सूखे की स्थिति आना हमारी विवशता है। कुछ क्षेत्रों में लोग कम वर्षा का आरोप हमारे सिर पर मढ देते हैं। अपने सुख चैन और आमदनी बढ़ाने के लिए उसने इतने कोल्ड स्टोरेज बना रखे हैं कि उनसे निकली हुई अमोनिया गैस से हमारा दम घुट जाता है। दोष आदमी का और मढ देता है हमारे सिर पर।यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में आलू आदि को संरक्षित करने के लिए शीतगृहों की अधिकता है,वहाँ बरसने की हमारी रुचि नहीं है। ये आदमी स्वयं अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार रहा है। कहना तो यह चाहिए कि उसने स्वयं कुल्हाड़ी पर ही पैर पटक दिए हैं।

  बेतहासा वन क्षेत्रों के कटान और मानवीय अति आचरण के कारण भू स्खलन की घटनाएँ आम हो रही हैं। यकायक आए इन परिवर्तनों से जलवायु और स्थानीय तापक्रम प्रभावित होता है,जिससे हम बादलों के फटने की घटनाएं होती हैं।आदमी अपनी भूल मानने के लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि उसे बादल फटने जैसी आपदा से दो चार होना पड़ता है। जंगलों और पहाड़ों की कटाई से ऐसा होता है,जो बादल फटने के रूप में सामने आता है। कभी - कभी पहाड़ की ऊँची चोटी पर भरा हुआ बहुत सारा ठंडा पानी यकायक जल प्रलय का कारण बनता है।

  हम 'बादल' हैं। हमारे बरसने के लिए वर्षा ऋतु निर्धारित कर दी गई है।सावन और भादों के दो महीने हमारे लिए आवंटित हैं कि जितना चाहो बरस लो।पर स्वार्थी आदमी नहीं चाहता कि हम ढंग से बरस भी सकें। थोड़ा सा भी अधिक बरस लो तो हाय तोबा शुरू कर देता है। कहीं बाढ़ आ जाती है तो कहीं गाँव,सड़कें,पुल,फसलें बह जाती हैं। न कम बरसने में कुशल है और न अधिक बरसने में ही हमारी प्रशंसा होती है। 'बादल' जो हैं, बदलाव करें भी तो कितना करें,कब तक करें। 

 शुभमस्तु ! 

 31.07.2025●6.00आ०मा०

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