360/2025
©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
वैसे चौरासी लाख की संख्या कोई कम नहीं होती। ब्रह्मा जी ने जिस क्षण योनियों का निर्धारण किया होगा,उसी क्षण किसी जीव के कर्मों की संख्या का भी पूर्व निश्चय कर लिया होगा कि कोई भी जीव इतने तरह के कर्म कर सकता है। जो जैसा कर्म करेगा ,वैसा ही उसे फल मिलेगा। इससे यह धारणा पक्की हो जाती है कि कर्म और कुछ नहीं ,किसी जीव के पेड़ का बीज है।वही जब झड़कर गिरेगा ,तो योनि की धरती से फूटकर एक अंकुर बन जायेगा।किस कर्म रूपी बीज की किस योनि में धारणा हो ,पहले से कुछ भी नहीं कहा जा सकता।पहले उसके पूरे जीवन के कर्मों का अंत और प्रभाव देखा जाता है,उसके बाद ही उसे किस योनि में डाला जाए ,यह सोचा जाता होगा।वास्तव में ब्रह्मा जी का यह काम बड़ा ही जटिल और दुरूह है।परंतु युग -युगांतर से करते -करते यह उनका स्वभाव बन गया है कि उन्हें पलक झपकते हुए यह निश्चय करने में देर नहीं लगती कि किस जीवात्मा को कहाँ ला पटका जाए। इस दुरूह कार्य को निपटाने के लिए उन्होंने चित्रगुप्त जैसे कुशल लेखा -जोखा विशेषज्ञ को नियुक्त कर रखा है।आत्माओं को लाने और निबटाने के लिए यमराज और धर्मराज जैसे प्रशासक पदासीन किए हुए हैं ।फिर उन्हें चिंता ही किस बात की है कि किस जीवात्मा को किस योनि में स्थापित कर संसार में सबके समक्ष लाया जाए !
कहा जाता है कि जलचरों की 09 लाख,स्थावरों(पेड़-पौधों) की 20 लाख,पक्षियों की 10 लाख,कृमियों की 11 लाख,पशुओं की 30 लाख और मनुष्यों की सबसे कम 04 लाख योनियाँ होती हैं।इसका अर्थ यह हुआ कि सृष्टि में सर्वाधिक संख्या में पशु और सबसे कम संख्या में मनुष्य हैं। यह तो विधाता ही जानें कि किस कर्म का फल कौन सी योनि (जन्म) है? भले ही पृथ्वी पर मनुष्यों की चार लाख योनियाँ हैं,पर संख्यात्मक दृष्टि से वे नौ अरब से कम नहीं होंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी के समान ही अन्य पृथ्वियाँ भी होंगीं,जहाँ इस पृथ्वी से भिन्न प्रकार के 3,99,000 प्रकार के मनुष्य पाए जाते होंगे। कभी - कभी मनुष्य जैसे एलियन जीवों की चर्चा सुनने -पढ़ने में आती है ।वे भी एक मनुष्यों की ही योनि हो सकती है। सबसे कम होने पर भी वे चार लाख प्रकार के हैं,तो जलचर,स्थावर,खग,पशु और कृमियों को सम्मिलित करते हुए 80 लाख योनियाँ भी अकल्पनीय हैं।
सोचने की बात यह है कि कलयुग में तो यह मनुष्य ही इतने प्रकार के नए -नए कर्म कर रहा है,जो विधाता की दृष्टि में उनकी नई योनि के कारक होने चाहिए।इससे उसकी योनियों की संख्या चार लाख से भी बहुत ऊपर चली जानी चाहीए थी। हो सकता है ब्रह्मा जी ने मनुष्यों के कर्मों की बढ़ती हुई संख्या के आधार पर योनि -संख्या में बढ़ोत्तरी की हो,जो हम तुच्छ मानवों की जानकारी में न हो। इसी औसत से अन्य योनियों के जीवों में भी बढ़ोत्तरी स्वाभाविक है ,जो एक दो करोड़ पहुँच गई होगी।यद्यपि कर्मानुसार योनि निर्धारण हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथों पुराण आदि में किया गया है,किन्तु वह विवरण मुझे अपर्याप्त ही लगा। कम से कम चौरासी लाख प्रकार के कर्म और तदनुसार योनि निर्धारण तो होना ही चाहिए था। परंतु बहुत कुछ ऐसा भी सम्भव है ,जो हमारी सोच और संज्ञान के परे है। हम उससे अनभिज्ञ हैं।
