362/2025
[सावन,बिजुरी,कजरी,पीहर,राखी]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
सावन सहज सुहावना,सखियाँ करें धमाल।
अमराई में झूलतीं, झर-झर झरती डाल।।
सावन -भादों की झड़ी,चुरा चित्त का चैन।
आल्हादित मन को करे,झर-झर- झर दिन-रैन।।
बिजुरी तड़पे मेघ में,पिया न घर में आज।
थर-थर-थर काँपे हिया, लगे गिरी अब गाज।।
बिजुरी की अति चौंध में,खुले न मेरे नैन।
पल्लव-सी मैं काँपती, नींद न आए रैन।।
कजरी गीत मल्हार का,मौसम आया आज।
टपकें टपका बाग में,चलें छोड़ सखि काज।।
कजरी ने इतिहास में,लिखा लिया है नाम।
मोबाइल में नारियाँ, व्यस्त हुईं बेकाम।।
वधू नवोढ़ा सोचती, पीहर हुआ अतीत।
सखियों के सँग झूलती,गा-गा कजरी गीत।।
पीहर के दिन चार हैं, फिर जाना परदेश।
पता नहीं कैसे मिलें, प्रीतम प्रणय परेश।।
राखी धागा प्रेम का,भगिनि भ्रात सद्भाव।
आजीवन निर्वाह से,पार उतरती नाव।।
राखी का त्योहार है, चलें बहन के गेह।
बंधु कहे निज तीय से,बरसे उर से नेह।।
एक में सब
सावन में पीहर गई, राखी का त्योहार।
बिजुरी दमके मेघ में, कजरी करे दुलार।।
शुभमस्तु !
23.07.2025● 4.45 आ०मा०
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