353/2025
©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
व्यक्ति की बुद्धिमत्ता इसी बात में है कि वह अपने से बड़ों से बैर- विरोध नहीं करे।इसी में उसका कल्याण है। अन्यथा म्रियमाण होने में देर नहीं। अपने हाथ पैर मति और जीभ को कछुए की तरह समेटे रखने में ही खैर है।अन्यथा अंधेर ही अंधेर है।एक नन्हा - सा जुगनू भला सूरज से बैर करके भी क्या पा लेगा! सिवाय स्वयं के भस्मीभूत हो जाने के ! क्षुद्र चींटी विशालकाय हाथी से शत्रुता करके कौन -सा लाभ अर्जित करेगी! एक घोंसलेवाली गौरैया किसी बंदर की शैतानी के समक्ष क्या जी पाएगी? सोच विचार का निष्कर्ष यही निकलता है कि किसी छोटे को अपने से बड़े से न तो बैर ही करना चाहिए और न ही उसकी किसी बात का विरोध ही करना चाहिए।
विचार करने की बात यह है कि कोई अपने को किसी अन्य से छोटा दिखना -दिखाना ही नहीं चाहता।एक चौकीदार अपनी औकात से बाहर निकल कर अपने वरिष्ठ से भिड़ जाता है। कहता है कि मैं तुझसे कम नहीं हूँ। जिसकी नौकरी मैं करता हूँ ,उसी मालिक का तू भी नौकर है। परिणाम यह होता है कि अगले पल उसे संस्था से निष्कासित कर दिया जाता है।यह है छोटे का बड़े से अविवेक पूर्ण ढंग से भिड़ जाने का परिणाम ! अहंकार में स्व विवेक को खोता हुआ मनुष्य पतित ही होता है। और उसका वही हाल होता है ,जो सूरज से बैर ठानने वाले जुगनू का हुआ।
विशाल वट वृक्ष के नीचे घास भी नहीं पनपती।अंततः उसे वहाँ से विदा होना ही पड़ता है।प्रकृति में सर्वत्र इस विधान का पालन किया जाता है।प्रकृति के संतुलन और अस्तित्व के लिए यह आवश्यक भी है। अपने से बड़ों का सदा सम्मान करना चाहिए ,यह नियम यों ही नहीं बना! आप किसी से छोटे तो किसी अन्य से बड़े भी हो सकते हैं। जब आपको अपने से छोटों से मान-सम्मान चाहिए तो आपसे बड़े को भी आपसे वही चाहिए। आप किसी के स्वाभिमान को मारकर जिंदा नहीं रह सकते। बाप बाप ही रहता है ,बेटा बेटा ही रहता है। इस जन्म में बेटा बाप का बाप न बना है और न ही बनेगा। हाँ,पुनर्जन्म के बाद पाशा पलट जाए तो अलग बात है।वरना हर बेटे को अपने बाप को बाप का मान - सम्मान देना ही होगा - स्ववश या परवश अथवा लोकलाज वश !
जहाँ तक बैर -विरोध की बात है ,वह तो बड़े को भी छोटों के प्रति नहीं करना चाहिए।पता नहीं कि कौन सी पिपीलिका किसी हाथी की सूंड़ में पहुँचकर उसकी जान ले ले।छोटा - बड़ापन तो सृष्टि की अनिवार्यता है। इस तथ्य की अस्वीकार्यता ही उसकी धृष्टता है। बड़े को बड़ा मानना और तदनुरूप सम्मान देना ही उचित है।बड़ों के द्वारा छोटों को स्नेह देना ही सहज स्वीकार्य है। जहाँ छोटे में अपने गुरुत्व का अहंकार समाया ,वहीं उसका सवा सत्यानाश! इसी बिंदु पर उसके बैर या विरोध का आरम्भ होता है,श्रीगणेश नहीं। बैर या विरोध कभी भी न स्वीकार्य हुए हैं ,न ही होंगे। इसलिए स्नेह, मान- सम्मान के साथ जीना ही मानव की मानवता है ,अन्यथा मानव देह में भी वह पशुता का बोझ ढो रहा होता है। यदि आपकी किसी से नहीं बनती,तो बिना किसी बैर - विरोध के उससे विमुख हो जाना ही श्रेयस्कर है।यह भी कोई आवश्यक नहीं कि दुनिया में जन्मे सभी चेहरे आपको पसंद आएँ ही। आदमी तो स्वार्थ का चलता-फिरता ,नाचता-कूदता पुतला है।जहाँ भी उसका उल्लू सीधा होता है, उसी शाख पर आ बैठता है। यदि स्वार्थ पूर्ति में खटाई पड़ी ,वहीं दूध फट जाता है।यह मानव संसार का प्रचलित लोकप्रिय नियम है। आदमी बिना स्वार्थ की वैशाखियों के एक कदम भी नहीं चल सकता। अकारण अनावश्यक बैर और विरोध करना भी उसकी फ़ितरत है।
जिस प्रकार आग से आग शांत नहीं हो सकती ,उसी प्रकार बैर से बैर भी शमित नहीं होता। प्रश्न ये है कि फिर बैर का समाधन कैसे हो ? इसको एक उदाहरण से समझा और समाधान किया जा सकता है। सूरज को देखकर जुगनू कितना ही जले ,बैर करे ,तो सूरज की उपेक्षा ही सब कुछ ठीक कर देती है।हाथी अपने मार्ग पर निकले चले जाते हैं, और कुत्ते भौंकते रह जाते हैं।उसकी एक टाँग या पूँछ का बाल भी नहीं छू पाते। आप अपना रास्ता चलें ,कौन क्या भौंक रहा है या टाँग अड़ा रहा है,इसकी चिंता न करें ।यदि उसकी टाँग कुछ ज्यादा ही आड़े आ जाए तो उसे तोड़ देना ही सर्वश्रेष्ठ समाधान है। नजरंदाज करने की भी एक सीमा होती है।जब पानी गले से ऊपर हो तो उस गले का इंतजाम भी अनिवार्य होता है। जब तक आदमी है,ये बैर -विरोध भी जिंदा रहेंगे।इनसे ऐसे ही विजय पाई जा सकती है। मनुष्य ने कभी भी नहीं सुधरने की कसम जो ले रखी है।यह तो पाकिस्तान के भारत से बैर -विरोध की तरह अटल है। वह अपने बाप को भी नहीं बाप मानता ,इससे बड़ा जघन्य बैर -विरोध और हो भी क्या सकता है?
शुभमस्तु !
19.07.2025●1.00 पा०मा०
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