कोई जीवात्मा यह नहीं जानता कि वह किस कर्म के कारण इस योनि (मनुष्य,पशु,पक्षी,कृमि,मछली,पेड़) में जीवन जी रहा है और जब संचित कर्मों का कोटा समाप्त हो जाएगा तो उसे पुनः किस योनि में जाना पड़ेगा? कौन सा कर्म अच्छा है या बुरा है ? यह भला कौन नहीं जानता? इसीलिए उसने पाप कर्म और पुण्य कर्म की धारणा स्थिर कर ली है। मनुष्य ने अपने लिए तो एक मानक बना रखा है,पाप और पुण्य का।किन्तु ऐसा लगता है कि अन्य अस्सी लाख योनि के जीव तो पाप कर्म का ही फल भोग रहे हैं! इसीलिए वे उन योनियों में पड़े हुए हैं। किसी मच्छर से यदि यह पूछा जाए कि क्या वह मरना चाहता है और उसके बाद तुझे और भी अच्छी योनि मिल सकती है,तो वह मरने के लिए कदापि सहर्ष तैयार नहीं होगा। इसी प्रकार गधा,कुत्ता,सुअर,बिल्ली,साँप, बिच्छू,गिरगिट,गाय,भैंस,बकरी आदि से प्राण त्याग के बाद योनि बदलने के लिए कहा जाए,तो क्या वे तैयार होंगे।मेरे विचार से वे तुरंत ही इंकार कर देंगे। इसका कारण यह है कि हर जीव को अपनी उस देह से इतना मोह हो जाता है कि वह उसे छोड़ना नहीं चाहता।मरना नहीं चाहता। उसे वही प्रिय लगने लगती है।यही हाल मनुष्य वर्ग का है। किंतु समय आने पर यह जीवन त्यागना ही पड़ता है। जन्म और मरण पर जीव का कोई नियंत्रण नहीं है।ये दोनों ही ब्रह्माधीन हैं। चित्रगुप्त जी की घड़ी में उलटी सुई चलती रहती है और बचे हुए वर्षों,महीनों,दिनों ,पलों और साँसों का आगणन करती रहती है।
कहा यह भी जाता है कि चौरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि ही सर्वश्रेष्ठ है। हो सकता है कि हर योनि के जीव को अपने वर्तमान जीवन और योनि के संबंध में यही धारणा हो। सबसे अच्छी बात यह है कि जो जहाँ है;वहीं संतुष्ट है। इसीलिए कोई गधा घोड़ा नहीं होना चाहता। कोई मच्छर मोर नहीं होना चाहता। कोई साँप नेवले की योनि में नहीं जाना चाहता। सब अपने में तुष्ट हैं,संतुष्ट हैं, संपुष्ट हैं; इसलिए कोई किसी से नहीं रुष्ट है।यह बात अलग है कि दबती है,तो चींटी भी काट लेती है । वरना वह भी अपने बिल में दाना -संग्रह और अंडा -सेचन में मग्न रहती है।
यों तो कुछ मनुष्य देहधारी भी देह से मनुष्य हैं ,किन्तु कर्म से वे वृश्चिक साँप से भी भयंकर हैं।पता नहीं किस कर्म के कारण उन्हें यह मनुष्य योनि मिल गई ,वरना वे किसी कीट योनि या सरीसृप योनि के ही अधिकारी थे।कभी - कभी ऐसा लगता है कि परमात्मा से योनि निर्धारण में कुछ भूल हो गई होगी। किंतु ऐसा सम्भव नहीं है। हो सकता है कि वे किसी ऐसी ही योनि से आए हों,और उनका वह संस्कार अभी भी शेष हो। वे देह से मनुष्य हों ,किन्तु कर्म से अभी वही के वही हैं।यह क्रियमाण कर्म भी अगली योनि निर्धारण का महत्त्वपूर्ण कारक है।वस्तुतः यह जीवन प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण कर्म का परिणाम है। यह चौरासी लाख में से चार लाख का नहीं ,चौरासी लाख योनियों का ही संरजाम है। लिखा है बहुत कम, पर समझें तमाम है।
शुभमस्तु !
22.07.2025 ● 9.15 आ०मा०
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