सोमवार, 28 जुलाई 2025

कागा बने मराल [दोहा गीतिका]

 376/2025



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


श्वेत   वसन   हैं  देह  पर,कागा बने  मराल।

कहते  करें   विकास वे, बैठ कँटीली डाल।।


खाते  हैं  वे   वेश का,  चूस-चूस  कर आम,

बजा  रहे  हैं मौज की,वंशी पर झप ताल।


त्राहि -त्राहि जनता करे, उन्हें  नहीं अवकाश,

सुनते  एक  न  बात  वे, बजा  रहे  वे गाल।


सब निशुल्क  ही  चाहिए,साधिकार लें छीन,

देखो   कौवा  ऐंठकर,   चले  हंस  की   चाल।


नारों  से  चलता नहीं, कभी  देश का  काम,

लोक लुभावन बोलियाँ,उधर न रोटी -दाल।


खाक  छानते  थे  कभी, अब  धन के अंबार,

मार   कुंडली  वे  रमे,  देशभक्ति  की ढाल।


'शुभम्' बदलना रंग को, जिनका आम स्वभाव,

गिरगिट   भी  शरमा रहा, देख देश का    हाल।


शुभमस्तु !


28.07.2025● 6.15 आ०मा०

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