मंगलवार, 22 जुलाई 2025

रैपर [ व्यंग्य ]

 361/2025



 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 हर सोने जैसी चमकीली वस्तु भले सोना नहीं हो।किंतु व्यापारिक और व्यावहारिक जगत में चमत्कार और चमक का विशेष महत्त्व है।यही कारण है कि हर नर -नारी,बालक, बालिका,प्रौढ़ ,प्रौढा,वृद्ध और वृद्धा उससे चौंधियाई हुई है।यह चमक किसी भी तरह बहुविध तरीकों से पैदा की जा सकती है। उससे अनेक साधन और उपाय हैं। व्यापार जगत में चमक लाने के लिए चमकीले,भड़कीले और सजीले-धजीले 'रैपरों' का प्रयोग किया जाता है।चाहे वे घर -गृहस्थी में नित्य प्रति काम आने वाली वस्तुएँ :साबुन,मंजन,मसाले,नमक, क्रीम,पाउडर,लिपस्टिक,कंगन, बिंदी,मेहंदी,काजल,अलक्तक,साड़ी,जूता,चप्पल,पर्फ्यूम,इत्र आदि कुछ भी हो। बिना सुंदर और आकर्षक रैपर के उन वस्तुओं की बिक्री नहीं होती।ये रैपर तो उन वस्तुओं के लिए फूलों में सुगंध की तरह हैं।जैसे फूलों की सुगंध और रंगीन चित्ताकर्षक दलों से प्रभावित होकर तितलियां और भौंरे दौड़े चले आते हैं ,ठीक वैसे ही रैपर देखकर आदमी खिंचा चला जाता है। भले ही खरीदने के बाद प्रयोग से पूर्व ही उस रैपर को मूल्यहीन जानकर कूड़ेदान में फेंक दिया जाता हो।यहीं रैपर के महत्त्व की इतिश्री हो लेती है। 

   आप किसी भी रैपर के मूल्य और महत्त्व से सुपरिचित होंगे।उसका जीवन कितना ? कि बिक जाने तक। प्रयोग के बाद उसे फिंकना ही फिंकना है। चाहे उसकी लागत पर पचास रुपए का खर्चा आया हो,पर उसे तो फेंक ही देना है।पचास रुपए का नोट संभाल कर रख लिया जाएगा,पर पचास रुपए के रैपर का अब न कोई मूल्य है और न महत्त्व ही। यह ठीक वैसे ही है,जैसे नेता के सामने गुर्गा।बैनर लगाने,बाँस बल्लियाँ गाड़ने, झंडा ऊँचा करने,नारे लगाने,जुलूस निकालने के बाद गुर्गा रूपी रैपर को कोई नहीं पूछता। अपनी शेखी के बलबूते गुर्गा कितना ही इतराए तो इतराता रहे ! पर सब कुछ निष्फल और अकारथ। 

   समाज और देश में कुछ लोगों की अहमियत मात्र एक रैपर की ही होती है। उनकी चमक से चमकता कोई और है ,पर वे अपने अहं में यही समझते रहते हैं कि गाड़ी किसी और के नहीं ,उन्ही के बलबूते चल रही है। जैसे बिना रैपर के नंगा साबुन नहीं बिकता ,वैसे ही जनता में नंगा नेता नहीं चलता।उसे उसके रैपरों द्वारा ही चलाया चमकाया जाता है।

   साले की शादी में जीजाजी का रैपर चमकता है। जीजाजी की जय जय और फूफाजी की फूं फूं चिंघाड़ मारती है।जीजाजी के साथ जीजी और फूफाजी के साथ फूफी की फूं फां नए-नए रंग दिखलाती है।भाभी की भभक भी कुछ कम नहीं। वह भी एक महकता हुआ रैपर - बंडल है। रिश्तों में रैपरों का बड़ा महत्त्व है। लेकिन उतना ही जितना किसी बच्चे के टेढ़े मेड़ें के पैकिट का है।

 रैपरों की दुनिया बड़ी रंग -बिरंगी और सुगंधी है। रैपरों के परों से ही चिड़ियाएँ आसमान में उड़ती हैं।कोई रैपर निरर्थक नहीं है। वही तो नववधू की मुँह दिखाई से पहले गोटा की ओट है। उसी के कारण नवोढ़ा दुल्हन को वोट है। ये अलग बात है कि घूँघट उठने पर पता लगे कि उसका निचला कटा होठ है।पर यहाँ बिका हुआ माल वापस नहीं होता। यह तो अपना- अपना भाग्य है कि किसी को घोड़ा मिले या खोता।

देश और दुनिया में रैपरों ने धमाल मचा रखा है।सभी रैपरों को अपने हस्र का पता अच्छी तरह से है। फिर भी वे इतराने से बाज नहीं आते। वे दुकान की सजावट हैं। ग्राहक की चाहत हैं।उसी के कारण बढ़ते हुए ग्राहक हैं।वे चाँदी के वर्क नहीं ,जो खा लिए जाएँ।उन्हें तो कूड़ेदान की शोभा बढ़ानी ही बढ़ानी है। चार दिन की चाँदनी शायद इसी को कहते होंगे।रैपरों के पर होते तो उड़ जाते। किन्तु वे बेचारे हैं,असमर्थ हैं। परिजीवी हैं। परिपोषी हैं। किताब के ऊपर लिपटा हुआ लोकार्पण पूर्व का रैपर! बेचारा !! ऐसे बेदर्दी से उतार फेंका कि जैसे उसकी कोई अहमियत ही न हो ! मेरे विचार से इनका भी 'रैपर दिवस' सेलिब्रेट करना चाहिए। जिस चीज का महत्त्व घट जाने लगता है ,उसका दिवस मनाया जाने लगता है। जैसे: मातृ दिवस,पितृ दिवस, शिक्षक दिवस, मजदूर दिवस आदि आदि। जूता और चप्पल दिवस कभी नहीं मनाया जाता,क्योंकि इनका महत्त्व कभी कम नहीं होता। ये तो चमड़ा, प्लास्टिक, रबर, रैग्जीन आदि के साथ- साथ बातों के भी बरसते हुए देखे जाते हैं।

 शुभमस्तु ! 

 22.07.2025●11.45 आ०मा०

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