373/2025
©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
'भक्त' और 'भोक्ता' दोनों ही सम वर्ण हैं ,सवर्ण हों अथवा न हों।और अवर्ण तो कोई होता ही नहीं है।वर्ण तो सब जगह अनिवार्य ही है। इन दोनों शब्दों में पूरा 'भ' ,आधा 'क' और पूरा 'त' समान रूप से सम्मिलित हैं।देखने और सुनने में भले ही वे समान लगते हों,किंतु वास्तविकता इसके विपरीत ही है। 'भक्त' वह है, जो किसी व्यक्ति,देवी, देवता,संस्था अथवा देश को समर्पित होता है। उसकी भक्ति में नतमस्तक रहता है।उसका कृपापात्र बना रहता है।यह अलग बात है कि वह 'भक्त' बनकर उसको भोगने लगे।उसका भक्षण करने लगे।और 'भक्त' के चोले के नीचे 'भोक्ता' बन जाए। इस 'भोक्ता' से ही मिलता जुलता शब्द 'उपभोक्ता 'भी बहु प्रचलन में हैं।जब कोई किसी का उपभोग करता है तो उसे उपभोक्ता कह दिया जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि भोक्ता कोई और होता होगा। असली भोक्ता तो वह व्यक्ति या संस्था हुई जो किसी वस्तु या कार्य का सृजन करे और उससे खरीद कर कोई अन्य उसे भोगे। वही उपभोक्ता हुआ। एक रुपए लागत की वस्तु को सौ रुपए की बेचे ,वही वास्तविक भोक्ता है और किसी अन्य से एक सौ दस में ख़रीदकर उपभोग करे ,वह उपभोक्ता है।
देश की सेवा के नाम पर देश भक्ति का चोगा ओढ़े हुए तथाकथित देशभक्त देश का भक्षण कर रहे हैं। वे वस्तुतः उसके भोक्ता हैं,भक्त नहीं।जब तक कोई ऊपरी आवरण न ओढ़ा जाए तब तक देश भक्ति नहीं हो सकती।इस देश में इसी प्रकार की देशभक्ति हो रही है।कर्ता धर्ता देशभक्त कहलाए जाते हैं और थोड़ा बहुत नहीं,टीवी अखबार और सोशल मीडिया पर बखूबी मुस्कराते हुए फोटो सहित प्रचारित और प्रसारित किए जाते हैं।ये सभी भक्त के नाम पर भोक्ता ही हैं। कोई भला क्या उन्हें चुनौती दे सकता है कि ऐसा क्यों हो रहा है।
ये भक्त रूपी भोक्ता देश के लिए बेचारे हैं।यह अलग बात है कि उनके लिए देश में इधर -उधर पूरब, पश्चिम,उत्तर, दक्षिण,ईशान,वायव्य, नैऋत्य,आग्नेय ऊपर और नीचे चारा ही चारा है।किंतु बेचारगी भी एक चोगा ही है।भिखारियों से भी कम मूल्य पर जिन्हें भोजन,चाय, पानी,फोन,मोबाइल,वाहन,आवास, ए सी,कूलर,सोफा,बेड,गद्दे,यात्राएं सुलभ करा दी जाएँ, उन्हें क्या कहेंगे! वस्तुतः वे ही तो बेचारे हैं। सब मुँह सीये बैठे हैं।कोई कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं। 'मैं न कहूं तेरी तू न कहे मेरी।'की स्थिति चल रही है।ये भक्त नहीं भोक्ता हैं,उपभोक्ता हैं ।देश के सोखता हैं।
'भक्त' का चोगा कितना ही आकर्षक और लुभाऊ है। समुद्र में जाकर कितना ही पानी समाकर खारी हो जाए, गङ्गा की पावनता मैली हो जाए; कौन है जो देखे सुने! सब जगह बाईस पंसेरी धान तौले जा रहे हैं, कोई है जो देखे और अपनी चोंच से चों -चों (क्यों -क्यों ) करे ? ये 'भक्ति' एक आड़ है,परदा है। वस्तुतः कोई नहीं चाहता कि पेड़ लगें और देश खुशहाल हो। यदि एक बार में लगाए गए करोड़ों पौधे पनप गए तो आगामी वर्षों में पौधारोपण के लिए एक इंच भी धरती शेष नहीं रहेगी।इसलिए हर साल पौधे रोपो और भूल जाओ । अगले वर्ष फिर जेठ की कड़कती हुई दोपहरी में पेड़ लगाओ ।यह तो पता ही है,कि वे पनप नहीं पाएँगे,इसीलिए जून /जेठ को चुना गया। यदि बरसात के सावन भादों के महीने इस कार्य के लिए चुने जाते तो शायद इतनी अधिक बुद्धिमत्ता नहीं होती !
इस देश में 'भक्त' ही 'भोक्ता' हैं। उन्हें भला कौन रोकता टोकता है।कोई कुछ कहे भी तो कहेंगे कि कुत्ता भौंकता है। अपनी बेकार की बक- बक क्यों छोंकता है? देश चलता चला जा रहा है और इसी प्रकार जाता भी रहेगा।चला भी जाएगा समूचा का समूचा तो यही कहा जाएगा कि यही होना था।बोया ही नहीं गया वह बीज जो बोना था। जब सभी 'भक्त' ही 'भोक्ता' थे, तो चुसता हुआ आम भला क्या बोलता। उनके 'रस' में विष क्यों घोलता! अपनी दो कौड़ी की तराजू पर किस - किस को तोलता! जो हो रहा है,होने देना है। काम करे कोई और 'भक्तों' को श्रेय ले लेना है।मेरी वाह-वाह हो यही तो सीना -पोना है। यदि कोई आगे निकले तो उसकी टाँग तोड़ दो। ज्यादा जबान चलाए तो अंदर को मोड़ दो। अन्यथा उसे नंगा करके सड़कों पर छोड़ दो। आज का भक्त भोक्ता का पर्याय है। उपभोक्ता बेचारा करता रहे हाय-हाय है।उसे तो दस की चीज एक सौ दस या इससे भी ऊपर खरीदनी है। क्योंकि उसे जीना है। जीवन के विष को अमृत की तरह पीना है। 'भक्तों ' की वाह! वाह !! करनी ही है। 'भक्तावाद जिंदाबाद'। 'भोक्तावाद जिंदाबाद'। उन्हें जो रोके टोके ,उसका मुर्दाबाद। गूँज रहा है हर दिशा- दिशा में यही नाद।
शुभमस्तु !
26.07.2025●1.00 प०मा०
●●●
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें