बुधवार, 30 जुलाई 2025

मखमल बिछी हरी पगडंडी [ गीत ]

 379/2025


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मखमल बिछी हरी पगडंडी

हरी -हरी तरु छाँव।


दृष्टि जिधर भी जाती मेरी

और नहीं कुछ भाता

खाट बिछाए बैठे द्रुम तल

कजरी कोई गाता

सघन नीम के नीचे  सारा

 शरण लिए है गाँव।


पास सरोवर में क्रीड़ा रत

गोरी बतख अनेक

दर्पण -सा चमके  सर पानी

बोल रहे बहु भेक

पाँच बकरियाँ बैठ किनारे

सुस्ताती हैं पाँव।


हरे -हरे सब खेत 

फसल के धरे हरे परिधान

लहराते हैं विरल पवन में

'शुभम्' गाँव की शान

क्रीड़ारत बालिका बाल सब

लगा रहे हैं दाँव।


शुभमस्तु !


28.07.2025●10.00प०मा०

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